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बचत

आज तक मेरे जितने भी शुभचिन्तक मुझे मिले उन्होंने मुझे बचत करने की सलाह दी। बोले बचत किया करो, जमीन लो, घर लो, भविष्य के लिए जमा करो, बुढ़ापा संवारो आदि-आदि….! मुझे भी बात अच्छी लगती कि लोग मेरे बारे में कितना सोचते हैं और मेरे भले की बात करते हैं। मैं भी बात गाँठ बाँध लेता कि किसी दिन फुर्सत से बैठूंगा और बचत की प्लानिंग करूँगा लेकिन करता कभी नहीं।

एक दिन सुबह-सुबह पूरी हिम्मत जुटाकर मैं डायरी लेकर बैठ गया हिसाब करने। पूरे जोश में घर में ऐलान कर दिए कि आज से बचत की जाएगी और सारा हिसाब नए सिरे से होगा। ये ऐलान सिर्फ बीवी को इम्प्रेस करने के लिए किया गया लेकिन उसने भाव शून्य चेहरे से मेरी तरफ देखा और मुंह फेर कर अपने काम में लग गयी। जैसे ये बात उसके लिए कोई मायने नहीं रखती या ये बात मैं बोल रहा था तो इसलिए इसे ऐसा ही रिस्पांस मिलना था। खैर…….. मैंने आज ठान लिया था !

कुछ देर की मशक्कत के बाद सारा हिसाब जोड़ने के बाद मैंने देर तक उस हिसाब को देखा। कुछ समझ नहीं आ रहा था कि कौन सा खर्चा कम करूँ। मुझे ज़िन्दगी जीने की तमीज नहीं या फिर मेरी गणित कमजोर है। बीवी जी हमेशा कहती हैं कि मैं पैसे लुटाता हूँ तो हार कर बीवी को ही बुला लिया कि वही कुछ हिसाब-किताब देख ले। बीवी ने सिरे से आने से मना कर दिया कि मुझे समय नहीं है इन फालतू कामों के लिए। मैंने मिन्नत की तो वो आयी और गौर से पूरे हिसाब को देखने के बाद मुँह बनाते हुए बोली कि फालतू के तुम और फालतू का तुम्हारा हिसाब ! मुझसे कोई मतलब नहीं। और हाँ नौकरों को हटाने की सोचना मत। मैं जा रही हूँ बच्चों को तैयार करने ! तुम्हें तो कोई काम धंधा है नहीं कि मेरी ही कोई मदद कर दो। सामान्यतः मैं ऐसी लानतों के बाद उसकी मदद कर देता हूँ मगर मैंने आज बचत करने की जो ठान ली थी …… मैं अपनी जगह से टस से मस नहीं हुवा।

कुछ देर बाद ऑफिस का समय हो गया और मैं तैयार होने चल दिया। पूरा दिन दिमाग में ये उलझन बनी रही कि बचत कैसे की जाये? और अगर ये बजट सही है तो फिर बचत कैसे होगी ? क्या पूरी ज़िन्दगी ऐसे ही गुजरेगी। कमाओ और खर्च करो। कमाने के नाम पर तो एक सैलरी ही है और वो जिस गति से बढ़ रही है उससे कहीं ज्यादा तेजी से मंहगाई बढ़ रही है। ऐसे ही चला तो बचत तो छोडो, खर्चा चलाना मुश्किल होने वाला है।

पिता जी का ज्ञान था कि पैर उतने फैलाओ जितनी चादर हो। किन्तु चादर बहुत छोटी हो तो एक दिन पैर सिकोड़े-२ ऐसी हालत हो जाएगी कि पैर ही जकड़ जायेंगे और फिर पैरों के न खुलने से चलना भी मुश्किल हो जायेगा। तो….. क्या नयी चादर लेने का समय आ गया है ? या फिर पुरानी चादर में जोड़ लगाकर इसे बढ़ाने का ? दोनों में से कुछ तो करना होगा या फिर दोनों ही करने होंगे।

बहुत गुणा गणित करने के बाद समझ आया की बेटे आनन्द तुम्हें बचत की जरुरत ही नहीं है। तुम्हे जरुरत है तो पैसे कमाने की। वही पैसे, जिसे कमाना तुम्हे सिखाया ही नहीं गया। किसी ने नहीं सिखाया। परिवार से लेकर रिश्तेदार, दोस्तों से लेकर करीबियों तक ने ! किसी ने पैसा कमाना नहीं सिखाया। और जरुरत के समय लोग तुमसे उम्मीद करते हैं कि तुम पैसे से उनकी मदद करो। अबे पैसे होंगे तब तो मदद करोगे न ?

अब पता चला कि लोग मुझसे नाराज क्यों रहते हैं ? जब वो मुझसे मदद माँगते मैं उन्हें ज्ञान देता, पैसे नहीं। पिता जी को ज्ञान, भाई को ज्ञान, बहन को ज्ञान, रिश्तेदारों को ज्ञान, सबको ज्ञान। पैसे कहाँ से देता। वो तो थे ही नहीं। या फिर कहूँ कि किसी ने पैसे कभी दिए ही नहीं ! या कैसे कमाते हैं कभी बताया ही नहीं। अब सबने जिंदगी भर पढ़ना-लिखना सिखाया। खूब ज्ञान दिया। ये ज्ञान दिन दूनी रत चौगनी वृद्धि करता रहा। और अब इतना ज्यादा ज्ञान हो गया है कि कोई कैसी भी मदद माँगे उसे मुझसे बस ज्ञान मिलता है। हद तो ये है कि मैं पिता को भी मदद के रूप में बस ज्ञान ही देता हूँ।

मसला ये है कि किसी ने आपके भले की नहीं सोची। माता-पिता ने अपने संरक्षण में रखा और खूब ज्ञान और प्यार दिया। लेकिन अपनी ममता में वो कहीं भूल गए कि इस दुनिया में उनके बाद बच्चे का साथ अगर कोई देगा तो वो है ज्ञान, उनकी वसीयत और पैसा कैसे बनाते हैं इसका तरीका। बच्चे से ज्ञान लेना किसी माँ-बाप को नहीं पसन्द! और अगर हम दे-दें तो पलट कर जवाब आएगा कि बेटे हमारा बाप बनने की कोशिश न करो! माँ-बाप के अलावा और कितने आपकी तरक्की चाहते हैं ये आप बेहतर जानते हैं।

तो कुल मिलाकर यही कहना है कि बचत करने का ज्ञान देने वाले आपके शुभ-चिंतक नहीं है बल्कि वो खुद अज्ञानी हैं और उन्हें दुनिया की जानकारी ही नहीं है। वे खुद अपना जीवन जैसे-तैसे काट रहे है। उन पर तरस खाएँ और ध्यान न दें। जब पैसे आएँगे तब बचत भी हो जाएगी। आपको केवल कमाने पर ध्यान देना चाहिए। बाकी बचत कराने की योजना लिए कई सेल्स मैन, कम्पनियाँ और रिश्तेदार घूम रहे हैं बाजार में !

तो अगर आपको अपने बुढ़ापे में अपने बच्चे से प्यार के अलावा मदद के रूप में पैसे की इच्छा हो तो उसे पैसा कमाना जरूर सिखाएं और हाँ पहले खुद पैसे कमाना जरूर सीख लें।

अगर आप कोई विशेषज्ञ राय रखते हो तो कमेंट में जरूर बताएँ। अच्छा लगेगा………

और हाँ

बचत करने का ज्ञान मुझे बिलकुल न दें 😎

हाँ….. पैसे कमाने को कोई तरीका हो तो जरूर बताएँ ! ईमानदारी के….. ईमानदारी से !

©️®️बचत/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/२२.१२.२०२१

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साथ

जीवन की उलझनों में भी कुछ इस तरह
मैं खुद से दूर अपनों का साथ निभा लेता हूँ,
रोज़ ईश्वर के समक्ष हाथ जोड़कर हृदय से
उनके खुश रहने की दुआ माँग लेता हूँ।

मैंने अपने आप और पूरे परिवार का
कुछ इस तरह भी इंश्योरेंस करा रखा है,
अपने से जुड़े व्यक्ति के आगे बढ़ने में
बढ़-चढ़ कर अपना हाथ लगा रखा है।

एक छोटी उम्र है और जिम्मेदारियाँ कई
इस सबमें रोज़ जीनी है ज़िंदगी भी नई
इतना कुछ अकेले कहाँ सम्भव आनन्द
लेकर अनुनाद मैं जुड़ा हूँ दिलों से कई।

©️®️साथ/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/२९.०८.२०२१

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ज़िन्दगी तुझे करीब से देखा…

बीती इस उम्र में एक अरसा देखा
नंगे पैरों से चलकर आसमाँ देखा
साइकिल की कैंची में घुसकर मैंने
इन हाथों को स्टीयरिंग घुमाते देखा।

अनाज को खाने लायक बनाने में
होती हज़ार कोशिशों को भी देखा
जाँता-पहरुआ, मथनी से आगे बढ़
आटे-चावल का मैंने पैकेट भी देखा।

सुबह-सुबह ताल किनारे पंगत में
हमने लोगों को निपटते भी देखा
भर-दम उसी तलैया में नंगे बदन
बच्चों की टोली को नहाते भी देखा।

कंचे, खो-खो, कबड्डी, गिल्ली-डण्डा
कुश्ती करते मिट्टी में सने हुए देखा।
चप्पल काट चक्कों की गाड़ी बनाना
चौड़े में वही गाड़ी लेकर चलते देखा।

दुग्धी, खड़िया और लकड़ी की तख्ती
सेंटे की लकड़ी से लिखते हुए भी देखा
निब का पेन और चेलपौक की स्याही
पायलट पेन के लिए खुद को रोते भी देखा।

हाईस्कूल, इंटर बोर्ड के पेपर का इंतजार
पढ़ाकू लड़को की आँखों मे खौफ़ को देखा
दिन रात रगड़ कर परीक्षा खूब दिए पर
कम आए नम्बरो पर खुद को रोते भी देखा।

वो जवानी की दहलीज़ पर आकर हमने
कॉलेज काशी बी एच यू घाट का नजारा देखा,
बाबा विश्वनाथ और संकट मोचन का दुलार
इसके साथ इश्क़ की गली से गुजरता देखा।

ज़िन्दगी बेहद खूबसूरत और लाजवाब है
हमने इसके हर रूप को गंगा के पानी में देखा
इंसान मिट्टी का है बहुत मजबूत मगर देखो
दिल से होकर मजबूर इसे हमने रोते भी देखा।

थी तंगी चारों तरफ मगर कभी कोई डर नही
हमने आईने में खुद को सदा मुस्कुराते देखा
जीवन सरल करने के जब से पाए साधन सभी
कट रही डर-डर कर ज़िन्दगी को भी देखा।

रहे गन्दे-सन्दे न कोई हाइजीन का शऊर
हमने महीनों एक जीन्स को पहनते देखा
मुँह को ढककर अब पल-पल धोते हैं हाथ
हमने हर रोज पहने कपड़ों को बदलते देखा।

दिलों की दूरी तो पहले भी कम न थी
हमने लोगों को छुप कर नज़रें चुराते देखा
हे कोरोना तूने खेल बड़ा ही कमाल खेला
अब लोगों को खुल कर दूरी बनाते देखा।

डरते-घबराते फिर भी खुद को सम्हालते
तेरी क्रूरता में भी स्वयं को निखरते देखा
सीख ही लेते हैं हम हर परिस्थिति में जीना
ऐ ज़िन्दगी तुझे, हमने बेहद करीब से देखा।

बीती उम्र के इस छोटे सफर में हमने
ऐ ज़िन्दगी तुझे, बेहद करीब से देखा।

©️®️ज़िन्दगी/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/२३.०५.२०२१

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साथ…(खुद का)

अकेले आये थे
अकेले जाना है
ये जीवन भी हमें
अकेले ही बिताना है।

इर्द-गिर्द की भीड़ छलावा
अपना न कोई नाता है
अकेलेपन का गीत
इसीलिए तो भाता है।

खुद का साथ
खुदा का साथ
जीवन सुख में
अपना ही हाथ।

ज्ञान का अभिमान
दिखाता अज्ञान
झुककर देखा
तभी मिला सम्मान।

बन्द मत करो
चार दीवारों में
खुलकर मिलो सबसे
खुशियाँ नज़ारों में।

करते रहो बातें
जीते रहो बेमिसाल
वरना उम्र का क्या
कट जाएगा ही साल।

अकेले आये थे
अकेले ही जाना है
ये जीवन भी हमें
अकेले ही बिताना है।

©️®️अनुनाद/आनन्द कनौजिया/२०.०३.२०२१

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शाम का चाँद

शाम का चाँद…… कितना अजीब लगता है न ! शायद न भी लगता हो ! लेकिन अगर सोच कर देखा जाये तो कुछ अजीब ही लगेगा। हमेशा से चाँद को रात में ही निकलना होता है या फिर हम उसके रात में ही निकलने की बात करते हैं। शायद हमने ही तय कर दिया है कि चाँद रात में निकलता है इसलिए जब कभी हम शाम में, रात से पहले चाँद को निकला हुआ देखते हैं तो अजीब लगता है। शायद रवायतें यूँ ही बनती हैं और जब कोई इन रवायतों से बाहर निकल कर कुछ अलग करता है तो उसकी ये हरकत अजीब अथवा पागलपन की श्रेणी में रखी जाती हैं।

आज शाम बालकनी में लगाए छोटी सी बागवानी में यूँ ही टहल रहा था तो चाँद पर नज़र पड़ी। अरे भाई … इन्हें इतनी जल्दी क्या थी जो अभी से चले आये ! कोई बात तो जरूर है ! हम ठहरे आशिक मिज़ाज आदमी ! सो हर किसी को इश्क़ में ही समझते हैं! तो हमें लगा कि हो न हो ये चाँद भी किसी के इश्क़ में जरूर है इसलिए जिसके इश्क़ में हैं उसके दर्शन को आतुर होकर समय का हिसाब रखना भूल गए। आतुरता तो बस देखते ही बन रही थी चाँद महाशय की। इतने कोहरे और इतने ठंड के बीच किसी को देखने की आस लगाए टिमटिमा रहे थे कि बस इनके महबूब की नज़र पड़ जाये इन पर और इनकी आज की हाज़िरी कुछ जल्दी लग जाये। दिल की बात तो कह नहीं सकते तो अपने हाव-भाव और आतुरता से सब जाहिर कर रहे थे। शायद इनके महबूब को इनकी इस अजीब हरकत से इनके इश्क़ का आभास हो जाये और इनका काम बन जाये।

प्यार में पड़ा व्यक्ति भी कुछ ऐसा ही होता है न ! हर वक़्त एक ही ख्याल ! सारी सुध-बुध खो बैठता है और होठों पर एक ही नाम – महबूब का! उसकी सुबह उसी के नाम से शुरू, शाम उसके इंतज़ार में और रात उसकी जुदाई में रोकर ख़त्म होती है। दुनिया की नज़र में ऐसा व्यक्ति पागल के सिवा कुछ और नहीं दिखता। ऐसा व्यक्ति रेडियो एक्टिव मैटेरियल जैसा होता है बिलकुल टूट कर बिखरने को तैयार ! बस कोई उसके सामने उसके महबूब का नाम रुपी न्यूट्रान उसकी ओर उछाल दे। हाहा……कितनी अजीब स्थिति होती है !शब्दों में बयाँ करना मुश्किल हैं इसलिए तो इंसान ने गीत संगीत धुन ग़ज़ल आदि रचे हैं और अपने दिल की बात करने को वाद्य यंत्रों का सहारा लेता है। वरना दिल के भावों को इतना सटीक संचारित कैसे किया जाता!

ईश्वर ने बहुत सोचकर ये शाम बनायी होगी। दिन और रात की सन्धि बेला। तुम्हारे बिना गुज़रते दिन को रोकने की कोशिश और तुम्हारे बिना आती रात से दूर भागने का प्रयास। ऐसे समय में तुम्हारा न होना ही ठीक है, बस एक मित्र हो जिससे तुम्हारीं बातें की जा सके ! ढेरों बातें ! बातें जो कभी ख़त्म न होंगी ! न जानें कितनी शामें और कितनी रातें कट सकती हैं तुम्हारी बातों में !

ये चाँद आज तुम्हारे लिए नहीं आया है…… ये किसी मित्र की खोज में आया है। जिसके साथ ये शाम गुज़ार सके, तुम्हारी बातें करते हुए। आज इसे मैं मिल गया! मैं भी बच कर निकलना चाह रहा था लेकिन बच न पाया और इसकी पूरी कहानी सुननी पड़ी। चाँद का यूँ भटकना, शाम और रात का ख्याल न रखना, नशेड़ियों की तरह कभी इधर तो कभी उधर, पागलों सी हरकत कोई अजीब और नयी चीज नहीं है। इश्क में पड़े व्यक्ति की ये बिलकुल सामान्य हरकत है !

दिल कुछ यूँ गुनगुनाता है कि :-

आज चाँद को शाम में ही निकला हुवा देखा,

तेरे इश्क़ में उसने समय का ख्याल ही नहीं रखा।

पाने को झलक तेरी वो दीवाना आतुर बड़ा था,

पागलपन में देखो वो रात से पहले आकर खड़ा था।

उसके इस क़दर बेवक़्त चले आने से बातें खूब बनेंगी,

मगर देखो बिन महबूब एक दीवाने की रात कैसे कटेगी।

अब चले ही आये हो तो बैठो कुछ पल को हमारे साथ,

बेचैन दिल को तुम्हारे अच्छा लगेगा इस दिल जले का साथ।

भटकना तुम्हारा और मेरी गली आ जाना कोई संयोग नहीं,

एक भटके हुए मुसाफ़िर का ठिकाना तुमको मिलेगा यहीं।

कुछ तुम अपनी सुनाना, कुछ हम अपनी आप बीती सुनाएंगे,

आज की पूरी रात हम दोनों बस उनकी बातों में ही बिताएंगे।

देखो चाँद एक नसीहत ले लो मेरी आगे काम आएगी,

यूँ बेवजह बेवक़्त न निकला करो वरना कहानी बन जाएगी।

जब भी निकलने का मन करे और दिल बेहद बेताब हो,

याद मुझको करना कि आ जाओ आज शाम कुछ बात हो।

ये दुनिया रवायतों की अजीब है, तुमको हमको न समझ पायेगी ,

इश्क़ करने वालों की बिरादरी ही तुम्हारी आतुरता समझ पायेगी।

देखो आगे से बेचैनी में बिना समय इधर-उधर न निकल जाना,

बहलाने को मन तुम दबे पैर चुपके से हमारी गली चले आना।

©️अनुनाद/आनन्द कनौजिया/२४.०१.२०२१