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उनींदी आँखें

नींद यूँ ही नहीं टूटती अक्सर रातों में,
किसी को खो देने से डरती ज़रूर होगी ।

आँखे यूँ ही बेवजह नहीं खुलती रात में
किसी को देखने की तड़प ज़रूर होगी।

बेचैनियों से भरा समुन्दर है इस दिल में,
सन्नाटे में लहरों की आवाज़ गूँजती होगी।

थकान बहुत है नींद में जाने को काफ़ी है,
दुनिया का ख़ौफ़ नहीं तन्हाई काटती होगी।

ग़ज़ब की लड़ाई है दिल और दिमाग़ में,
सोचना तो ठीक कर गुजरना बुराई होगी।

ये ग़ुस्सा तुम पर ही क्यूँ बहुत आता है, नासमझ!
ये एक बात तुमको कितने दफे समझाई होगी।

ये जो आज मिज़ाज बदले-बदले हैं जनाब के,
ज़रूर अब से सुधार जाने की क़सम खाई होगी।

नींद यूँ ही नहीं टूटती अक्सर रातों में,
ज़रूर कुछ रातें तेरे संग प्यार में बिताई होगी।

आँखे यूँ ही बेवजह नहीं खुलती रात में
फिर से देखने को तुझे तेरी याद आई होगी।

नींद यूँ ही नहीं टूटती अक्सर रातों में…….
आँखे यूँ ही बेवजह नहीं खुलती रात में…..
नींद और आँखो की है आपस में लड़ाई,
ये लड़ाई भी ज़रूर तूने कराई होगी…….!

©️®️उनींदी आँखे/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/२८.१२.२०२१

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सलीका !

कुछ इस तरह सलीके से जीने की कोशिश कर रहा हूँ
मैं अपने कमरे में हर टूटी हुई चीजें जोड़कर रख रहा हूँ।

टूटा बिखरा मेरा ये दिल है जिसको फिर से सँवार रहा हूँ
कुछ नहीं अब और टूटने को इसलिए बेख़ौफ़ चल रहा हूँ।

गँवा कर क़ीमती चीजों को दुःख तो बहुत हो रहा लेकिन
मैं अभी भी ज़िन्दा हूँ और बस इसी की ख़ुशियाँ मना रहा हूँ।

©️®️टूटा दिल/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/२१.१२.२०२१

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आतुर

तेरे स्वागत को
आज होकर तैयार
खड़े हैं
सब इंतज़ार में,
ये मौसम…
ये बारिश…
ये चाय…
और हम भी…
बोलो…
मिलने को तुमसे
गुज़ारिश
और कैसे करते?
इससे ज़्यादा
आतुरता
और कैसे दिखाते?
स्वागत को तुम्हारे
और किस-२ को
बुलाते?
©️®️आतुर/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/१६.०९.२०२१

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इस शहर में…

इस शहर में जीने के हैं रास्ते कई
पर अपनी शर्तों पर ज़िन्दगी यहाँ आसान नहीं।

जी हुज़ूरी में मिलती नित तरक़्क़ी नई
पर ग़लत को ग़लत कहना यहाँ आसान नहीं।

इधर-उधर बनाए रखिए नज़रें कई
काम से काम रखने से होता कोई काम नहीं।

ऊँचाई पर पहुँचने को, की कोशिशें कई
इस दौड़ में भीड़ से खुद को बचना आसान नहीं।

बनने को ख़ास हमने बदले कलेवर कई
इतने बदले कि अब अपनी शक़्ल तक याद नहीं।

इस शहर में रहते हैं बड़े नाम कई और
इन नामों में अपना नाम याद रखना आसान नहीं।

©️®️इस शहर में/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/१४.०९.२०२१

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कब लिखते हो?

वो पूछते है कि कब लिखते हो?
जब तुम जीवन की परेशानियों में बस परेशान होते हो,
तब मैं लिखता हूँ।

वो पूछते है कि कब लिखते हो?
जब बाहर का शोर मेरे भीतर के शोर के स्तर पर पहुँचता है,
तब मैं लिखता हूँ।

वो पूछते है कि कब लिखते हो?
जब माहौल का तनाव मेरे हृदय को छू कर चला जाता है,
तब मैं लिखता हूँ।

वो पूछते है कि कब लिखते हो?
जब कोई क्षुब्ध हृदय व्यथा चाहकर भी नहीं कह पाता है,
तब मैं लिखता हूँ।

वो पूछते है कि कब लिखते हो?
जब मैं बेहद खुश होता हूँ तो मैं उस पल को बस जीता हूँ,
तब मैं नहीं लिखता।

सुख से ज्यादा मुझे दुःख पसंद हैं!
संघर्ष के उन पलों में मैं अपना सर्वोत्तम संस्करण होता हूँ,
तब मैं लिखता हूँ।

©️®️लिखना/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/११.०९.२०२१