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तेरा जाना…!

कुछ अच्छे लोगों का इतनी जल्दी,
ऊपर चले जाना भी अच्छा हुआ।
माना कि जमीं की खबर आसमां में
पहुँचाने का ये तरीका पुराना हुआ।।

तकनीकें नई खूब हैं सन्देश भेजने की मगर,
वो अपने खुदा का अंदाज जरा पुराना ठहरा।
दुवाएँ कुबूल करता है देखो वो खुद सामने से
वो खुदा भी तो अपने बंदों का दीवाना ठहरा।।

उम्मीद है मेरे साथी तू है वहाँ ऊपर
कि अब सब कुछ सम्भाल लेगा।
बरसेगी रहमत वहाँ तेरे होने से
खुदा का तू, थोड़ा हाथ बँटा लेगा।।

दुःख है मुझे तेरे जाने और
हम दोनों के अकेले हो जाने का।
मत घबराना तू वहाँ कि कौन सा
मेरा रिश्ता इस जमीं से जमाने का।।

(कोरोना काल मे साथ छोड़ कर जाने वाले कुछ महान शख्शियतों को समर्पित।)

©️®️तेरा जाना/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/०३.०५.२०२१

फोटो : साभार इंटरनेट

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अब न जी पायेंगे…!

अब कोरोना से बच भी गए तो आगे कैसे जी पायेंगे,
जीना सीख भी गए तो पहले सा अब न जी पायेंगे।

दिल टूटता है गर तो कैसे भी इसे जोड़ ही ले जायेंगे,
तेरे जाने से चूर हुए दिल को भला कैसे जोड़ पायेंगे।

हमारे जीने में जो रंगत थी बरखुरदार तेरे होने से थी,
बेरंग इस दुनिया में तेरा जैसा रंग हैम कैसे ढूंढ़ पायेंगे।

तू साथ नहीं था फिर भी मिलने की उम्मीद तो रहती थी,
अब तेरी यादों का बोझ लेकर अकेले कैसे चल पायेंगे।

एक उम्र बीती है तेरे साथ सब कुछ बस तेरे होने से था,
इशारों में हो जाती थी बातें, किसी नए को क्या-२ समझायेंगे।

अब इस मौत की सुनामी से बच भी गए तो कैसे जी पायेंगे,
गोता लगाना सीख भी गए तो अकेले सतह पर क्यों आयेंगे।

अब कोरोना से बच भी गए तो आगे कैसे जी पायेंगे,
जीना सीख भी गए तो पहले सा अब न जी पायेंगे।

©️®️महामारी/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/३०.०४.२०२१

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गरीबी एक अभिशाप…

कैसे समाज का देखो मैं हिस्सा हूँ
किसको दिखलाता हूँ अपनी प्रगति
मैं सोऊँ मखमल, वो सोए सड़क
हृदय वेदना अश्रुपूर्ण, कैसी मेरी नियति।

भूखे-नंगे रोते-बिलखते बचपन से
फटे-चीथड़ों में लिपटे कोमल तन से
हाथ पसारे इन नन्हें कोमल हाथों से
देख आँख में इनके गड़ जाता हूँ शर्म से।

आँखों की ये खोई चमक
जेब में हाथों का खालीपन
दाल-रोटी की खोज में देखो
खो गया कीमती बचपन।

बचपन जो देख सकता था सपने
सपनों में बुन सकता था भविष्य
तंग हाथ से सुलझाने में है खोया
इस अनसुलझी भूख का रहस्य।

ऐसा कीमती बचपन सँवारने को
क्यों नहीं हम हाथ लगा सकते
इतनी अच्छी मिट्टी को गढ़ने को
क्यों नहीं कुम्हार हम बन सकते?

बनना है हमको विश्वगुरु
दिखलाना है जग को पथ
भूखा बचपन निराश मन
कैसे बढ़ेगा ये विशाल रथ?

आधार कार्ड का देश हमारा
पता है सबका पता ठिकाना
किसकी कितनी जरूरत है
नहीं कठिन है अब बतलाना।

पकड़-पकड़ कर सबको तुम
अब रोजी-रोटी दे सकते हो
खोने न पाए अब कोई बचपन
सुदृढ़ व्यवस्था कर सकते हो।

न दिखे कोई अब भीख माँगता
विश्वगुरु तुमसे इतना तो बनता
एक भी आदमी बिना काम के
ढूढने से भी अब न हो दिखता।

हर हाथ को काम हो
हर बचपन को हो शिक्षा
विश्वगुरु बनने की तब
पूरी होगी अभिलाषा।

मुक्तक

“वो कहते हैं देखो हो रहा चंहुओर विकास
हमने ही है दिखलाई सूखी आँखों को आस
मैं भी बोलूँ हँस कर इनसे, ऐ मेरे सावन के अन्धे
बन्द आँखे खुल चुकी, झूठ तुम रखो अपने पास।”

©️®️गरीबी एक अभिशाप/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/२१.०४.२०२१

फ़ोटो: साभार इंटरनेट

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अभी बाकी है, समय जो बीत गया !

शहर अभी भी ज़िंदा है,

कुछ मुझमें कुछ तुझमें!

समय पुराना रुका हुआ है,

कुछ मुझमे कुछ तुझमें!

 

सब कुछ पहले जैसा है,

कुछ मुझमें कुछ तुझमें!

नज़र अभी वही है देखो,

कुछ मुझमें कुछ तुझमें!

 

बिछड़े थे तो दोनों का कुछ हिस्सा

इक-दूजे में छूट गया था,

पाने को उसको चाह बची है,

कुछ मुझमें कुछ तुझमें!

 

उम्र कितनी बीत गयी, मिले हुए,

तेरी भी और मेरी भी !

किन्तु! उम्र अभी भी इक्कीस है,

तेरी भी और मेरी भी !

 

वक़्त पुराना फिर जीना है,

मुझको भी और तुझको भी!

इक मुलाकात की दरकार है बस,

मुझको भी और तुझको भी!

 

लिखता हूँ महसूस करता हूँ,

खुदको भी तुझको भी!

शायद इन शब्दों में तुम पढ़ लेते हो,

खुदको भी मुझको भी!

 

अभी बाकी है, समय जो बीत गया,

कुछ मुझमें कुछ तुझमें!

दिल की उम्र अभी जवाँ है,

पूरी मुझमें पूरी तुझमें।

©️®️अनुनाद/आनन्द कनौजिया/१६ .०३ .२०२१