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रात (ज़िन्दगी की…)

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आधी रात को खिड़की से बाहर क्या देखूँ
फिर भी देखूँ तो रात के सन्नाटे में क्या ढूढूँ
ढूढूँ भी तो वर्षों की तन्हाई में किसे पुकारूँ
पुकारूँ तो हृदय की आवाज किसे सुनाऊँ?

आवाज बहुत है भीतर शोर बहुत है मगर
रात के सन्नाटे सा चेहरा ये शान्त बहुत है
दिन के भीषण कोलाहल से बचने को रात ने
आज कल अन्धेरे से कर ली यारी बहुत है।

रात के इस सफर को पूरी रात काटनी है
दिल के इस सफर को ये ज़िन्दगी काटनी है
रात ज़िन्दगी है या फिर ज़िन्दगी ही रात सी है
अब तो बस ज़िन्दगी की ये रात काटनी है।

अब तो बस बादल घिर जाएँ और बिजली चमक जाए
एक तेज आँधी चले और इस सर का छप्पर उड़ जाए
ऐ ज़िन्दगी अब कोई ख्वाहिश नहीं मैं कुछ और नहीं माँगूँगा
बस जम कर बारिश हो और फिर चमकीली धूप खिल जाए।

©️®️अनुनाद/आनन्द कनौजिया/२५.०३.२०२१

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