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अब न जी पायेंगे…!

अब कोरोना से बच भी गए तो आगे कैसे जी पायेंगे,
जीना सीख भी गए तो पहले सा अब न जी पायेंगे।

दिल टूटता है गर तो कैसे भी इसे जोड़ ही ले जायेंगे,
तेरे जाने से चूर हुए दिल को भला कैसे जोड़ पायेंगे।

हमारे जीने में जो रंगत थी बरखुरदार तेरे होने से थी,
बेरंग इस दुनिया में तेरा जैसा रंग हैम कैसे ढूंढ़ पायेंगे।

तू साथ नहीं था फिर भी मिलने की उम्मीद तो रहती थी,
अब तेरी यादों का बोझ लेकर अकेले कैसे चल पायेंगे।

एक उम्र बीती है तेरे साथ सब कुछ बस तेरे होने से था,
इशारों में हो जाती थी बातें, किसी नए को क्या-२ समझायेंगे।

अब इस मौत की सुनामी से बच भी गए तो कैसे जी पायेंगे,
गोता लगाना सीख भी गए तो अकेले सतह पर क्यों आयेंगे।

अब कोरोना से बच भी गए तो आगे कैसे जी पायेंगे,
जीना सीख भी गए तो पहले सा अब न जी पायेंगे।

©️®️महामारी/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/३०.०४.२०२१

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गरीबी एक अभिशाप…

कैसे समाज का देखो मैं हिस्सा हूँ
किसको दिखलाता हूँ अपनी प्रगति
मैं सोऊँ मखमल, वो सोए सड़क
हृदय वेदना अश्रुपूर्ण, कैसी मेरी नियति।

भूखे-नंगे रोते-बिलखते बचपन से
फटे-चीथड़ों में लिपटे कोमल तन से
हाथ पसारे इन नन्हें कोमल हाथों से
देख आँख में इनके गड़ जाता हूँ शर्म से।

आँखों की ये खोई चमक
जेब में हाथों का खालीपन
दाल-रोटी की खोज में देखो
खो गया कीमती बचपन।

बचपन जो देख सकता था सपने
सपनों में बुन सकता था भविष्य
तंग हाथ से सुलझाने में है खोया
इस अनसुलझी भूख का रहस्य।

ऐसा कीमती बचपन सँवारने को
क्यों नहीं हम हाथ लगा सकते
इतनी अच्छी मिट्टी को गढ़ने को
क्यों नहीं कुम्हार हम बन सकते?

बनना है हमको विश्वगुरु
दिखलाना है जग को पथ
भूखा बचपन निराश मन
कैसे बढ़ेगा ये विशाल रथ?

आधार कार्ड का देश हमारा
पता है सबका पता ठिकाना
किसकी कितनी जरूरत है
नहीं कठिन है अब बतलाना।

पकड़-पकड़ कर सबको तुम
अब रोजी-रोटी दे सकते हो
खोने न पाए अब कोई बचपन
सुदृढ़ व्यवस्था कर सकते हो।

न दिखे कोई अब भीख माँगता
विश्वगुरु तुमसे इतना तो बनता
एक भी आदमी बिना काम के
ढूढने से भी अब न हो दिखता।

हर हाथ को काम हो
हर बचपन को हो शिक्षा
विश्वगुरु बनने की तब
पूरी होगी अभिलाषा।

मुक्तक

“वो कहते हैं देखो हो रहा चंहुओर विकास
हमने ही है दिखलाई सूखी आँखों को आस
मैं भी बोलूँ हँस कर इनसे, ऐ मेरे सावन के अन्धे
बन्द आँखे खुल चुकी, झूठ तुम रखो अपने पास।”

©️®️गरीबी एक अभिशाप/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/२१.०४.२०२१

फ़ोटो: साभार इंटरनेट

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अपरोक्ष अनियोजित हत्या (indirect unplanned murder)

आज हम अपनी मौत नहीं मर रहे, हम सिस्टम की दी हुयी मौत मर रहे हैं।

लिखते वक्त मन बहुत दुःखी है। लेकिन लिखना जरूरी है, अपने लिए और आपके लिए!

हत्या दो तरह की होती है।

  1. प्लांड मर्डर – जिसमें आप चाहकर किसी की गोली मारकर हत्या कर दें या इसी तरह से कुछ और …..! ये वन टू वन होती है और परिभाषित है और इसकी सजा तय है।
  2. अनप्लांड मर्डर-
    इस तरह की हत्या में मरने वाले व्यक्ति को, आवश्यक चीजें जिससे उसकी जान बच सकती थी, वो दी ही न जाये या फिर परिस्थितियाँ ऐसी उत्पन्न कर दी जाएँ की वो आवश्यक चीजें मिल ही न पाए। इसमें भी दो तरीके हैं-
    क. डायरेक्ट अनप्लांड मर्डर
    ख. इनडायरेक्ट अनप्लांड मर्डर

क में वह व्यक्ति/संस्था है जिसके पास जीवन रक्षक वस्तु उपलब्ध थी और वो आवश्यक वस्तु दे सकता था और उसने लापरवाही या इरादतन नहीं दी और जरूरतमंद व्यक्ति की मृत्यु हो गई। इसकी भी सजा तय की जा सकती है किन्तु प्रक्रिया लम्बी है।

में वह है जिसमें किसी भी चीज की उपलब्धता को एक तन्त्र बना हुआ है जिसे कोई शासन/प्रशासन/संस्था नियंत्रित करती है किन्तु यह शासन/प्रशासन/संस्था इतनी लचर हो कि वो आवश्यकताओं का सही आँकलन न करे या कर पाये और उन आवश्य्क वस्तुओं की कमी हो जाये जिससे किसी जरुरतमंद को अपनी जान गँवानी पड़ जाये। इस अनप्लांड मर्डर में मौतों की संख्या अधिक होती है। ये मौतें एक साथ भी हो सकती हैं या एक के बाद एक क्रम में। इसमें कोई एक व्यक्ति जिम्मेदार नहीं होता और न ही इसकी कोई परिभाषा तय है जिसके तहत सजा दी जा सके। बस अब हमें यही समझने की जरूरत है।

ये ख वाली स्थिति देश में हमेशा से चली आ रही है। अब हमें इसे परिभाषित करने की जरूरत है। जिम्मेदारी तय करने की जरूरत है। सजा देने की जरूरत है। अधिकतर ऐसे जिम्मेदार लोग शीर्ष पर बैठे होते हैं जो अपने प्रभाव से बच निकलते हैं या फिर किसी निर्दोष को जिम्मेदार बनाकर उसकी बारात निकाल देते हैं और फिर वो निर्दोष मुंह दिखाने लायक नहीं रहता और जनता-जनार्दन भी इस फैसले से संतोष कर लेती है।

ये अनप्लांड मर्डर हमारे सिस्टम में गहरे उतर चुके हैं या कहें तो सिस्टम बन चुके हैं। इसलिए अब ये सामने होते हुए भी दिखाई नहीं देते और आम जनमानस इसे अपना चुका है तथा किस्मत मानकर आपबीती को भगवान के ऊपर डालकर संतोष कर लेता है। ये इनडायरेक्ट अनप्लांड मर्डर, प्लांड मर्डर से कहीं ज्यादा खतरनाक हैं और इनकी एक घटना एक बड़े जन-समुदाय को प्रभावित करती है। घटना की व्यापकता को देखकर अब इस इनडायरेक्ट अनप्लांड मर्डर को प्लांड मर्डर की श्रेणी में रखते हुए निर्णय लेने की जरुरत है। समय आ गया है जिम्मेदारी तय करके सजा देने की जिससे भुक्तभोगी परिवार को न्याय मिल सके और दोबारा किसी अन्य के साथ ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति से बचा जा सके।

“आप समझदार पढ़े-लिखे और सिस्टम को करीब से देखने वालों में से हैं। आपका कोई करीबी बीमार है और उसकी स्थिति से आप वाकिफ हैं कि इस स्थिति में उसे ये निर्धारित उपचार मिल जाये और उस उपचार की कीमत भी देने को तैयार हैं फिर भी आपको सिस्टम की अव्यवस्था की वजह से वो उपचार नहीं मिल पाता। आपका वो करीबी किसी आइसोलेशन वार्ड में डाल दिया जाता है तथा उसकी कोई जानकारी जब आपको अगले १२-१४ घण्टे तक न दी जाये। आप कशमकश में रहे, कोई युक्ति न लगे और अंत में आपको उस करीबी की मौत की खबर दी जाये तो आप के आँखों के सामने अँधेरा छा जायेगा। आप बदहवास हो जायेंगे। सब कुछ लुटा हुवा सा महसूस होगा। असहाय, लाचार, बेबसी ! आप चीखना चाहते हो, मगर चीख नहीं सकते। रोना चाहते हो, मगर रो नहीं सकते। किसको दोष दें। समझदार व्यक्ति तो ईश्वर को भी दोष नहीं दे सकता। वो तो तर्क में विश्वास रखता है और ईश्वर तो तर्क-कुतर्क से ऊपर की बात है। आपको पता है कि वो करीबी बच सकता था लेकिन लापरवाही और अव्यवस्थाओं ने उसे असमय काल के गाल में भेज दिया।”

पिछले कुछ दिनों में बेहद करीब से ये दर्द महसूस किया है। विचलित हूँ। ये एक के साथ हुवा है। ये कई और लोगों की साथ भी हुवा है और हो रहा होगा। मेरे साथ हो सकता है। आपके साथ हो सकता है। ईश्वर से प्रार्थना है कि मेरे अंतस की आवाज उन नियंत्रकों तक पहुंच जाय जो इस सिस्टम को चला रहे हैं। ईश्वर सबको सद्बुद्धि दे। ईश्वर ऐसी दशा से बचायें। महामारी वापस जाये।

इस इनडायरेक्ट अनप्लांड मर्डर के कई रूप हैं। फिर इस तरह की इनडायरेक्ट अनप्लांड मर्डर का कोई और शिकार न हो !

आप सबके लिए प्रार्थना 🙏
ईश्वर सबको स्वस्थ एवं खुश रखे !

©️®️इनडायरेक्ट अनप्लांड मर्डर/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/१९.०४.२०२१

फोटू: साभार इण्टरनेट

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होम आइसोलेशन…

‘प्रेम साथ रहा तो बस जुदाई का डर लिए।
प्रेम वास्तव में तो सदा जुदाई में गए जिए।।”

इन पंक्तियों को अकेले में बैठकर हज़ार बार पढ़िए! गहरे डूब जायेंगे! जिन्होंने प्यार किया है वे एक बार में समझ जायेंगे…..उन्हें डूबने की जरूरत नहीं है, डूबे तो वे पहले से ही हैं… इनका कुछ नहीं हो सकता😜

अटैच फोटो को देखिए। दो दिन से होम आइसोलेशन में हूँ और मेरे सरकारी घर के इस कमरे से इस तरह का नज़ारा मिल रहा है। BHU के हॉस्टल के कमरे की याद आ गयी……
दोपहर में भर पेट छोला चावल खाकर लकड़ी के तख्त पर हल्का मोटा बिछावन, बगल में एक मसनद और सिराहने बाईं तरफ टेबल पर लैपटॉप पर गज़ल ……… बस हल्की पीली भागलपुरी चादर ओढ़ मस्त अजगर हुए जा रहे हैं हम!खिड़की से बाहर झाँके जा रहे हैं हम! सुख तो यही है बस! इससे ज्यादा इस दुनिया में ईश्वर से और क्या ही माँगूं! धरा पर इस समय कहीं स्वर्ग है तो इसी फोटू वाले कमरे में है।

गाना भी खूब बज उठा है …. लग जा गले की फिर कभी मुलाकात हो न हो…..( एक धीमी स्वर लहरी में महसूस कीजिये)। आहा……

एक चाय की तलब लग रही है… लिम्बड़ी कार्नर वाली… BHU के मित्रों के साथ …भर दुपहरी में… आम के पेड़ के नीचे बैठ….

घबराइये मत ! कुछ हुआ नहीं है! सिर्फ सावधानी बरत रहे हैं और अपनों की सुरक्षा की खातिर खुद को आइसोलेट कर रखा है।

बाकी सब ठीक है!

©️®️आइसोलेशन/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/१६.०४.२०२१

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कोरोना और देश की हालत !

मेरे लिए कोरोना आज तक एक शब्द ही था ! कुछ खबर, कुछ आँकड़े, कुछ मौतें, कुछ सिस्टम की नाकामी और कुछ कोरोना को लेकर सरकार के असफल निर्णयों को सफल घोषित करते और उनकी झूठी प्रशंसा करते पत्रकार…. मैंने लाकडाउन भी देखा और अपने कर्तव्यों के निर्वाहन हेतु लाकडाउन में अपने क्षेत्र में भी निकला। पूरी की पूरी पुलिस, आर्मी सब लगी थी लाकडाउन में! घर से ऑफिस जाने में कई बार चालान कटने तक की नौबत भी आयी….

कई बार मन में ये भी आया कि काश कोरोना पॉजिटिव की रिपोर्ट मिल जाये तो ऑफिस में २०-२१ दिन की छुट्टी भी ले लूँ ! दोस्तों से फ़ोन पर, ऑफिस में हर जगह बस गप्प ही गप्प! चाय की दुकान पर चाय भी पी रहे हैं, लैया-चना भी खा रहे हैं! रोज ऑनलाइन स्विग्गी और जोमैटो भी हो रहा है ! भाई वाह ! क्या कहने ! हम तो कोरोना काल को फुल एन्जॉय कर रहे थे ! डर था और कोरोना भी था ही! लेकिन बस बात भर को और हमारे दिमाग में बात करते क्षण भर को।

लेकिन कल रात को आँखें खुल गयी। जब एक मित्र के बड़े भाई को, ऑक्सीजन लेवल कम होने पर रात भर लखनऊ जैसे शहर में गाड़ी लेकर घूमते रहे और दर्जनों हॉस्पिटल्स ने सिरे से एडमिट करने से मना कर दिया। सरकारी हॉस्पिटल भी फुल चल रहे थे। कोविड हेल्प लाइन नंबर को खुद हेल्प की जरुरत थी! एक ही जवाब कि आई०सी०यू० की व्यवस्था नहीं है, बेड खाली नहीं है। मरीज के परिवार के आँखों में उदासी, अपने को खोने का डर, कुछ न कर पाने की लाचारी और मैं भी असहाय….! ये सब बेहद करीब से अनुभव किया मैंने।

ये सब देखने के बाद तो दिल में डर सा बस गया। लेकिन आज ये डर कोरोना से नहीं था। खराब सिस्टम और चिकित्सा व्यवस्था से था। अव्यवस्थित, अपंग और मूढ़ शासन-प्रशासन से था। माना कि ये महामारी का दौर है और कुछ चीजे नियंत्रण से बहार है लेकिन कोरोना को आये एक साल से ज्यादा हो गया। हमने वैक्सीन तो बना ली लेकिन सिस्टम अभी तक नहीं बना पाए। हॉस्पिटल्स नहीं बना पाए या क्षमता नहीं बढ़ा पाए। या फिर सच ये है की ये सब हमारे एजेंडे में ही नहीं है।

सारा विकास और लक्ष्यों की प्राप्ति केवल सरकार के सरकारी विज्ञापनों में हैं। साकार अपनी योजनाओं को विज्ञापन के माध्यम से लागू करती है, विज्ञापनों में पूरा भी कर लेती है और विज्ञापनों के माध्यम से खुद की पीठ भी थप-थपा लेती है। मजा आता है ये सब देखकर और अफ़सोस होता है अपने पढ़े-लिखे और समझदार होने पर ! ताज्जुब होता है कि ये सरकार हमने ही चुनी है न ? या किसी कंप्यूटर ने ?

अगर आप गरीब है तो आपके पास अपनी किस्मत और ईश्वर को कोसने के अलावा कुछ और नहीं है। यदि आप मध्यम वर्गीय है तो अपने पारिवारिक पृष्ठभूमि के साथ नौकरी और व्यवसाय को कोसने के अलावा कुछ और नहीं। सरकार और ईश्वर को कोस नहीं सकते आप। और यदि उच्चवर्गीय है तो आप भगवान और सरकार जैसी व्यवस्थाओं में समय नहीं बर्बाद करेंगे और अच्छी व्यवस्था तलाशेंगे भले ही वो किसी और देश में मिले। सरकारें तो खुद आपके सामने झोली फैलाएँ खड़ी मिलेंगी।

अंत में इतना कहूँगा की सिर्फ पढ़े-लिखे होना/दिखना जरुरी नहीं है। पढ़-लिखे जैसा बर्ताव भी जरुरी है। वरना कोई मूर्ख अपनी सरकार बना लेगा और अगले पांच साल तक वो विज्ञापनों के माध्यम से खुद को समझदार और आपको चूतिया साबित करता रहेगा।

देश आपका।

जान आपकी।

इस पर नियंत्रण आपका।

जीवन के लिए उचित सभी सुविधाएँ आसानी से उपलब्ध होनी चाहिए। इसकी माँग करिए। समझदारी से करिए। खुलकर करिए। जीवित रहिएगा तो ईश्वर की आराधना कर ही लीजियेगा।

आप सभी को प्रणाम 🙏

आशीर्वाद दीजिये कि स्वस्थ रहूँ और कुदृष्टि से बचा रहूँ 😆

किसकी कुदृष्टि ? ये मत पूछिए। जाने दीजिये।

धन्यवाद्।

©️®️कोरोना और देश/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/१५.०४.२०२१