बारिश जब भी बरसती है मुझ पर यूँ गिरती है जैसी सूखी पथराई मिट्टी पर छन से और फिर गहरे उतर जाती है रिसती चली जाती है भीतर तक धीरे-धीरे और बदल देती है मुझे कर देती है नम इस पत्थर दिल को जैसे तुमने किया था….
बारिश जब भी बरसती है मुझ पर यूँ गिरती है जैसे सूखे धूल जमे पत्तों पर धुल जाती है सारी धूल बहा ले जाती है सारी गंदगी और चमक उठते हैं पत्ते इसी तरह जब तुम्हारी यादों पर पड़ने लगती है धूल तो ये बारिश करती है कमाल भिगोती है ये मुझे और फिर चमक उठती हैं तेरी यादें मेरे मानस पटल पर।
बारिश जब भी बरसती है मुझ पर यूँ गिरती है आती है खुशबू सोंधी-सोंधी मिट्टी की हो उठता हूँ तरो-ताजा महक उठता हूँ भरपूर और खो जाता हूँ कहीं दूर नीरव में बिल्कुल वैसे जैसे पहली बार तुम बगल में बैठे थे।
बारिश जब भी बरसती है मुझ पर यूँ गिरती है पैदा करती हैं कम्पन होता है स्पंदन उठती है सिहरन मचलता है चितवन संभालने को धड़कन मैं करता हूँ प्रयत्न साधता हूँ मैं खुद को बिल्कुल वैसे जैसे तेरी पहली छुवन।
बीती इस उम्र में एक अरसा देखा नंगे पैरों से चलकर आसमाँ देखा साइकिल की कैंची में घुसकर मैंने इन हाथों को स्टीयरिंग घुमाते देखा।
अनाज को खाने लायक बनाने में होती हज़ार कोशिशों को भी देखा जाँता-पहरुआ, मथनी से आगे बढ़ आटे-चावल का मैंने पैकेट भी देखा।
सुबह-सुबह ताल किनारे पंगत में हमने लोगों को निपटते भी देखा भर-दम उसी तलैया में नंगे बदन बच्चों की टोली को नहाते भी देखा।
कंचे, खो-खो, कबड्डी, गिल्ली-डण्डा कुश्ती करते मिट्टी में सने हुए देखा। चप्पल काट चक्कों की गाड़ी बनाना चौड़े में वही गाड़ी लेकर चलते देखा।
दुग्धी, खड़िया और लकड़ी की तख्ती सेंटे की लकड़ी से लिखते हुए भी देखा निब का पेन और चेलपौक की स्याही पायलट पेन के लिए खुद को रोते भी देखा।
हाईस्कूल, इंटर बोर्ड के पेपर का इंतजार पढ़ाकू लड़को की आँखों मे खौफ़ को देखा दिन रात रगड़ कर परीक्षा खूब दिए पर कम आए नम्बरो पर खुद को रोते भी देखा।
वो जवानी की दहलीज़ पर आकर हमने कॉलेज काशी बी एच यू घाट का नजारा देखा, बाबा विश्वनाथ और संकट मोचन का दुलार इसके साथ इश्क़ की गली से गुजरता देखा।
ज़िन्दगी बेहद खूबसूरत और लाजवाब है हमने इसके हर रूप को गंगा के पानी में देखा इंसान मिट्टी का है बहुत मजबूत मगर देखो दिल से होकर मजबूर इसे हमने रोते भी देखा।
थी तंगी चारों तरफ मगर कभी कोई डर नही हमने आईने में खुद को सदा मुस्कुराते देखा जीवन सरल करने के जब से पाए साधन सभी कट रही डर-डर कर ज़िन्दगी को भी देखा।
रहे गन्दे-सन्दे न कोई हाइजीन का शऊर हमने महीनों एक जीन्स को पहनते देखा मुँह को ढककर अब पल-पल धोते हैं हाथ हमने हर रोज पहने कपड़ों को बदलते देखा।
दिलों की दूरी तो पहले भी कम न थी हमने लोगों को छुप कर नज़रें चुराते देखा हे कोरोना तूने खेल बड़ा ही कमाल खेला अब लोगों को खुल कर दूरी बनाते देखा।
डरते-घबराते फिर भी खुद को सम्हालते तेरी क्रूरता में भी स्वयं को निखरते देखा सीख ही लेते हैं हम हर परिस्थिति में जीना ऐ ज़िन्दगी तुझे, हमने बेहद करीब से देखा।
बीती उम्र के इस छोटे सफर में हमने ऐ ज़िन्दगी तुझे, बेहद करीब से देखा।
तेरे बाद लखनऊ के वो किस्से कौन सुनाएगा ? लखनऊ को लखनऊ के बारे में कौन बताएगा??
इस शहर को जानने की ख्वाहिश अधूरी रह गयी आपसे मिलने की मेरी दिली तमन्ना अधूरी रह गयी।
शहरों को करीब से जानने की एक ललक है मुझमें… जब भी किसी गली-मुहल्ले और पुरानी इमारतों के बगल से गुजरता हूँ तो उनके होने के इतिहास में कहीं गुम हो जाता हूँ, या यूँ कहूँ की फ़्लैश बैक में ही जीता हूँ मैं! योगेश जी के बारे में और योगेश जी को पहली बार रेडियो पर सुना था। फिर तो उनके बारे में गूगल कर डाला। खूब पढ़ा उन्हें। खुश भी हुआ कि मैं भी लखनऊ में ही रहता हूँ, एक दिन मुलाकात कर ही लूँगा ! ख़ैर….. ईश्वर को आपसे मिलने की जल्दी मुझसे कहीं ज्यादा थी और ईश्वर के आगे किसी की चलती भी कहाँ है? अब आप ऊपर ही एक लखनऊ बसाइयेगा और वहां से धरती के लखनऊ पर अपनी कृपा दृष्टि और दुलार बनाये रखियेगा ताकि लखनऊ की विरासत सदा जिंदा रहे। अब तो आपका अधिकार क्षेत्र और नज़र और व्यापक हो गए है।
आपका जाना दुःख दायक है किंतु आप हमारे दिलों में सदा लखनऊ बनकर जीवित रहेंगें…….