Posted in CHAUPAAL (DIL SE DIL TAK)

रेडियो

रेडियो से प्यार काफ़ी पुराना है…… शायद जन्म से ! गाँव-देहात से हूँ। बचपन में बिजली नहीं होती थी गाँव में। मनोरंजन के साधन के रूप में रेडियो से अच्छा कोई साथी नहीं। निप्पो या एवरेडी की दो बड़ी वाली बैटरी लगाओ…. किसी-२ रेडियो में तीन बैटरी भी लगती थी! बस मीडियम वेब और शॉर्ट वेब सेट करो और रेडियो हाथ में, कंधे पर या साइकल पर रख कर बीच गाँव होते हुए भरी दोपहर में आम के बाग की तरफ़ …. खटिया पर लेट, सिराहने रेडियो रखकर मन भर नींद ! भैया के साली को सपने में याद करते हुए 😉
 
रात में तो छत पर बिस्तरा लगाए खुले आकाश में ताकते हुए रेडियो को सुनना आज भी याद है। बीच में ज़रा सी हवा चल जाए तो घर के बग़ल वाले पीपल से सर्र-सर्र की आवाज़! फिर बुवा और चाचा लोग की पीपल के ब्रम्ह वाले भूत की कहानी! डर के मारे रेडियो भुला जाता और पीली वाली भागलपुरी चादर कस कर ओढ़ भूत से बचने की कोशिश!
 
बस इस तरह अधिकांश बचपन गाँव और रेडियो के संग बीता। वी सी आर भी आया था लेकिन उसकी कहानी कभी और ….. रेडियो तो बस पसंद ही नहीं है, ये तो खून में बसता है! कमाने लायक हुए तो भाँति-२ के रेडियो लिए और बेडरूम में सजा के रखे लेकिन हमारे इस शौक़ की क़दर घर में नहीं….. इसीलिए कई रेडियो ख़रीदने पड़े!
 
फ़ोटो में दिख रहा रेडियो लेटेस्ट वाला है। इसको ऐंटीक लुक की वजह से कुछ एक साल पहले amazon से मँगाए थे। कुछ महीने पहले ये चालू ही न हो…. दिल दुःख के सागर में गोते लगाने लगा कि अब क्या होगा? दिल टूट सा गया!
 
४-५ महीने बाद कल कोशिश कर, लोक-लाज को भूल कर कि इस मोबाइल वाले आधुनिक दौर में लोग-बाग क्या सोचेंगे, हम दिन भर लखनऊ की नरही बाज़ार घूमे तो एक दुकान मिल ही गयी! ख़ुशी का तो मानों ठिकाना न रहा हो! जब दुकान वाले भैया बोले कि बन जाएगा तो मानो मरुस्थल में बारिश हो गयी हो! न दाम पूछे न ख़राबी बस एक दिन बाद बनकर मिलने का वादा लेकर लौट आए….
 
पूरी रात यही सोचते रहे कि बस कल रेडियो बनकर मिल जाए ! बड़ी मुश्किल से नींद आयी !और आज जब ये बनकर आया तो मेरी ख़ुशी का ठिकाना न रहा!
 
शाम से बज रहा है और हम मंत्रमुग्ध हो एक अनोखे संतोष और हर्ष के भाव से निहारे जा रहें हैं- रेडियो को!
 
©️®️रेडियो/अनुनाद/आनन्द/२३.०५.२०२२
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गँगा माँ

कौन समझ सका गति उस जीवन नैया के खिवैया की,
कुछ विशेष स्नेहिल कृपा रही है हम पर गंगा मैया की,
जब भी नये सपने देखे और कोशिश की उन्हें पाने की,
सर पर आँचल की छाँव थी और थी गोद गंगा मैया की।

©️®️माँ गंगा और मैं/अनुनाद/आनन्द/१४.०५.२०२२

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ख़ूबसूरती

“ख़ूबसूरत लोग अगर अनजान हों तो अधिक ख़ूबसूरत और आकर्षक हो जाते हैं!”
😇
😍
😎

कुल मिलाकर ख़ूबसूरती एक वैचारिक fantacy के सिवा कुछ भी नहीं! यह fantacy एक व्यक्ति विशेष के जीवन भर की कल्पनाओं का समूह भर है जिसे वो किसी अनजान और ख़ूबसूरत व्यक्ति को देखकर एक पल विशेष में अनुभव कर लेता है। इन कल्पनाओं और उस देखे गए ख़ूबसूरत व्यक्ति में कोई रिश्ता नहीं होता। ये देखने वाले व्यक्ति के अंदर चल रही काल्पनिक कहानी मात्र होती है। ऐसी स्थिति में देखने वाले व्यक्ति को देखे गए व्यक्ति को लेकर कोई भी निर्णय लेने से बचना चाहिए।

ख़ूबसूरती एक मृग तृष्णा है। वास्तविकता में इसका कोई स्वरूप नहीं। सब कुछ आपके दिमाग़ के भीतर है। वहीं से आप इसे महसूस कर सकते हैं। तो अगली बार आपको ख़ूबसूरती का एहसास लेना हो तो इसे दूसरों में न ढूँढे। बस अपने दिमाग़ को इस हिसाब से अभ्यस्त करिए कि वो जब चाहे स्वयं इस ख़ूबसूरती का रसास्वादन कर ले। इस तरह आपको दूसरों से मिलने वाली निराशा से भी दो-चार नहीं होना पड़ेगा।

ऊपर वाले पैराग्राफ़ को देखकर कुछ ख़ुराफ़ाती लोग कई स्तर तक के मतलब निकाल सकते हैं🤣😆 और हास-परिहास कर सकते हैं! बस इन्हीं लोगों की वजह से मेरे लिखने की सार्थकता बढ़ जाती है 😉

यह सब लिखते वक्त मैंने बहुत सारा दिमाग़ लगाया है! ये पढ़ने में अच्छा लग सकता है मगर असल में ऐसा हो ही नहीं सकता क्यूँकि दुनिया दिल से चलती है! बिना चूतियापे के कोई कहानी बन ही नहीं सकती😋 और बिना कहानी के तो क्या ही मज़ा है जीने में 😁

इसलिए इस संसार की गति बनाए रखने के लिए मूर्खों की ज़रूरत ज़्यादा है……

मैंने भी खूब मूर्खता की है और सफ़र अभी जारी है….

खोज अभी जारी है……..

एक नयी मूर्खता करने की !

इसमें आपका साथ मिल जाएगा तो मज़ा दो गुने से चार गुने तक होने की सम्भावना है 🙃

©️®️ख़ूबसूरती/अनुनाद/आनन्द/११.०५.२०२२

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दाँव

भरोसा हमें खुद पर बहुत था
दिल कमबख़्त बहुत मज़बूत था
लगा दिया दाँव पर खुद ही को
और बहुत कुछ खोने को न था !

©️®️दाँव/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/०६.०३.२०२२

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दिलों की दिल्ली

लोग कहते हैं कि दिल्ली जाने के नाम पर हम खुश बहुत होते हैं,
चेहरे पर मुस्कान संग हम अपने लिखने का शौक़ लेकर आयें हैं।

बहुत दिन से सोच रहे थे कि दिल में कोई ख़याल क्यूँ नहीं आता
दिलों के शहर में दिल की कहानी लिखने का बहाना ढूँढने आएँ हैं।

लखनऊ की नवाबी लेकर हम दिल्ली का दिल देखने आएँ हैं,
क़िस्से कहानियों में बूढ़ी दिल्ली को फिर से जवानी देने आएँ हैं।

कितनी कहानियाँ हर वक्त बनती हैं बस तुम्हें कोई खबर नहीं,
एक बस तुम हाँ कर दो तो एक नयी कहानी हम लिखने आए हैं।

©️®️दिलों की दिल्ली/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/ १२.०२.२०२२

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