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एक इंजीनियर की नज़र में नारी सशक्तिकरण (निबंध)

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शिक्षा और पेशे दोनों से इंजीनियर हूँ। शिक्षा और पेशा इन दोनों शब्दों पर जोर देने का भी कारण है। एक व्यक्ति इंजीनियरिंग की शिक्षा पाकर इंजीनियर के अलावा कुछ भी बन सकता है पर मैं इंजीनियर ही बना। विडंबना है। ज्यादा इधर उधर की बात न करते हुए सीधे विषय पर चलते हैं। नारी सशक्तिकरण का समर्थक एक इंजीनियर से ज्यादा कोई नही हो सकता। व्यक्तिगत रूप से मैं दोनो हाथ उठाकर इसका समर्थन करता हूँ। उम्मीद है आप भी करते होंगे।


मैं एक साधारण सा दिखने वाला कम सुंदर (थोड़ा सुंदर तो हूँ) व्यक्ति हूँ ( इस पंक्ति पर मेरी बीबी को अतिसंयोक्ति है…. खैर!) । बारहवीं तक तो अत्यंत शर्मीला या कह सकते हैं कि अपने रंग को लेकर हीन भावना से शिकार । लेकिन केवल दुनिया वालों के सामने …. अन्दर ही अन्दर हम शाहरुख से कम न थे। अब बारहवीं के बाद इंजीनियरिंग में दाखिला ले लिए और वो भी इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में और बस उसी दिन से हम स्त्री सशक्तिकरण के कट्टर समर्थक ! साठ लोगों की क्लास में केवल 4-5 लड़कियाँ। दिल का दर्द दिल में ही रह गया। बस मैकेनिकल वाले लड़कों को देखकर जिन्दा थे वरना जीने के लिए कुछ बचा नही था। दुश्मन थे तो केवल कंप्यूटर साइंस और आई टी वाले लड़के। उनसे जलन थी … बहुत ज्यादा!


किस दौर में जन्म ले लिए थे। घर से बाहर निकलते ही मनहूस मर्दों के चेहरे सामने। बस, टेम्पो, कॉलेज, कोचिंग, कार्यालय हर जगह बस मनहूस चेहरे ही दिखाई पड़ते हैं। कभी गलती से कोई औरत दिख जाए तो वो भी पल भर को। थोड़ा और बाद में जन्म लेना चाहिए था जब औरत और मर्द की समाज में बराबर हिस्सेदारी होती। सोचिये सुबह होते ही घंटी बजती और आप गेट खोलते तो हाथ में दूध का डब्बा लिए एक स्त्री मुस्कुराते हुए बाबू जी दूध ले लीजिए। फिर थोड़ी देर में अखबार देने वाली भी एक स्त्री । आफिस निकलने को हुए तो ड्राइवर भी एक स्त्री। कार्यालय में समानुपात में औरत और मर्द। आहाआआआ…. सोचकर ही कितना अच्छा लगता है।


हमारी बीबी जी….. हर वक़्त शक। तुम साले को सुबह उठ कर आफिस निकल जाते हो अय्याशी करने और हम यहां घर में बच्चे संभाले। मैने भी प्यार से कहा , अय्याशी और हम! हमारी ऐसी किस्मत कहाँ…….. काश! बीबी को समझाते हुए ! ( ये संभव नही फिर भी..) देखो जान… ये बताओ ! मेरी सुंदरता पर तुम्हे कोई शक नही .. मानता हूं। फिर भी ये बताओ बाहर निकलने पर तुम्हे कौन सबसे ज्यादा दिखाई पड़ते हैं ? औरत या मर्द? वो बोली – मर्द। बस यही तो मैं समझाना चाहता हूं कि बाहर केवल मर्द मिलते हैं, और अगर गलती से कोई औरत मिल भी जाये तो मेरी जैसी सूरत वालों के लिए अवसर की बेहद कमी है। पर बीबी के सामने ये प्रयास भी निरर्थक। समझा पाना नामुमकिन है, मैंने भी हथियार डाल दिए।


अब थोड़ा गंभीरता से विचार करिए। ऊपर लिखी गई बातों में मजाक को छोड़कर उसके दूसरे पहलू को खंगालिए। यदि सच में समाज मे औरत और मर्द की बराबर की हिस्सेदारी हो जाए तो स्त्री सशक्तिकरण जैसे मुद्दे पर बात करने की जरूरत नही पड़ेगी। यदि कर्नाटक की डॉक्टर को स्कूटी पंक्चर होने के बाद अपने अगल बगल औरतें मिली होती तो क्या उनके साथ अमानवीय व्यवहार होता ? क्या इस तरह उनकी नृशंस हत्या होती? इस पर आपके जवाब का इंतजार रहेगा….
आप सबसे यही अपील है कि घर की बेटियों पर पहरा लगाना छोड़िये। समाज के प्रत्येक कार्यक्रम में उनकी बराबर की हिस्सेदारी सुनिश्चित करिये। लड़कियां देर शाम घर से बाहर निकलेंगी तभी सुरक्षित रहेंगी न कि घर में रहकर। स्त्रियों के प्रति अत्याचार कानून बनाने से नही रुकेगा । उसे वो स्वयं रोकेंगी । समूहों में आगे आकर। हमारी सरकार को प्रत्येक संस्था में औरतों को पचास प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित करना होगा। हम जिस दौर में आ चुके हैं वहां दिन और  रात का अंतर खत्म हो गया है। हम दिन में भी काम करते हैं और रात में भी। औरतों को रात में घर से बाहर निकलने से रोकने में देश ही पीछे जाएगा। औरतें अपनी सुरक्षा स्वयं कर सकती हैं। इसके लिए उन्हें मर्दों के रहम और करम की आवश्यकता नही। उन्हें बस समाज में अपनी बराबर की हिस्सेदारी के लिये लड़ना चाहिए। 


तुम साले को औरतों से ऊपर मत उठ पाना। भाड़ में जाओ। एक पैसे को भी बेकार हो। घर में भी एक औरत है। कभी उसका भी हाथ बंटा लिया करो। छिछोर गिरी से ऊपर उठ जाओ अब- बीबी जी ने चिल्लाते हुए कहा। चलता हूँ भाई और उनकी बहनों। मार नही खानी। लिखने को बहुत कुछ है पर दो बच्चे भी हैं। आप अपनी राय कमेंट में जरुर दें। चर्चा जारी रहेगी। फिर मिलेंगे….!

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