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सड़क सी है ये जिंदगी अपनी,
न जाने कितनों से वास्ता आज तक।
गुजरती भीड़ हज़ारों की मगर,
सड़क फिर भी तन्हा है आज तक।
बीती इस उम्र में न जाने,
मुलाकात कितनों से हुयी आज तक।
जीवन के इस सफर में बहुत मिले
पल-पल के हमसफ़र आज तक।
काम जब तक, ये साथ तब तक,
मतलबों के सब साथी आज तक।
अब तो बहरूपिया शब्द बेमतलब है
न जाने कितने रूप लिए आज तक।
तुम जो मिले चेहरे पर लेकर मुस्कान,
देखी नही ऐसी चासनी आज तक।
सामने तुम थी और हाथों में ट्रे चाय की थी,
रिश्ता ऐसा जुड़ा कि ऐसा फेविकॉल नही बना आज तक।
तन्हाई की क्या बिसात थी तुम्हारे आने के बाद,
पल भर सोचने को भी नही मिला आज तक।
बेमतलब लड़ाइयों का सिलसिला जो चला,
खुदा कसम, बदस्तूर जारी है आज तक।
