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चेहरा तेरा!

चम-चम चाँदनी रात की,
कहानियाँ भी खूब बनी हैं,
चमकते चाँद की हमने
तारीफ भी खूब सुनी हैं।

देख कर चेहरा ये चमकीला
अब दुविधा बड़ी खड़ी है,
ये कुदरत लाजवाब है कि
उसकी रचना उससे बड़ी है।

चमकते चेहरे की शोखियाँ
आंखों को भाती बड़ी है,
लगती है चौंध आंखों को
जैसे किरणों की लड़ी है।

नूरानी चेहरे के कैनवास पर
रेखाएँ मुस्कान की खींच रखी है,
जुल्फों पर रोशनी की चमकीली
तितलियाँ ढ़ेरों बिठा रखी हैं।

एक चमक सूरज की जिससे
तेज धूप है, लगती लू बड़ी है,
और एक चमक तेरे चेहरे की
जिसकी छाँव में ठंडक बड़ी है।

साधारण से इस चित्र में तेरे देखो
चेहरे की आभा असाधारण बड़ी है,
करने को अभिव्यक्ति इस नूर की
कलम मेरी यात्रा को निकल पड़ी है।

©️®️चेहरा/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/०६.०४.२०२१

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होली हो…

रंग होली के, तेरा रंग मिले
तो होली हो!
टोली होली के, तेरा संग मिले
तो होली हो!
गाल गुलाबी लाल करूँ, गाल तेरे हों
तो होली हो!
पिचकारी साधूँ, निशाना तुम हो
तो होली हो!

रंग मेरा पहला, ख्वाहिश तेरी हो
तो होली हो!
सुबह होली की, सामने तुम हो
तो होली हो!
वर्षों की प्यास, जो आज बुझे
तो होली हो!
रंग दूँ तेरी चूनर, मैं आज धानी
तो होली हो!

तुम बचकर भागो, मैं पकड़ूँ
तो होली हो!
पकड़ रूपट्टा लूँ, तुम सकुचाओ
तो होली हो!
भर लूँ बाहों में, दिल धक से हो
तो होली हो!
प्रेम भाव ही आनन्द, ये आनंद मिले
तो होली हो!

फगुआ बयार, नशा तेरा हो
तो होली हो!
सबको अपना मन-मीत मिले
तो होली हो!
रंग से रंग यूँ मिले, ख़त्म हो भेद सभी
तो होली हो!
तेरा मेरा रंग मिल कर, रंग अनोखा हो
तो होली हो!

होली की शुभकामनाएँ🎉💐

©️®️होली/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/२९.०३.२०२१

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अनुनादित आनन्द

चीजें पुरानी देखकर तुम जो आज मेरी मुफ़लिसी पर हंसते हो,
नए अमीर तुम पुश्तैनी खजाने की कीमत कहाँ आँक सकते हो!

शहर में हर कोई नहीं वाक़िफ़ तेरे हुनर और ऐब से आनन्द
मेरी मानें तो घर से निकलते वक़्त अच्छा दिखना ज़रूरी है।

खुद को खुदा करने को, इतना झाँक चुके हैं अपने भीतर
इतनी गंदगी, कि कोई पैमाना नहीं, टूट चुके हैं सारे मीटर!

हम यूँ ही आज लिखने बैठे, सफेद पेज को गंदा करने बैठे
अच्छा करने में दामन होते दागदार ये सबक हम लेकर उठे।

खुदा करे ये सफेद दामन मेरा भले कामों से दागदार हो जाए,
नाम बदनाम हो सही है, पर लोगों का दिन ख़ुशगवार हो जाए।

मैं तो जी रहा था अपनी धुन में कहीं और इस ब्रम्हांड में,
इस धरा को करने आया अनुनादित मैं अपने आनन्द में।

©️®️अनुनाद/आनन्द कनौजिया/२०.०३.२०२१

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साथ…(खुद का)

अकेले आये थे
अकेले जाना है
ये जीवन भी हमें
अकेले ही बिताना है।

इर्द-गिर्द की भीड़ छलावा
अपना न कोई नाता है
अकेलेपन का गीत
इसीलिए तो भाता है।

खुद का साथ
खुदा का साथ
जीवन सुख में
अपना ही हाथ।

ज्ञान का अभिमान
दिखाता अज्ञान
झुककर देखा
तभी मिला सम्मान।

बन्द मत करो
चार दीवारों में
खुलकर मिलो सबसे
खुशियाँ नज़ारों में।

करते रहो बातें
जीते रहो बेमिसाल
वरना उम्र का क्या
कट जाएगा ही साल।

अकेले आये थे
अकेले ही जाना है
ये जीवन भी हमें
अकेले ही बिताना है।

©️®️अनुनाद/आनन्द कनौजिया/२०.०३.२०२१

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कवि या शिकारी !

शख़्श एक, भाव कई, शब्द अनेक,शब्दों से बुनते जाल में फँसा कवि एक।


क्रोध मोह लोभ, दिल के शिकारी कई,भावों का चारा देखकर, होते शिकार कई।


©️®️ अनुनाद/आनन्द कनौजिया/१२.०२.२०२१