मैं तुम्हारे साथ हूँ, बोलने से सिर्फ साथ नहीं होता। साथ होता है साथ बैठने से घंटो, बेवजह! इतना कि किसी भी विषय पर दोनों की अलग-२ राय मिलकर एक हो जाय।
और फिर दोनों को दोनों की चिंता करने की “कोशिश” न करनी पड़े। बोलने की जरूरत न पड़े। कोई फॉर्मेलिटी या संकोच न रहे। सही मायने में साथ होता है साथ बैठने से!