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तेरा गाँव!

ज़िन्दगी के शेष सफ़र में काश
एक राह हमें ऐसी भी मिल जाए
हम निकले किसी और काम से
और रास्ते में तेरा गाँव आ जाए।

लाज शर्म नियम क़ायदे सब छोड़
होकर ढीत द्वार तेरे हम आ जाएँ
पाकर भनक हमारे आने की बस
तू बेसुध द्वार पार दौड़ी चली आए।

वर्षों की बिछड़न में देखे ख़्वाब सभी
हे प्रेम देव ऐसे भी सजीव हो जाएँ
जिस चेहरे को रोज़ तराशा सपनों में
वो स्वप्निल चेहरा सामने आ जाए।

ललित भावों से होकर हर्षित पुलकित
हृदय हमारा यूँ प्रफुल्लित हो जाए
मन के तपते शुष्क मरुस्थल पर ज्यूँ
प्यार की रिमझिम बारिश झर जाए।

©️®️तेरा गाँव/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/१७.०८.२०२१

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मिट्टी, बारिश और इश्क…

तेरे प्यार में यूँ भीग जाऊँ
जैसे बारिशों में ये मिट्टी ।

महसूस तुझे मैं करता हूँ
जैसे बारिशों में ये मिट्टी ।

मिलो तो अब ऐसे, जैसे
बारिश की बूंद से मिट्टी ।

दो रंग मिलकर एक रंग हों
जैसे बारिशों में ये मिट्टी ।

प्यार का एहसास साथ रह जाए
जैसे बारिश के बाद गीली मिट्टी ।

तुम्हारे जाने की तड़प ऐसी हो
जैसे बारिश के बाद सूखी मिट्टी ।

तेरे आने का इंतजार यूँ हो
जैसे बारिश के इंतजार में मिट्टी ।

तेरे आने का इंतजार खत्म हो
जैसे बारिश में खत्म इंतजार मिट्टी ।

तेरे लौटने का विश्वास यूँ हो, हर वर्ष जैसे
बारिशें गिरती हैं भिगोने को मिट्टी ।

तेरे लौटने पर आलम कुछ यूँ हो, जैसे
बारिशों में आनन्द को प्राप्त हो मिट्टी ।

©️®️बारिश और मिट्टी/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/१०.०५.२०२१