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इस शहर में…

इस शहर में जीने के हैं रास्ते कई
पर अपनी शर्तों पर ज़िन्दगी यहाँ आसान नहीं।

जी हुज़ूरी में मिलती नित तरक़्क़ी नई
पर ग़लत को ग़लत कहना यहाँ आसान नहीं।

इधर-उधर बनाए रखिए नज़रें कई
काम से काम रखने से होता कोई काम नहीं।

ऊँचाई पर पहुँचने को, की कोशिशें कई
इस दौड़ में भीड़ से खुद को बचना आसान नहीं।

बनने को ख़ास हमने बदले कलेवर कई
इतने बदले कि अब अपनी शक़्ल तक याद नहीं।

इस शहर में रहते हैं बड़े नाम कई और
इन नामों में अपना नाम याद रखना आसान नहीं।

©️®️इस शहर में/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/१४.०९.२०२१

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गरीबी एक अभिशाप…

कैसे समाज का देखो मैं हिस्सा हूँ
किसको दिखलाता हूँ अपनी प्रगति
मैं सोऊँ मखमल, वो सोए सड़क
हृदय वेदना अश्रुपूर्ण, कैसी मेरी नियति।

भूखे-नंगे रोते-बिलखते बचपन से
फटे-चीथड़ों में लिपटे कोमल तन से
हाथ पसारे इन नन्हें कोमल हाथों से
देख आँख में इनके गड़ जाता हूँ शर्म से।

आँखों की ये खोई चमक
जेब में हाथों का खालीपन
दाल-रोटी की खोज में देखो
खो गया कीमती बचपन।

बचपन जो देख सकता था सपने
सपनों में बुन सकता था भविष्य
तंग हाथ से सुलझाने में है खोया
इस अनसुलझी भूख का रहस्य।

ऐसा कीमती बचपन सँवारने को
क्यों नहीं हम हाथ लगा सकते
इतनी अच्छी मिट्टी को गढ़ने को
क्यों नहीं कुम्हार हम बन सकते?

बनना है हमको विश्वगुरु
दिखलाना है जग को पथ
भूखा बचपन निराश मन
कैसे बढ़ेगा ये विशाल रथ?

आधार कार्ड का देश हमारा
पता है सबका पता ठिकाना
किसकी कितनी जरूरत है
नहीं कठिन है अब बतलाना।

पकड़-पकड़ कर सबको तुम
अब रोजी-रोटी दे सकते हो
खोने न पाए अब कोई बचपन
सुदृढ़ व्यवस्था कर सकते हो।

न दिखे कोई अब भीख माँगता
विश्वगुरु तुमसे इतना तो बनता
एक भी आदमी बिना काम के
ढूढने से भी अब न हो दिखता।

हर हाथ को काम हो
हर बचपन को हो शिक्षा
विश्वगुरु बनने की तब
पूरी होगी अभिलाषा।

मुक्तक

“वो कहते हैं देखो हो रहा चंहुओर विकास
हमने ही है दिखलाई सूखी आँखों को आस
मैं भी बोलूँ हँस कर इनसे, ऐ मेरे सावन के अन्धे
बन्द आँखे खुल चुकी, झूठ तुम रखो अपने पास।”

©️®️गरीबी एक अभिशाप/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/२१.०४.२०२१

फ़ोटो: साभार इंटरनेट

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काम और छुट्टियाँ

छुटियाँ कितनी होनी चाहियें, इस पर पुनः विचार करने की जरूरत है। मेरे अनुसार सप्ताह में चार दिन काम और तीन दिन छुट्टी होनी चाहिए। अब आप सोच रहें होंगे कि अब काम ही काहे करोगे , पूरी छुट्टी ही ले लो। ऐसा नहीं है। एक व्यक्ति की ज़िंदगी में कार्य के अलावा भी और कई ज़िम्मेदारियाँ होती है। जैसे पारिवारिक, सामाजिक, और स्वयं अपने लिए भी कुछ समय होना जरूरी है।

चार दिन आदमी १०-१२ घंटे प्रत्येक दिन कार्य कर सकता है। मन लगाकर, जी तोड़कर। उसके बाद तीन दिन की छुट्टी में एक दिन व्यक्ति समाज के लिए रख ले। इसमें मित्र, रिश्ते-नाते, सामाजिक/राजनीतिक संगठनों से मिलना मिलना किया जा सकता है। दूसरा दिन परिवार के लिये। इसमें परिवार के साथ घर पर या बाहर जाया जा सकता है। परिवार के किस सदस्य के मन में क्या चल रहा है या फिर किस परिस्थिति से गुज़र रहा है ये सब समय देने से ही पता चलेगा। इससे आप परिवार को एक बेहतर आकर प्रदान कर सकते हैं।

और अब तीसरा दिन! पूरा का पूरा अपना। किसी से मतलब नहीं। सारा दिन स्वयं की तैयारियों में। अगले हफ्ते सात दिनों में क्या पहनना है! कपड़ों को तैयार करना! चेहरा और शरीर पर ध्यान देना! तेज आवाज में गाने सुनना, मूवी देखना, किताब पढ़ना, खाना बनाना, अपनी गाड़ी को व्यवस्थित करना, खूब सोना, और फिर रात में अगले दिन ऑफिस की तैयारी। मुझे पता है कि आप इससे सहमत होंगे। अब भला बताइए एक दिन की छुट्टी में कुछ होता है। पूरा दिन तो अगले हफ्ते की तैयारियों में ही निकल जाता है। जितना व्यक्ति पिछले छह दिनों में काम करके नहीं थकता उतना वह एक दिन की छुट्टी में थक जाता है। हें नहीं तो!

इस पोस्ट को हल्के में मत लीजियेगा। यदि कोई नीति नियन्ता इस पोस्ट से होकर गुजर रहें हो तो उनसे दण्डवत लेटकर अनुरोध है कि इस पर विचार कर लें। मेरी दुवा लगेगी।

क्या तीन दिन की छुट्टी ज्यादा है? अच्छा? कोई न! तीन न सही तो दो दिन की ही दे दीजियेगा! वो ऐसा है ना कि हम पहले ही सोच लिए थे कि तीन मांगेंगे तो दो मिलेगा! एक दिन हम भैया की साली से मिलने के लिए मांग लिए थे 😉 हमारा तो समाज वहीं हैं।😜

नोट:-छुट्टी नहीं भी मिलेगी तो हम क्या ही उखाड़ लेंगे! काम में लापरवाही तो हर कर्मचारी अपना हक तो समझता ही है और हमारे देश में नौकरी भी वही ढूंढी जाती है जिसमे काम कम हो या बिल्कुल न हो।😎😁

अनुनाद/आनन्द कनौजिया/०९.१२.२०२०

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हम बिजली अभियन्ता…..

नौकरी करने चले थे हम सरकारी,
क्या बताएँ बस मति गयी थी मारी।

बिजली अभियन्ता हैं बिजली हम बनाते हैं,
दूर-२ तक पहुँचाते और इसे घर-२ बाँटते हैं।

हवा पानी की तरह ही भाई बिजली भी ज़रूरी है,
है मँहगी मगर सबको सस्ती मिलनी ज़रूरी है।

आवश्यक चीज़ों-सेवाओं का कभी सौदा नही किया जा सकता,
प्रगति को ज़रूरी बिजली को लाभ के लिए बेचा नहीं जा सकता।

बिजली घर-२ की ज़रूरत है, इस हक़ को छीना नहीं जा सकता,
केवल मुनाफ़ा कमाने का इसको साधन बनाया नहीं जा सकता।

जब तक भारत देश से हमारे देखो ग़रीबी नहीं मिटती,
सरकारी सहयोग से ही सबको सस्ती बिजली मिल सकती।

व्यापारी तो केवल व्यापार करने आएँगे
बिना मुनाफ़े के वो क्या ही बिजली बेच पाएँगे।

जब बिजली बन जाएगी मुनाफ़े का सौदा तो सोचिए
क्या किसी गरीब के घर कभी रोशनी हो पाएगी ?

ये बिजली है आम जन मानस का हक़ और सबको ज़रूरी है,
बिना किसी लाभ-हानि के इस पर सरकारी नियंत्रण ज़रूरी है।

माना की कमियाँ हैं अभी कुछ हम सेवा प्रदाताओं में,
तकनीक के प्रयोग से किया जा सकता है सुधार इसमें।

हम बिजली अभियंताओं ने देश हित को क़सम ये खायी है,
करने को देश सेवा हमने न जाने कितनी नौकरियाँ ठुकरायीं हैं।

है योग्यता हममे, हम आज भी अपना हित साध सकते हैं,
हम किसी कोरपोरेट या फिर देश के बाहर भी जा सकते हैं।

मगर देश भक्ति का जज़्बा लिए हम सरकारी सेवाओं में आयें हैं
समाज की भलाई को लेकर हम सब संघर्षों को गले लगाएँ हैं।

निजीकरण बर्दाश्त नहीं ये हमारे और गरीब जनता के साथ धोखा है,
देश की प्रगति में साधक बिजली को हमने ही ग़लत हाथों में जाने से रोका है।

©️~अनुनाद/आनन्द कनौजिया/१७.०९.२०२०

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राम राज्य…….!

०५ अगस्त २०१९ दिन बुधवार,
तिथि ये कोई साधारण नहीं,
चेहरे आज ये जो शांत दिख रहे,
इनमें छुपा वर्षों का संघर्ष कहीं।

इतिहास तो हमने बहुत पढ़ा था,
आज आँखों से बनते देख रहा हूँ,
गर्व का क्षण है और खुश-किस्मती मेरी,
कीर्तिमान का शिलान्यास देख रहा हूँ।

राम नाम में ही छिपी,
न जाने कितनों की दुनिया,
चेहरे सबके सूखे थे,
प्यासी थी सबकी अँखियाँ।

जिस अयोध्या प्रभु जन्म लिए,
जिस घर भरी किलकारियाँ,
रूप सुहावन राम लला का
उनमें में बसती थी सारी खुशियाँ।

ये कैसा दुर्भाग्य हमारा था,
प्रभु से छिना उनका घर-द्वारा था,
क्षीण हुवा गौरव कौशलपुरी का,
उजड़ा भक्तों का संसार सारा था।

चहुँ ओर जब राम राज्य था,
कहते हैं सब नर में राम बसते थे,
सभी दिशाओं में थी सम्पन्नता
सुना है घी के दिए ही जलते थे।

अब जब राम लला फिर से,
विराजेंगे अपने घर आँगन,
प्रभु राम की कृपा से देखो,
पूरा देश हुवा है मस्त मगन।

गलत हुवा था या अब सही हुवा,
मैं इतिहास नहीं अब खोदूँगा,
राम राज्य की जो है कल्पना वो,
आये धरातल पर बस यही चाहूँगा।

बहुत हो गया द्वंद्व दो पक्षों में.
अब न शेष कोई विषमता हो,
प्रभु भारत देश में अब तो बस,
हिन्दू मुस्लिम में सम रसता हो।

हो जाएँ ख़त्म सारे भेद-भाव,
न ऊँच-नीच न कोई जात-पात,
समान शिक्षा और सबको रोजगार,
हो देश की उन्नति की बात।

सबका साथ सबका विकास हो,
समानता, सम्पन्नता ही हो सर्वस्व,
जगदगुरु बनने का मार्ग प्रशस्त हो,
स्थापित हो फिर से भारत का वर्चस्व।

सियावर राम चंद्र की जय !

सबके राम, सबमें राम !

~अनुनाद/ आनन्द कनौजिया/०५.०८.२०२०

राम लला
निमन्त्रण पत्र

भूमि पूजन