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पहनावा

“व्यक्ति को कपड़े पहनने का अधिकार होना चाहिए…. न पहनने का नहीं !”

सच लिखूँ तो बिना कपड़ों के तो केवल पशु-पक्षी ही ख़ूबसूरत दिखते हैं।

मानव प्रजाति तो कपड़ों में ही झेली जा सकती है वरना इससे बेकार देखने लायक़ दूसरी कोई चीज नहीं। झेला जाना मैंने इसलिए लिखा कि खूबसूरत होने के लिए कपड़ों के साथ व्यवहार का उत्तम होना भी अनिवार्य है।

हाँ कुछ डिज़ाइनर लोग कपड़ों को कुछ आड़ा-तिरछा काट एवं सिल कर इसमें भिन्नता तो ला सकते हैं पर कपड़े पहनना तब भी अनिवार्य है। “डोरियों को कपड़ों की संज्ञा नहीं दी जा सकती।”

निवेदन- जीवन सरल बनायें। इसलिए जो सम्भाल सकें उसे ही पहनें। उसके बाद ही आप अपनी, समाज और राष्ट्र की प्रगति के विषय में सोचने का मौक़ा निकाल पाएँगे!

नोट:- उपरोक्त सभी विचारों का बन्द कमरों से कोई वास्ता नहीं है। अपनी निजता के पलों में आप स्वयं ईश्वर हैं।

“Keep your privacy private.”

प्रणाम🙏

©️®️पहनावा/अनुनाद/आनन्द/०६.०१.२४

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दायरा

वो दायरा
जिससे बाहर रहकर
लोग तुमसे
बात करते हैं
मैं वो दायरा
तोड़ना चाहता हूँ
मैं तेरे इतना क़रीब
आना चाहता हूँ।

भीड़ में भी
सुन लूँ
तेरी हर बात
मैं तेरे होठों को
अपने कानों के
पास चाहता हूँ
मैं तेरे इतना क़रीब
आना चाहता हूँ।

स्पर्श से भी
काम न चले
सब सुन्न हो कुछ
महसूस न हो
तब भी तेरी धड़कन को
महसूस करना चाहता हूँ
मैं तेरे इतना क़रीब
आना चाहता हूँ।

चेहरे की सब
हरकत पढ़ लूँ
आँखों की सब
शर्म समझ लूँ
मैं तेरी साँसों से अपनी
साँसों की तकरार चाहता हूँ
मैं तेरे इतना क़रीब
आना चाहता हूँ।

दायरे सभी
ख़त्म करने को
मैं तेरा इक़रार
चाहता हूँ
हमारे प्यार को
परवान चढ़ा सकूँ
मैं तेरे इतना क़रीब
आना चाहता हूँ।

©️®️दायरा/अनुनाद/आनन्द/०५.११.२०२२

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सलीका !

कुछ इस तरह सलीके से जीने की कोशिश कर रहा हूँ
मैं अपने कमरे में हर टूटी हुई चीजें जोड़कर रख रहा हूँ।

टूटा बिखरा मेरा ये दिल है जिसको फिर से सँवार रहा हूँ
कुछ नहीं अब और टूटने को इसलिए बेख़ौफ़ चल रहा हूँ।

गँवा कर क़ीमती चीजों को दुःख तो बहुत हो रहा लेकिन
मैं अभी भी ज़िन्दा हूँ और बस इसी की ख़ुशियाँ मना रहा हूँ।

©️®️टूटा दिल/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/२१.१२.२०२१

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साथ

जीवन की उलझनों में भी कुछ इस तरह
मैं खुद से दूर अपनों का साथ निभा लेता हूँ,
रोज़ ईश्वर के समक्ष हाथ जोड़कर हृदय से
उनके खुश रहने की दुआ माँग लेता हूँ।

मैंने अपने आप और पूरे परिवार का
कुछ इस तरह भी इंश्योरेंस करा रखा है,
अपने से जुड़े व्यक्ति के आगे बढ़ने में
बढ़-चढ़ कर अपना हाथ लगा रखा है।

एक छोटी उम्र है और जिम्मेदारियाँ कई
इस सबमें रोज़ जीनी है ज़िंदगी भी नई
इतना कुछ अकेले कहाँ सम्भव आनन्द
लेकर अनुनाद मैं जुड़ा हूँ दिलों से कई।

©️®️साथ/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/२९.०८.२०२१

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मैं, बारिश और इश्क़…

बारिश
जब भी बरसती है
मुझ पर यूँ गिरती है
जैसी सूखी पथराई मिट्टी पर
छन से
और फिर गहरे उतर जाती है
रिसती चली जाती है
भीतर तक
धीरे-धीरे
और बदल देती है मुझे
कर देती है नम
इस पत्थर दिल को
जैसे तुमने किया था….

बारिश
जब भी बरसती है
मुझ पर यूँ गिरती है
जैसे सूखे धूल जमे पत्तों पर
धुल जाती है सारी धूल
बहा ले जाती है सारी गंदगी
और चमक उठते हैं पत्ते
इसी तरह जब तुम्हारी यादों पर
पड़ने लगती है धूल
तो ये बारिश करती है कमाल
भिगोती है ये मुझे और फिर
चमक उठती हैं तेरी यादें
मेरे मानस पटल पर।

बारिश
जब भी बरसती है
मुझ पर यूँ गिरती है
आती है खुशबू
सोंधी-सोंधी
मिट्टी की
हो उठता हूँ तरो-ताजा
महक उठता हूँ भरपूर
और खो जाता हूँ
कहीं दूर नीरव में
बिल्कुल वैसे जैसे
पहली बार तुम बगल में बैठे थे।

बारिश
जब भी बरसती है
मुझ पर यूँ गिरती है
पैदा करती हैं कम्पन
होता है स्पंदन
उठती है सिहरन
मचलता है चितवन
संभालने को धड़कन
मैं करता हूँ प्रयत्न
साधता हूँ मैं खुद को
बिल्कुल वैसे जैसे
तेरी पहली छुवन।

बारिश
जब भी बरसती है
मुझ पर यूँ गिरती है
जैसे ……

©️®️बारिश का असर/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/२९.०५.२०२१