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दरबारी कवि ;)

नौकरी में आया ही था….. सरकारी नौकरी ! वो भी सीधे पब्लिक से जुडी हुई। जनता से सीधा संवाद। शब्दों को सम्भाल कर, सामने खड़े व्यक्ति की भाव भंगिमा देखते हुए, एक ही काम के लिए अलग-२ व्यक्ति से बिलकुल अलग बात और भिन्न फेशियल एक्सप्रेशन के साथ प्रस्तुत करने की कला मैंने यहीं सीखी। क्या काम करता हूँ ये नहीं समझा सकता और न ही बता सकता हूँ 🙂 खैर…….. ! आगे बढ़ते हैं ! नौकरी में मैंने अधिकारी की इकाई पर ज्वाइन किया। सो कोई भी समस्या मुझ तक पहले आती थी। एक दिन कार्यालय में बैठा था. नयी नौकरी के एक या दो महीने हुए होंगे! बधाइयों का दौर अभी चल रहा था। घमंड, गर्व और ख़ुशी की कई मुद्राओं में एक साथ रहता था। मैं अपनी कुर्सी पर बैठा अपना काम निपटा रहा था तभी एक वृद्ध व्यक्ति का कार्यालय में प्रवेश हुवा। आते ही बोल पड़े – वाह! अतिउत्तम, इतनी छोटी उम्र में अधिकारी। मैंने अपने जीवन में बहुत कम ही देखा। मजा आ गया। अच्छा लगता है आप जैसी मेधा देखकर। लेकिन एक बात बोलूंगा साहब! आपको आईएएस की तैयारी करनी थी। आपने अपने साथ अन्याय किया। एक बेहद ही कम समय अन्तराल में वह सज्जन न जाने क्या क्या बोल गए। मुझे सम्भलने का मौका भी नहीं दिए। प्रशंसा की इतनी पंक्तियाँ सुनकर मेरा प्रोसेसर हैंग हो गया। किस पंक्ति को प्रोसेस करूँ और किस पर खुश होऊं। प्रत्येक पंक्ति पर इतनी जल्दी-२ खुश कैसे हुवा जाये। थोड़ा समय तो मिलना चाहिए। मैं इस सबमे इतना मंत्र मुग्ध था कि तब तक वो सज्जन एक कागज़ निकाल कर सामने रख दिए और बोले सर, इस पर एक हस्ताक्षर चाहिए आपके ! छोटी सी चिड़िया बिठा दीजिये! हम भी बिना कुछ सोचे समझे कलम निकाल लिए कि लाओ ये तो मेरे बाएँ हाथ का काम है! आखिर मैं अधिकारी जो हूँ। हस्ताक्षर लगभग हो ही गए थे कि मेरे जे० ई० ने मुझे टोक दिया! सर रुकिए! और कागज़ ले लिया। बुरा तो बहुत लगा लेकिन उनकी उम्र और अनुभव देखकर शांत हो गया। बाद में पता चला कि उन सज्जन के यहाँ चोरी पकड़ी गयी थी और मेरे हस्ताक्षर लेकर बचना चाह रहे थे। बच गया मैं उस दिन!


शब्दों के प्रभाव को कमतर नहीं आँका जा सकता। मेरा अनुभव यही कहता है। लाख आपने डिग्रियां हासिल की हों, लेकिन शब्दों के प्रयोग की कला नहीं सीखी तो मान लीजिये आप चूतिये हैं ! शुरुवात के कुछ सालों को छोड़ दूँ तो मेरी नौकरी भी इसी की वजह से आसानी से चल रही है। बड़े-२ विद्वानों ने भी शब्दों के प्रयोग से ही महानता प्राप्त की है। इतिहास गवाह है। उठाकर देख लीजिये कोई भी पुस्तक। अब कुछ लोग इस कला को तेल लगाना भी कहते हैं। कहने दीजिये। बेचारे हैं वो लोग। इस कला से वंचित हैं…….. कुछ तो बोलेंगे ही। सबसे ज्यादा इस कला में माहिर होते थे दरबारी कवि। किसी एक का नाम नहीं लूँगा। प्रत्येक राजा के दरबार में एक कवि तो होता ही था जिसे दरबारी कवि का दर्जा प्राप्त होता था। राजा के सम्मान में एक से एक कसीदे पढ़ा करता था। बहादुरी पर कवितायें लिखा करता था। जनता में प्रचार-प्रसार किया जाता था इन कविताओं का। जनता के मन में राजा को महान बनाने में इन रचनाओं का खासा योगदान होता था। इसीलिए दरबारी कवि का महत्व सर्वोपरि होता था। और इसी महानता की छवि की वजह से राजा को राज-काज चलने में आसानी होती थी। अब आप दरबारी कवि को तेलू तो नहीं बुला सकते 🙂


दौर बदलता है किन्तु नियम नहीं बदलते। बस रूप बदलता है। आज भी दरबारी कवि मौजूद हैं। किसी व्यक्ति को भगवान तुल्य  महान बनाने के लिए उसकी कमियों को छुपाना तो पड़ता ही है और गुणों को बढ़ा-चढ़ा कर अलंकार में डुबो कर छंदों-चौपाइयों में लपेटकर परोसना पड़ता है। कमियाँ तो सबमें हैं लेकिन गिनी कमजोर व्यक्ति की ही जाती हैं। बड़े लोगों की नहीं! कभी नहीं। आज  के ज़माने में भी व्यक्ति को प्रभु बनाने की कला क्षीण नहीं हुयी है। २०१४ के बाद से तो इसका उत्तरोत्तर विकास ही हुआ है। विकास शब्द को गंभीरता से न लें 😉 हाँ…….. लेकिन दरबारी कवियों का रूप बदल गया है। आज कल ये काम न्यूज़ चैनल वाले करते हैं। प्रत्येक न्यूज़ चैनल वाला दूसरे न्यूज़ चैनल वाले से आगे निकले की होड़ में तो कभी-२ ऐसा कुछ भी बोल जाता है की कानों को विश्वास ही नहीं होता। मुझे याद है कि जब बचपन में रामायण और श्री कृष्णा देखते थे तो लगता था कि कोई समस्या नहीं होगी। प्रभु आएंगे और हाथ उठा कर दिखाएंगे, एक दिव्या रौशनी होगी और सब ठीक। मैं तब देश के नेताओं को भी इसी राम और कृष्ण भगवान की कैटेगरी में रखता था। मुझे याद है कि टीवी पर एक बार कोई नेता बाढ़ की स्थिति का जायजा हवाई जहाज से कर रहे थे। मैंने पिता जी से कहा कि नेता जी हाथ दिखाकर सब सही क्यों नहीं कर देते तो पिता जी हंस पड़े। बिलकुल ऐसी ही हंसी मुझे न्यूज़ चैनल वालों पर भी आती है। किसी देश को धूल चटानी हो तो ये चैनल वाले भारत के प्रधान मंत्री की एक बेहद ही गंभीर भाव भंगिमा वाली फोटू दिखा देंगे कि मानो ये वही बाप हों जो गुस्से में बैठे हैं और दुश्मन देश वो लौंडा है जिसने आज गलती की है और अब सुताई होगी ! हाहा….. सोचकर ही हंसी आती है। मैं तो उस न्यूज़ एंकर के बारे में सोचता हूँ कि पढ़ा लिखा तो वो होगा ही और तब वो ऐसे चूतियापे कर रहा है, वो अपनी हंसी कैसे रोकता होगा। अरे भाई दरबारी कवि बनो……. ठीक है ! मौके की जरुरत है। लेकिन बकचोदी थोड़ा तो कम करो। हंसा-हंसा कर मारने का इरादा है क्या ?


देश की सेना पर नाज है और गर्व भी। बचपन में मार्च पास करने में सीना चौड़ा हो जाता था। कलाम साहब के बारे में सुनता था रोंगटे खड़े हो जाते थे। तिरंगा पिक्चर आज भी पसंदीदा है। हाँ फ्यूज कंडक्टर वाली थ्योरी बेहद ही बेसिक थ्योरी निकली। लेकिन कोई बात नहीं। मिसाइल उड़ान नहीं भर पाया और और देश बच गया। फिलहाल प्रत्येक देश की सेना को अत्याधुनिक हथियारों की जरुरत पड़ती है। मजबूत होना अच्छी बात है। सीमाएं सुरक्षित होंगी तो ही हम प्रगति के बारे में सोच पाएँगे। अब तो राफेल भी आ गया ! अरे ! न! न! आप जोश में खड़े क्यों हो गए ? लगता है टीवी वालों का असर अभी बाकी है ! कोई न ! बैठ जाइये। वरना चीन के राष्ट्रपति को पसीना आ जायेगा और पाकिस्तान को हार्ट अटैक ! बैठे बिठाये दो देश नेस्त-नाबूत हो जायेंगे। आपसे बस इतना अनुरोध है कि चौड़े होकर किसी को गरिया मत दीजियेगा। टीवी और सोशल मीडिया पर बोलना अलग है और मोहल्ले में बाहर निकल कर बोलना अलग। किसी का दिमाग ख़राब हुआ तो पेले भी जा सकते हैं। मोहल्ले में ही चीन और पाकिस्तान सीमा जैसे हालात न बनाएँ। 


राम मंदिर बन ही रहा है। वैसे तो राम जी सदैव हमारे साथ थे किन्तु भव्यता अब अलग ही होगी। मैं प्रार्थना करता हूँ कि आप पर राम जी का आशीर्वाद बरसे और आपके अंदर का दरबारी कवि जागृत हो जाये और आपको भी कोई मेरे जैसा अधिकारी मिल जाये तो आपका काम बन जाये। 


राम जी इस बार किसी डॉक्टर या शोध शास्त्री के रूप में जन्म लीजिये और इस कोरोना की वैक्सीन खोज दीजिये। घर में बैठे-२ कलह बढ़ रहा है वरना राम राज्य बाद में आएगा पहले घर में महाभारत हो जाएगी। बस ज्यादा कुछ नहीं चाहिए आपसे। देश तो राफेल के हाथों में सुरक्षित है और दरबारी कवियों की वजह से हम महानता के उच्चतम शिखर पर मंत्रमुग्ध होकर अपनी समस्याएँ वैसे भी भूल चुके हैं। इस कोरोना के बुरे दौर में मनोरंजन की कमी नहीं है। 


जोर से बोलिये अयोध्या पति श्री राम चंद्र जी की जय ! प्रभु आपकी कृपा सब पर हो। 


~अनुनाद/आनन्द कनौजिया/०२.०८.२०२० 

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जरुरत……!

हमारे जीवन चरित्र के कई आयामों का निर्धारण हमारे जीवन में पड़ने वाली जरूरतों के पूरा या अधूरा रह जाने से उत्पन्न परिणामों से होता है। ये पहले वाली लाइन कुछ ज्यादा ही पेंचीदा हो गई, लिख तो दिया, लेकिन जब खुद दोबारा पढ़ा तो मैं खुद चक्कर खा गया। इसको साधारण भाषा में समझने की कोशिश करते हैं। हमारे जीवन में कुछ बेसिक जरूरतें होती हैं जिनके बिना हम जीवित ही नहीं रह सकते, जैसे- जल, भोजन, वायु इत्यादि। इसके बाद कुछ जरूरतें जीवन को आसान बनाने के लिए होती हैं, जैसे खाना पकाने के लिए लकड़ी का चूल्हा, गैस-सिलिंडर, माइक्रोवेव या फिर इंडक्शन। इसके बाद आता है सोशल स्टेटस बनाने वाली जरूरतें! ये जरूरतें जरूरत न होकर दिखावा ज्यादा होती हैं जिन्हें एक व्यक्ति सामने वाले के प्रभाव में आकर या फिर सामने वाले पर प्रभाव डालने के लिए करता है जैसे कार ही ले लो- इसमें ब्रांड ज्यादा मैटर करता है और कितना मंहगा ब्रांड है ये भी। अब आखिरी में आती है जरुरत जो आपके खुद के लालच के वजह से पैदा होती है जैसे एक नहीं चार घर, चार कारें कई किलो जेवरात इत्यादि। ये लालच कभी-२ अति सुरक्षा के भाव के वजह से भी आती है। मानव मन, क्या-२ न जमा कर ले! अपने लिए, अपनों के लिए।  


कोरोना काल में इन जरूरतों में अंतर समझ में आ गया। ये कोरोना कहाँ-२ पहुँच जाता है। मेरी लेखनी में इसका जिक्र आ ही जाता है, न चाहते हुए भी। आये भी क्यों न? जिस तरह महात्मा बुद्ध को बरगद के पेड़ के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई थी, उसी तरह मुझे कोरोना के काल और संरक्षण में ज्ञान की प्राप्ति हुई। इसे भी अब गुरु का दर्जा प्राप्त है मेरी ज़िन्दगी में। सिर्फ मेरी ही नहीं, और लोगों की जिंदगी में भी कोरोना का रोल गुरु से कम नहीं है। अब सफाई को ही ले लीजिए। सफाई अभियान को लेकर मोदी जी ने न जाने कितनी झाड़ू लगाई, लगवाई और कितने करोड़ का बजट भी खर्च कर दिया लेकिन लोगों को सफाई न सिखा पाए। कोरोना ने एक झटके में भारत जैसे देश को सफाई सिखा दी। सिर्फ एक ही सन्देश- सफाई रखिये वरना साफ़ हो जाएंगे। लेकिन इस कोरोना ने जरूरतों की फेहरिस्त में कुछ चीजें और बढ़ा दी- सैनीटाइजर और मास्क। अब महीने की तनख्वाह मिलने के बाद राशन के साथ-२ ये चीजें भी भराई जाएँगी। दुकान वाले भैया २-४ लीटर सैनीटाइजर और दर्ज़न भर मास्क भी डाल देना। और हाँ पिछली बार के सैनीटाइजर की क्वालिटी ठीक नहीं थी। बीवी से सुनने को मिल गया, दो-चार आशीर्वचन। इस बार ध्यान रखना। अगर आपको दुकान पर ऐसा कुछ देखने को मिल जाये तो ताज्जुब न करियेगा। आपके साथ भी हो सकता है। तैयार रहिएगा। 


कुछ भी हो पर दिल में शांति बहुत है। थोड़ी-बहुत समस्याएँ हैं पर वो पहले भी थीं। हमेशा रहेंगी। चुपचाप कार्यालय जाओ, काम निपटाओ और कभी कार्य स्थल पर कोई मुश्किल आ जाये तो कोरोना तो है ही न, वो बचा लेता है। उसके बाद सीधे घर आओ, पानी पियो और आराम करो। न किसी फंक्शन में जाने का टेंशन और न ही किसी का बुलावा। न ही पहले की तरह किसी के अचानक घर आ टपकने की टेंशन। पूरी शाम और रात अपनी। इतवार भी पूरा अपना। उठो। मंजन। नाश्ता। शेविंग। फेशियल किट से फेशियल। स्नान। फिर दोपहर के १२ बजे तक लंच। और फिर मसनद गले लगाकर फुफुवा के सोना। बिना किसी चिंता के। बच्चे होने के बाद से गले लगाने को मसनद ही मिलता है। शाम में मस्त लिखा गया। दुनिया भर की साइट पर पोस्ट किया गया। इसी बीच बीवी से दो-चार आशीर्वचन भी लिए गए और जल्दी से दिए गए निर्देशों का पालन कर पुनः सोशल साइट पर डाले गए पोस्ट पर आने वाले लाइक और कमेंट का इंतजार करने लगे। मतलब कि आप बस इतना समझिए कि कोरोना ने जीना सीखा दिया। सारी फिजूल की जरूरतों, रवायतों को ख़त्म कर दिया। खुद पर ध्यान देने को समय ही समय। 


कुल मिलाकर सुकून से जीने के लिए जितना हो सके, जरूरतें कम रखिए और साथ में बयाने भी।जान है तो जहान है। दूर से ही अपनों के हाल-चाल लेते रहिए। पैसे डिजिटली भेजे जा सकते हैं। होम डिलीवरी का जमाना है। अब तो सराकरें भी घर तक आकर डिलीवरी कर रही हैं। पैसा भी सीधे खाते में भेज रहीं हैं, बिना किसी कमीशन के! बाकी साथ रहने की इतनी चुल्ल है तो पढ़-लिख कर गाँव-घर से दूर जाने की क्या जरुरत थी? पड़े रहिए ….. शांति से! जहाँ भी हैं। अगल-बगल वालों को ही परिवार समझिए। घर से निकलने की जरुरत नहीं। मिलने-मिलाने की भी नहीं। मिलने से याद आया कि बहुत दिन हो गए भैया की साली से मिले हुए। मिस कर रहीं होंगी ! चले ही जाते हैं मिलने…….! अपनी गाड़ी से……. 🙂


और हाँ. . . .  प्ले स्टेशन-4 भी लेना है 😉 . . . !


~अनुनाद/आनन्द कनौजिया/११.०७.२०२०