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पर्दा

अगर पर्दा न होता

तो ये पर्दा हटने का इंतजार न होता . . . .

 

 

इंतजार का ही खेल सारा

इंतजार न होता

तो आनंद न होता !

 

 

सुनो न !

तुम जब आना

थोड़े पर्दे में आना

 

 

रखना पर्दा…..,

अपने हसीन चेहरे पर

बातों के लहजे पर

हरकतों के हलचल पर।

 

 

सुनो !

तुम इसे कोई जबरन दिया हुवा आदेश मत समझना

एक गुजारिश समझना !

 

 

तुम्हें

किसी की नज़र न लगे

मेरी भी

इसलिए सबकी नजरों से बचना ।

 

 

अगर ये पर्दा न होता

तो पर्दा हटने का इंतजार भी न होता

तुम हद से ज़्यादा ख़ूबसूरत न होते

मैं यूँ बेचैन न होता………!

 

 

सदा

बचा कर रखना

थोड़ा सा पर्दा…….

ⒸⓇ इंतजार और पर्दा/अनुनाद/आनन्द/२५.०७.२०२६



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जरूरी है !

दुनिया में आ गए हो तो आना अच्छा है मगर 

आने के बाद बिरादर यहाँ बने रहना जरूरी है।

पैरों पर खड़े हो गए तो बहुत अच्छा है लेकिन 

खड़े होने के बाद यहाँ लम्बा खड़ा रहना जरूरी है।

भूख लग जाए तो बेटा ये भूख कभी मिटने न देना 

मजा खाने का लेना है तो तुम्हारा भूखे रहना जरूरी है।

मत घबराओ इस आग से जो सीने में धधकती है 

विज्ञान कहता है कि जीवन के लिए गर्मी बहुत जरूरी है।

थोड़े अजीब हो तुम जो सुखों को देख कर डरते हो 

आनन्द जीवन का लेना हो तो दुखों का होना भी जरूरी है।

आनन्द परेशान रहते हो कुछ न कुछ पाने के लिए 

तरक्की के लिए तुम्हारे तुम्हें परेशान रहना जरूरी है।

ईश्वर अब जीवन के इस चरण में तुझसे और क्या माँगू 

जो मिला है उसे सम्भालने को तेरी कृपा का होना जरूरी है। 

दुनिया में आ गए हो आनन्द तो अनुनादित रहो खूब

आने के बाद यहाँ दिलों में सबके बने रहना जरूरी है।

©️®️जरूरी है/अनुनाद/आनंद/२४.१२.२०२४

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शुरुवात नई !

रात गई
बात गई
कल से फिर
शुरुवात नई।

इनने कही
उनने कही
क्या फ़र्क़ जो
सामने नहीं कही।

प्यार भी
दोस्ती भी
कुछ न मिला
तो कहानी सही ।

दिया खूब
मिला नहीं
वो मुस्कुराये
और क्या चाहिए।

कल भी
आज भी
ज़ेहन में
अभी भी ।

तुम और तुम
दुनिया और तुम
मैं और तुम
शानदार तीसरी पंक्ति।

हक़ भी
हद भी
मन भी
डर भी ।

तब २०१२
अब २०२४
तब साथ
अब याद ।

रात गई
बात गई
कल से फिर
शुरुवात नई।

©️®️शुरुवात नई /अनुनाद/आनन्द/२८.०७.२०२४

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मंज़िल और रास्ते

ग़र चाहते हो आनन्द मंज़िल पर पहुँचना,
मंज़िल से ज़्यादा रास्तों का ध्यान रखना।

तड़पते रह गये अपन मंज़िल की चाह में,
देखा ही नहीं कि तेरा गाँव भी था राह में।

समय कहाँ रुका है तेरे लिये या मेरे लिये,
निहारते बीते दौर को हाथों में तस्वीर लिए।

मैं फ़क़त ख़्वाब बुनता रहा तुझे पाने को,
रातों में सोया नहीं सोये भाग जगाने को।

मैंने लिखना छोड़ दिया अब क्या फ़ायदा,
भरे घावों को फिर कुरेदने से क्या फ़ायदा।

मैंने नशे करके भी देख लिये ऐ दिलरुबा,
ये कदम लड़खड़ाए तो बस तेरे नाम पर ।

नाम आनन्द है इसलिए खुश तो रहना ही था,
मुझे तेरा नाम और ये ग़म दोनों छुपाना ही था।

मैंने लिखना छोड़ दिया अब क्या फ़ायदा,
भरे घावों को फिर कुरेदने से क्या फ़ायदा।

©️®️मंज़िल और रास्ते/अनुनाद/आनन्द/२७.०४.२४

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मुस्कुरा दीजिए

यूँ भी क्यूँ इतना शर्म कीजिए,
इस ओर भी इक नज़र कीजिए …

परेशानी अपनी कुछ यूँ कम कीजिए,
कोई काम हो तो हमारा नाम लीजिए …

दिलों के सौदागर से एक सौदा कीजिए,
दिल की एक कहानी हमारे सुपुर्द कीजिए …

शोख़ इस चेहरे से क़िस्से हज़ार कीजिए,
बस इन क़िस्सों में नाम हमारा कीजिए …

स्याही ये लिखने की न यूँ जाया कीजिए,
सूखने से पहले कोई तो इशारा कीजिए …

मौक़ा निकाल कर लखनऊ घूम लीजिए,
कई पार्क हैं किसी में हमसे मिल लीजिए …

नवाबों के शहर में हैं बस इतना कीजिए,
देख कर हमारी ओर बस मुस्कुरा दीजिए …

©️®️मुस्कुरा दीजिए/अनुनाद/आनन्द/१७.१२.२०२३