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इकतरफ़ा इश्क़ …

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मत पूंछ वो लम्हा जब सब महफ़िल से चलने को हुए थे,
तेरी एक झलक पाने को किसी ने मुड़कर हज़ार बार देखा था।

तुम मंज़िलों की खोज में गौर नही कर पाए,
और किसी ने गौर करते-२ तुझमें अपनी मंज़िल ढूंढ़ ली थी।

तुम सुलझाते रहे उलझने जीवन की इस कदर,
और किसी ने तुम्हारे उलझे बालों में सुलझनें ढूंढ ली थी।

हर कदम पर तेरे बगल में एक शख्श खड़ा तुझे देखता रहा,
तुम चीजों में खुशी ढूढ़ते रहे और किसी ने तुझ में खुशी ढूंढ ली थी।

तुमने यूँ ही राह में चलते-2 संभलने को हाथ पकड़ लिए थे,
तुम हमसफर थे पल भर के और किसी ने गुस्ताख़ी उम्र भर की कर ली थी।

वैसे तो भरोसा खूब है इन रेलों पर कि कुछ पल और मिल जाएंगे,
मगर तेरी ट्रैन के समय से आने पर किसी को नाराज़गी बहुत हो रही थी।

तेरी बक-बक भी बहुत खास हुआ करती थी उसके लिए ,
तुम्हारे होठों पर आ गया किसी गैर का नाम और किसी ने अपने होंठ सिल लिए थे।

चाहत थी संग उड़ने की मगर वो अपनी हाथों की लकीरों में कैद जो ठहरा,
कत्ल करने को खुद को किसी ने खुद से दुश्मनी कर ली थी।

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