Posted in CHAUPAAL (DIL SE DIL TAK), POETRY

ज़िद…

काश….. बच्चों सी ज़िद मैं कर पाता
तुझको जाता देखता तो लिपट जाता!

©️®️ज़िद/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/१५.०६.२०२१

Posted in CHAUPAAL (DIL SE DIL TAK), POETRY

आसमान…

इश्क़ में तेरे, मैं आसमान हो जाऊँ।
तू कहीं भी रहे, तुझे देख तो पाऊँ।।

©️®️आसमान/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/१५.०६.२०२१

Posted in CHAUPAAL (DIL SE DIL TAK), POETRY

झीसे…

बारिश के झीसे में जैसे
ये पेड़ भीग रहा है……
बिल्कुल वैसे ही
तेरी यादों के फुहारों में
मैं भी भीग रहा हूँ….
वर्षों से!

ये बारिश तो रुक जाएगी
मगर….
तेरी यादों की बारिश,
थमने का नाम नहीं लेती।

©️®️झीसे/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/१४.०६.२०२१

Posted in CHAUPAAL (DIL SE DIL TAK), SHORT STORY

सब गरीब हैं!

“व्यक्ति की परिस्थिति कितनी ही क्यूँ न बदल जाए उसकी सोच (मानसिक ग़रीबी) वही पुरानी ही रहती है।” 🤔

गरीब आदमी भी पैसा कमाना चाहता है और अमीर आदमी भी। बस गरीब ज़रूरतों को पूरा करने के लिए और अमीर बढ़ी हुयी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए। दोनों की एक ही सोच- पैसा कमाना और अधिक कमाना! बस !🧐

मतलब ग़रीबी कभी नहीं जाती चाहे व्यक्ति कितना अमीर हो जाए! मैंने कम साधनों से सम्पन्नता तक का सफ़र तय किया है और सच बताऊँ तो ग़रीबी क़भी गई ही नहीं।🧐 मैं आज भी और अधिक पैसा कमाने की कोशिश में रहता हूँ। हाल फ़िलहाल सबकी यही हालत है।🥸

असली अमीर तो वो है जिसको फिर कमाने के लिए सोचने की ज़रूरत ही न पड़े, मेहनत करना तो दूर की बात है।😜

मेरी इस गणित के हिसाब से अम्बानी/अड़ानी आज भी गरीब हैं और व्यक्तिगत रूप से हम दोनों समान और बराबरी के गरीब हैं। वो भी सम्पत्ति बढ़ाने के लिए परेशान हैं और मैं भी ! कितनी सम्पत्ति? इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता ! मैं दो-चार, दस-पचास लाख तक सीमित हूँ और वो एक-दो हज़ार करोड़। बस! 😏

सब गरीब हैं! पूरी दुनिया! कुछ अपवादों (संत आत्माओं/फ़क़ीरों) को छोड़कर! बस यहीं मेरे ख़ुश रहने की वजह है! सब एक जैसे ही हैं! कोई अंतर नहीं! एक गरीब दूसरे गरीब से क्या कॉम्पटिशन करेगा? जितना ज़्यादा धनाढ़्य मेरे सामने आता है मैं उसे उतनी ही तुच्छ नज़र से देखता हूँ 😎 हाहा 😂

लॉजिक देखिए 🤪 खुद को सांत्वना देने की !🤓

पर बात तो सही है न?
सोचिए!🧐

©️®️ग़रीबी/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/३०.०५.२०२१

Posted in CHAUPAAL (DIL SE DIL TAK), POETRY

मैं, बारिश और इश्क़…

बारिश
जब भी बरसती है
मुझ पर यूँ गिरती है
जैसी सूखी पथराई मिट्टी पर
छन से
और फिर गहरे उतर जाती है
रिसती चली जाती है
भीतर तक
धीरे-धीरे
और बदल देती है मुझे
कर देती है नम
इस पत्थर दिल को
जैसे तुमने किया था….

बारिश
जब भी बरसती है
मुझ पर यूँ गिरती है
जैसे सूखे धूल जमे पत्तों पर
धुल जाती है सारी धूल
बहा ले जाती है सारी गंदगी
और चमक उठते हैं पत्ते
इसी तरह जब तुम्हारी यादों पर
पड़ने लगती है धूल
तो ये बारिश करती है कमाल
भिगोती है ये मुझे और फिर
चमक उठती हैं तेरी यादें
मेरे मानस पटल पर।

बारिश
जब भी बरसती है
मुझ पर यूँ गिरती है
आती है खुशबू
सोंधी-सोंधी
मिट्टी की
हो उठता हूँ तरो-ताजा
महक उठता हूँ भरपूर
और खो जाता हूँ
कहीं दूर नीरव में
बिल्कुल वैसे जैसे
पहली बार तुम बगल में बैठे थे।

बारिश
जब भी बरसती है
मुझ पर यूँ गिरती है
पैदा करती हैं कम्पन
होता है स्पंदन
उठती है सिहरन
मचलता है चितवन
संभालने को धड़कन
मैं करता हूँ प्रयत्न
साधता हूँ मैं खुद को
बिल्कुल वैसे जैसे
तेरी पहली छुवन।

बारिश
जब भी बरसती है
मुझ पर यूँ गिरती है
जैसे ……

©️®️बारिश का असर/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/२९.०५.२०२१