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प्रकृति सौंदर्य

अद्भुत है प्रकृति की सत्ता,
रची है खूबसूरत कविता।
शब्द कहाँ इतने ख़ूबसूरत ,
फूल-पत्तियों की ये कविता।

श्रृंगार कौन करता
रूप ये कैसे मिलता
बहारों का मौसम ये
तिनका-२ रिसता।

रूप ये करता मोहित
साँसों को सुगंधित
रोम-रोम हुआ हर्षित
और हृदय प्रफुल्लित।

होकर इनसे प्रेरित
मानव करता निर्मित
श्रृंगार के तरीके सौ
करने को उनको मोहित।

रूप दुल्हन सा होता है
बाँधने को दो दिलों को
फूलों सी मुस्कान जरूरी
तन से रूह तक उतरने को।

देखो ये फूल भी अब तो,
बनके श्रृंगार सामने हैं नजरों के,
सँवरने की क्या जरूरत, तुम बस
चले आओ दिल की ठंडक को।

©️अनुनाद/आनन्द कनौजिया/१२.१०.२०२०

Posted in CHAUPAAL (DIL SE DIL TAK)

कहाँ गए वो दिन !

एक व्यस्त दिन हो ! इतना व्यस्त कि ख़ुद की ही खबर न हो ! सर भन्नाया हुवा हो ! क्या कर रहे हैं और वाक़ई में क्या करना है, कुछ समझ न आ रहा हो ! जैसे-तैसे काम निपटाया गया ! शाम हो गयी ! फिर कुछ सोचें कि इससे पहले आपके घनिष्ठ मित्र का फ़ोन आ जाए !

अबे चलो कहीं बैठते हैं !

कहाँ?

अबे अपने अड्डे पर !

अच्छा वहीं ….!

हाँ!

ठीक है। मिलो वहीं पर । निकल रहा हूँ ।

बस सारा तनाव अपनी पसंदीदा पेय के अन्दर जाते ही छू मंतर 😆! पता नही कहाँ गए वो दिन ? इस मनहूस काल में उन दिनों की चर्चा करना ही कितना सुखद है और साथ में वो चीज़ अब न जाने कब करने को मिलेगी इसका दुःख भी ☹️🧐

आप भी ऐसे सुखद पल और अपना वर्तमान दुःख यहाँ साझा कर सकते हैं । खली बैठे हैं हम तो चर्चा कर ली जाएगी 🤣

~अनुनाद/आनन्द कनौजिया/०८.०८.२०२०

फ़ोटो ०५.०७.२०१७ की है ।