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कौन देखेगा?

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ये जो महफिलों की शान हैं वो महफिलों में बातें बड़ी-२ करते हैं,
तुम मुफ़लिस हो, तुम्हारे झोपड़े में आकर तुम्हारे घाव कौन देखेगा?

ये जो सड़क शानदार है, इस पर गाड़ियाँ सरपट सफर करती हैं,
तुम जो आँचल फैलाए बैठी हो, यहाँ रुकर तुम्हारी भूख कौन देखेगा?

लौट जा अपनों के बीच, मत कर कर फरियाद तू अमीरों की बस्ती में,
अपनी अमीरी की चकाचौंध के बीच तेरी गरीबी का अँधेरा यहां कौन देखेगा?

मत कर उम्मीद तू किसी भी खुदा से, ये पत्थर के ईश्वर क्या तुझे देंगें,
जहाँ पसंद हो सोने चांदी का चढ़ावा, वहाँ तेरी सूखी रोटी कौन देखेगा?

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