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सफ़र

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मुसाफ़िर ही तो थे रास्तों से रुककर दिल्लगी क्या करते ,
कोई हाल पूछने वाला भी तो न था पैर पसार कर भी क्या करते।

उनकी नज़रों से मिल जायें ये नज़रें इससे ज़्यादा क्या चाहते,
फ़क़त इश्क़ ही तो है कोई शहर तो नहीं जो हम यहाँ बस जाते।

थका हूँ, बहुत दूर से आया हूँ इक लम्बा सफ़र तय करके,
ज़ुबान से दर्द बयाँ करूँ ज़रूरी तो नहीं, ये पैरों के छाले क्या कुछ नहीं बताते।

दहलीज़ पर तिरे दी है दस्तक, बहुत मज़बूर थे हम अपने दिल के वास्ते,
वरना हर गली में मशहूर है तेरे दिलों से खेलने के क़िस्से, तुझे इस दिल से खेलने का मौक़ा क्यूँ देते।

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