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रात आती क्यों है?

एक शाम की उम्मीद है अब मिलती नहीं क्यों है?
ये रात कमबख़्त तेरे बिना चली आती क्यों है?

बीतती शाम और आती रात से होती अब घबराहट क्यों है?
ये चाँद, सितारों और ठंडी हवा से होती शिकायत क्यों है?

अब तो छुट्टियों से डर लगता है न जाने ये मसला क्यों है?
बाहर का शोर तो ठीक लेकिन खामोशी से डर लगता क्यों है?

ये खाली सड़क, ये रोड लाइट ये सब खामोश क्यों हैं?
अकेले खड़ा मैं इधर, अगल-बगल में तू नही क्यों है?

बैठा हूँ बालकनी में शान्त मगर मन मेरा बेचैन क्यों है?
सब कुछ तो है पाया मैंने पर लगे कुछ खोया क्यों है?

खूबसूरत इन गमलों में फूल लगते इतने साधारण क्यों हैं?
खुशबुओं में इनकी मन मेरा तलाशता तेरा चेहरा क्यों है?

समय काटने को व्हिस्की है मगर इसमें न नशा क्यों है?
खत्म बोतल है पर अब न कोई हो रहा असर क्यों है?

दोस्त हों, दौर चले और बातें खूब हों मन ऐसा चाहता क्यों है?
उन बातों के दौर में जिक्र तेरा हो केवल, दिल चाहता क्यों है?

©️अनुनाद/आनन्द कनौजिया/१०.१०.२०२०

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बनारस तेरी याद आती है…

बहुत दिन हुए बनारस जाने को नही मिला,
लिखने को गीत-ग़ज़ल मोहब्बत का डोज़ नहीं मिला।

छाया है अंधेरा घनघोर दिल की तंग गलियों में ,
बनारस की गलियों में तेरे संग चलने को नहीं मिला।

ये दूरियाँ दरमियाँ तेरे-मेरे अब तो समझ के बाहर हैं,
मेरे कंधे पर तेरा सर और घाट पर बैठने को न मिला।

सर पर पल्लू, आँखें बन्द और चौखट पर मत्था तेरा टेकना,
आँखे सूनी हैं कि बाबा के दरबार में चेहरा तेरा देखने को नहीं मिला।

ज़रा सा हिलने-डुलने पर भी डर लगता है ज़िंदगी के भँवर में,
गँगा में नाव के हिलने पर कब से तेरा हाथ पकड़ने को नहीं मिला।

तेरे गर्म एहसासों में पिघल कर चाहूँ मैं पूरा का पूरा तुझ में घुल जाना,
गंगा के ठंडे पानी में पैरों को डाल तेरे संग शरारत को मौका नहीं मिला।

शाम ढलती है धीरे-२ और दिल में डर बढ़ने लगता है,
जमाने हो गए तेरे संग लिंबड़ी पर चाय पीने को नहीं मिला।

दिल में लगी आग को देखो अब तो ठंड नहीं मिलती,
वी० टी० पर तेरे संग कोल्ड कॉफ़ी पीने को नहीं मिलती।

फ़साने कई हैं तेरे मेरे काग़ज़ पर लिखने को लेकिन,
इन पर चढ़ी धूल को बहुत दिनों से उतारने को नहीं मिला।

क्या बताएँ बहुत ढूँढने से भी अब रस नहीं मिला,
बहुत दिन हुए बनारस जाने को नहीं मिला ।

©️अनुनाद/आनन्द कनौजिया/२२.०९.२०२०

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लखनऊ-एक खोज….!

मूलतः लखनऊ का नही हूँ मैं ! लेकिन २००६ से अध्ययन और नौकरी के चलते इससे जुड़ा रहा। वैसे लखनऊ से होकर गुजरना बचपन से ही होता रहा। पता नही क्यूँ इस शहर को लेकर मेरे मन में एक अलग कौतूहल और नजरिया होता था कि नवाबी शहर है, बड़े लोग रहते होंगे, कुछ अलग मिज़ाज के लोग मिलेंगे- बिल्कुल नवाबी, साहित्यिक टाइप, नृत्य और संगीत का शौक रखने वाले आदि-२। अवध की शाम कुछ खास होती होगी! जो कि बहुचर्चित भी है। शाम होते ही महफ़िलें सजती होंगी।लोग इकट्ठा होते होंगे। शेरो-शायरी का दौर और लतीफों के संग ठहाकों की गूंज। मेरा मानना था कि यहाँ की महफ़िलें और शहरों से कुछ जुदा होती होंगी। जब भी टेम्पो में बैठता और टेम्पो गोमती नदी को पार करते हुए लखनऊ यूनिवर्सिटी के बगल से गुजरता तो भाई-साहब पूछिये मत! क्या साहित्यिक और रेट्रो वाली फीलिंग आती थी हृदय में। एक गज़ब की ऐंठन उठती थी रोम-२ में। इस पर कहीं टेम्पो वाला ये गाना बजा दे- चलते-२ यूँ ही कोई मिल गया था….. सरे राह चलते-२ (पाकीजा)! तो मैं अपने अंदर के ज़हर को खुद नहीं सम्भाल पाता था और नीला हो जाता था😁। मेरी कल्पनाओं और टेम्पो वाली वास्तविकता दोनों मिलकर बिल्कुल अलग ही दुनिया के रास्ते खोल देती थीं। कोई थोड़ा और धक्का दे देता तो मैं पृथ्वी पर मिलता ही नहीं।

खैर….! नौकरी लगी। लखनऊ ही पोस्टिंग मिली। पोस्टिंग के शुरुवात में ही चौक क्षेत्र के बिजली अधिकारी। एक बार को तो विश्वास ही न हो कि मेरे साथ इतना अच्छा कैसे हो सकता है! चौक में मेरे जे०ई० रहे गोयल जी और थारू जी। बिल्कुल बिंदास प्रकृति के लोग। गोयल जी का गायन, मेरा कविता पाठ और थारू जी का आदर्श श्रोता होना एक किलर कॉम्बिनेशन था। शाम होते ही हम चौपाल लगा लेते। मेडिकल कॉलेज बिजलीघर की शाम शानदार होती थी। यूनिवर्सिटी से पढ़ कर आया था और मेडिकल यूनिवर्सिटी कैंपस में बैठकर मेडिकल स्टूडेंट्स को देखना मुझे हमेशा बी० एच० यू० पहुँचा देता। आखिरकार कॉलेज से निकले अभी दिन ही कितने हुए थे ! कुड़िया घाट की चर्चा कभी और होगी। कुछ दिन तो अच्छा लगा। फिर उसके बाद एक बेहद ही कम अन्तराल पर लखनऊ में ही अन्यत्र तैनाती मिल गई।

लखनऊ की झलक मुझे कुछ हद तक आफताब सर और अफसर हुसैन साहब में देखने को मिलती थी और उनके साथ बैठने में अच्छा भी लगता था। गज़ब की उर्दू अदब में लिपटी जुबान। कसम से बस सुनते ही रहे आप उन लोगों को। उस समय मेरा कार्यालय रेजीडेंसी के बगल वाले लेसू भवन में हुआ करता था। यहाँ तक तो ठीक था, मुझे लखनऊ का एहसास होता रहता था। दीप होटल में दोस्तों के साथ बैठना और फरमाइशी ग़ज़लों का दौर भी लखनऊ को ज़िंदा कर देता था कभी-२। दीप होटल जैसा होटल पूरे लखनऊ में नहीं। फिर समय बीतता गया और व्यस्तता बढ़ती गई। इस दौरान ४-५ वर्षों में कई लोगों से मुलाकात हुई। कुछ बड़े तो कुछ छोटे! सबमें कुछ न कुछ ढूंढता रहता। शायद जो लखनऊ मैं ढूंढ रहा था वो अब लोगों में बचा ही नहीं था।

इसके बाद मैंने अपनी लेखन के शौक पर ध्यान देना प्रारम्भ किया। कुछ पुस्तकों को शौकिया प्रकाशित भी किया गया। और फिर इस शौक ने थोड़ी पहचान दिलाई। जनाब वाहिद अली वाहिद साहब से भी साक्षात मुलाकात हुई। मेरा सौभाग्य था और आज भी है। लेखन की वजह से इंदौर जाने को भी मिला और कल्प एशिया के संयोजकों और संस्था से जुड़े कुछ अच्छे लोगों से मिलने को मिला! फिर उन लोगों को अपने लखनऊ भी बुलाया गया। लखनऊ यूनिवर्सिटी में एक साहित्यिक कार्यक्रम भी किया गया। बृज मौर्या और राम आशीष के सहयोग से। एक हरफनमौला किरदार पवन उपाध्याय जी से भी मुलाकात हुई। इस दौरान लखनऊ को करीब से जीने का मौका मिला। इतना सब कुछ किया गया तो केवल लखनऊ की खोज में ही। लखनऊ मिला लेकिन टुकड़ों में। टुकड़ों में इसलिए कह रहा हूँ कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी जरूरतों और इस टेक्नॉलजी के युग में आवश्यकता से अधिक व्यस्त हो गया है। व्यस्तता इतनी कि अब सुबह के बाद रात होती है, दोपहर और शाम नहीं होती। लखनऊ की शाम को मत खोजिये, वो अब नहीं मिलती।

नौकरी में प्रोन्नति मिल चुकी है। शायद लखनऊ छोड़ने का समय भी आ गया है। लेकिन मन असंतृप्त है। एक खोज है जो अधूरी रह गई। वो शाम नहीं मिली जिसकी कहानियाँ सुनते थे। कुछ महफ़िलों के आयोजन होते हैं किन्तु उनका मजा लेने के लिए आपका वी० आई० पी० होना जरुरी है लेकिन उनमें मजा नहीं होता केवल आव भगत करने या कराने में समय जाया जाता है। वो महफ़िल नहीं मिली जिसमें लखनऊ वाली गर्म-जोशी, मेहमान-नवाजी, शेरो-शायरी, संगीत, ग़ज़ल और लाल-काली युग्म की साड़ी में लिपटी तुम से एक हसीन मुलाकात हो 😍😛! खैर …… उस शाम की खोज अभी जारी है। लखनऊ में लखनऊ को खोज ही लेंगे……… एक दिन !

यदि लखनऊ से होकर गुजरना चाहते हैं तो नीचे दिए लिंक को जरूर चेक करें ! आपको अच्छा लगेगा।

एक लखनवी की लव स्टोरी…..https://anunaadak.com/2019/08/08/एक-लखनवी-की-लव-स्टोरी/

~अनुनाद/आनन्द कनौजिया/०९.०८.२०२०

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इश्क़ और तुम !

तुम पूर्ण रूप से काल्पनिक हो…… क्यूँकि जितनी पूर्ण (परफेक्ट) तुम हो उतना वास्तविक दुनिया में कोई नहीं हो सकता। वास्तविक दुनिया में अगर तुमको ढूंढा जाये तो तुम वह सर्वनाम हो जो थोड़ा-२ सबमें मिलता है किन्तु किसी एक में पूरा नहीं मिल सकता, कभी नहीं……… सम्भव ही नहीं। तुम जिस तरह मेरी सभी उम्मीदों पर खरा उतरते हो वो दैहिक परिधि में कैद व्यक्ति कभी कर ही नहीं सकता इसलिए तुम्हें कोई संज्ञा कहना उचित न होगा और तुम संज्ञा हो भी नहीं सकते। हर मिनट बदलने वाले मेरे मूड के अनुसार खुद को ढाल कर बिलकुल वैसे ही मेरे सामने खड़े हो जाना एक इंसान के लिए तो सोचना भी कठिन है। इसीलिए मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि तुम एक काल्पनिक चरित्र हो। 


चलो… भले ही तुम एक काल्पनिक चरित्र हो, लेकिन तुम हो……..! दूर बहुत दूर….. गहरे बहुत गहरे…..  प्रकाश शून्य घने अन्धकार में….. मेरे मन के किसी कोने में। तुमसे इश्क़ है मुझे ! तुम्हे एक सम्बल की भाँति इस्तमाल करता हूँ मैं। जब भी कमजोर पड़ता हूँ, तेरा हाथ पकड़ लेता हूँ। तुम ऐसे तो नहीं होते हो लेकिन जब भी कोई विशेष परिस्थिति उत्पन्न होती है तो तुम बगल में खड़े होते हो, मेरा हाथ पकड़ मुस्कुराते हुए मुझे निहारते….. कितने सुन्दर लगते हो ! अत्यन्त खूबसूरत ! तुमसे नज़रें हटाना मुश्किल ! पूरा वातावरण सुगन्धित ! मद्धम सा प्रकाश चारों ओर और हल्का कुहासा बिखरा हुआ ! एक दैविक शान्ति, सुकून और ठंडक मिलती है तुम्हारे होने से। घने बादलों में हो तुम ! बारिश में हो तुम ! सभी ऋतुओं और सभी दिशाओं में हो तुम ! बांसुरी सी खनकती तुम्हारी आवाज एक अमृत रस सा घोलती है ! सारे दुःख दूर हो जाते हैं तुम्हारे शब्दों को सुनकर ! तुमसे प्यार बहुत है और प्यार के प्रदर्शन को मुझे किसी समय के अधीन नहीं रहना पड़ता। इस भौतिक संसार में जितनी भी वस्तुएँ मुझे प्रिय हैं उनका आनन्द तुम्हारे बगैर नहीं। कुछ इस कदर तुमसे इश्क़ है मुझे !


बहुत सी कविताएँ लिखीं ! अक्सर तुम पर लिखीं ! बहुतों ने प्रश्न किया – कौन हैं वो? मैं मुस्कुरा दिया ! और करता भी क्या ? क्यूँकि पूँछने वाले एक भौतिक पहचान की तलाश करते हैं और वो तो है ही नहीं ! हो भी नहीं सकती ! कारण मैं ऊपर ही लिख चुका हूँ। मेरे ख्याल से होना भी नहीं चाहिए। आसक्ति पैदा होती है। लालच जन्म लेता है। खोने का डर उत्पन्न होता है। वैसे इन भावों से दो-चार हुआ भी हूँ, तभी तो कविताएँ लिखीं हैं। बिना भावों को महसूस किये कोई कैसे लिख सकता है ? और इसी में तो रस मिलता है। आप कहीं खो से जाते हो। चूँकि तुम काल्पनिक हो और मेरे द्वारा जन्मी हो तो इस रस की खोज में मैं खुद में ही डूबा रहता हूँ। मंद-२ मुस्कुराता और तुम्हारी संगत का मजा लेता। 


ऊपर इतना कुछ लिखने के बाद अगर आपको इस अनुभव के करीब न ले जाऊँ तो लेखनी से अन्याय होगा। क्यूँकि लिखने के दौरान सारा रस तो मैनें खुद ले लिया। आप भी तो कुछ रसास्वादन करें। तो लीजिये जानिए कि ये तुम कौन हैं। ये तुम मेरा रेडियो है, चारबाग़ और वाराणसी रेलवे स्टेशन हैं, रेलगाड़ी है, डाक-खाना है, वाराणसी के घाट हैं, माँ गंगा हैं, बाबा हैं, बी एच यू है, नई किताब की खुशबू है, बारिश है, लैंप-पोस्ट है, मेरी पर्सनल लाइब्रेरी है, कलम है, डायरी है, मेरा गांव है, खेतों की नाली में सिंचाई हेतु बहता पानी है, सावन के झूले हैं, भोजपुरी प्रेम और विवाह गीत हैं, कजरी-चैती हैं, धान की रोपाई है, ज्येष्ठ की दुपहरी में यारों के संग बाग़ में बैठना है, गोसाईंगंज की चाट है, मड़हा नदी है, सरयू नदी है, भीटी पुल है, असगवां मोड़ है, किसी नई जगह जाने को लेकर होने वाली तैयारी है, जूते चुराते भैया की साली है, लाल जोड़े में दुल्हन है, विवाह गीत है, या फिर तुम हो। 


हर किसी का कोई तुम है ! जरूर है। तभी वो इस संसार में जीवित है और आनंदित है। जिस दिन ये तुम ख़त्म हो जायेगा, जीवन जीने का मतलब ख़त्म हो जायेगा। ये लेख शुरू जिस अंदाज़ में किया गया और अगर उस गति को उसकी सही दिशा में ले जाता तो अध्यात्म की ओर चला जाता। असली आनन्द वहीं पर है, जिसे सूरदास ने भोगा, रसखान ने भोगा, मीरा ने भोगा, महादेवी वर्मा ने भोगा। दिव्य अनुभूति, अलौकिक आनन्द, ऐसा रस जिसका पान हो जाये तो मोक्ष ही मिल जाये। मैं महसूस करता हूँ। आपमें से भी कुछ ने किया होगा। अगर किया है तो आप भी मेरी तरह पागल हैं। क्यूंकि आपको और मुझको इस दुनिया का आम आदमी नहीं समझ सकता। हमारी बातें उनके सर के ऊपर से जाएँगी। हम समझ से परे हैं। बहुत कुछ नहीं लिखूँगा। वरना लोग आधे में छोड़ कर निकल लेंगे और मेरे लिखने का लालच पूरा नहीं होगा। आखिरकार ये भी तो मेरा तुम है। 


और हाँ यदि आप इस चर्चा को बढ़ाना चाहते हैं तो कमेंट बॉक्स में अपनी राय रखें। चौपाल वहीं लगेगी और दौर लम्बा चलेगा ! हम सब साथ चलेंगे, आनन्द की ओर…….. 

~अनुनाद/आनन्द कनौजिया/१९.०७.२०२०