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उम्मीद…!

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अब तो हर मौसम को कुछ यूं देखता हूँ,
जैसे ये कोई पैगाम लाये हों मेरे लिए!

उम्मीद है कि तुम भी लौट आओगे एक दिन,
जैसे ये मौसम लौट कर आया है मेरे लिए।

अब तो ये बादल भी बरस पड़ते हैं मुझे देखकर,
आतुर हों जैसे मुझसे लिपट कर रोने के लिए!

फर्क तो बहुत पड़ा तेरे बिछड़ने का मुझ पर लेकिन
दर्द को दबाये रखा है खुद में तुझको जीने के लिए।

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