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जाड़े की बारिश

जाड़े की पहली बारिश हो
तस्वीर में दिख रही छत हो
मैं शांत अकेले कुर्सी पर बैठा हूँ
टीन शेड पर रिमझिम की धुन हो।

सुन्दर मुग्ध ख्यालों में मन खोया हो
प्रकृति सौन्दर्य चहुँ ओर बरसता हो
करने को रस-पान इस अद्भुत रस का
कम पड़ता इन नयनों का बर्तन हो।

नाश्ते को तू रसोई से चीखती हो
मैं बना रहूँ अंजान तुझे छेड़ने को
सुनकर तेरे पायल की खन-खन मुझको
तेरे छत पर आने का पूर्वाभास हो।

छत पर तेरे कोमल पैरों की मधुर थाप हो
हाथों में चाय और चेहरे पर गुस्सा बेशुमार हो
पकड़ लूँ हाथ, तू पैर से मेरे पैर का अंगूठा दबा दे
इस खींच तान में उभरती तेरे चेहरे पर मुस्कान हो।

हार कर तू समर्पण कर दे और मुझे देखती हो
आँखों में उठ रहे ख्यालो को मेरे जैसे तू पढ़ती हो
रखने को मेरा मन तुमसे अच्छा और कौन समझेगा
खींच ली बगल में दूसरी कुर्सी तू संग मेरे बैठती हो।

क्या ब्लूटूथ क्या वाई-फाई चाहे कोई और कनेक्शन हो
दिल की बात कहने-समझने को बस आंखों में आँखे हो
कोई बुद्धिजीवी इन मृदु भावों की गति क्या ही मापेगा
जहाँ सिर्फ हाथों को छू भर लेने से सारा डाटा ट्रांसफर हो।

©️®️जाड़े की बारिश/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/२८.१२.२०२१

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एक!

वैसे तो एक और एक मिलकर दो होते हैं पर तुम्हारे और मेरे रिश्ते की गणित भी अजब है !

यहाँ…..

तुम भी “एक”, मैं भी “एक” और हम दोनों मिलकर भी “एक”!

शायद इस एक के अलावा जो “एक” अदृश्य है वही प्यार है।

या

मुझमें और तुझमें जो अनचाही/ग़ैर-ज़रूरती/नापसंद, चीज़ें/आदतें/इच्छाओं को त्याग कर जो कुछ भी हम दोनों में कम हुवा था उसे हम दोनों ने मिलकर पूरा कर दिया और फिर सदा के लिए “एक”हो गए।

वैसे प्यार गणितीय तर्कों को नहीं मानता और मेरा रसायन शास्त्र कमजोर है, इसलिए गणितीय फेरों में उलझा हुवा हूँ। वैसे हमारे रिश्ते की ऊपर की हुयी गणितीय व्याख्या भी कम व्यापक नहीं है।

©️®️एक/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/३०.०९.२०२१

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दिल और दुनियादारी

दिल और दुनियादारी
कितनी आसानी से लोग यहाँ दूसरों की गलती बता देते हैं,
जो ख्वाहिशों को जी गया, आनन्द बताओ वो गलत कैसे?

जिंदगी सफर है, मंजिल नहीं, सिर्फ आगे बढ़ना क्यूँ?
यहाँ रुकना भी जायज, चलना भी और पीछे मुड़ना भी!

सफर में साथ हो तो उम्मीदें लग ही जाती है मुसाफिर से,
यहाँ अपना भरोसा नहीं तो दूसरों पर बाजी क्या खेलना।

जीना है अगर सलीके से दुनिया में तो बस दिमाग रखिये,
दिल वाले न माने कोई नियम, तभी तो क़त्ल किये जाते हैं।

जो पकड़े गए चोर, जिसने कुबूल लिया वो मुजरिम लेकिन
सही बताओ जो बच गए वो क्या मुझसे नज़रें मिला पाएँगे।

नहीं आते समझ में मुझे इस दुनिया के कायदे कोई आनन्द,
दिल को इच्छाओं का कब्रगाह बनाना आखिर कहाँ तक ठीक है?

कितनी आसानी से लोग यहाँ दूसरों की गलती बता देते हैं,
जो ख्वाहिशों को जी गया, आनन्द बताओ वो गलत कैसे?

©️®️दिल और दुनियादारी/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/१४.०८.२०२१

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नया जीवन

मेरी तो बस यही एक चिंता और सारा ग़म है,
जीवन में कुछ भी करने को समय कितना कम है।

काम में समय ले लो तो उम्र निकल चली जाती है,
और सही उम्र पर काम करने को समय कितना कम है।

एक बार में कई काम करूँ या एक काम कई बार,
एक बार में एक काम से कहाँ भरता अपना मन है।

दैनिक दिनचर्या से हटकर कुछ भी अलग नहीं होता है,
रोज़ वही घिसी ज़िन्दगी जीने का अब मेरा नहीं मन है।

कुछ नया हासिल करने को थोड़ा ठहर सोचना होगा,
कुछ नया करे बिना देखो कहाँ मिलता नया जीवन है।

©️®️नया जीवन/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/०२.०८.२०२१

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निज़ात

काश कि मेरा सब कुछ छिन जाए
इस तरह भी तो दुख से निज़ात पाया जाए!

हद से ज्यादा हो गईं अब तो शिकायतें
सभी चिट्ठियों को बिन पढ़े जला दिया जाए!

दिल में घाव अब बहुत सारे हो गए हैं
मेरे हक़ीम से अब तो खंजर छीन लिया जाए!

साथ तेरा किसी बोझ से कम नहीं
क्यों न अब ये बोझ दिल से उतार दिया जाए?

साथ चल नहीं सकते साथ रुक तो सकते हैं
मगर पीछे चलने की आदत अब तो छोड़ दी जाए!

दूर थे तो तब बात कुछ और थी आनन्द
पास रहकर भी बोलो अब दूर कैसे रहा जाए!

मैं बेचैन करवटें बदलता रहा रात भर
इस चाहत में कि अब तो मेरा हाल पूँछ लिया जाए!

बहुत कुछ खो दूँगा इस तरह मैं, तो क्या
चलो फिर से एक मुकम्मल शुरुआत की जाए!

काश कि मेरा सब कुछ छिन जाए
इस तरह भी तो दुख से निज़ात पाया जाए!

©️®️निज़ात/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/२६.०७.२०२१