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साथ

जीवन की उलझनों में भी कुछ इस तरह
मैं खुद से दूर अपनों का साथ निभा लेता हूँ,
रोज़ ईश्वर के समक्ष हाथ जोड़कर हृदय से
उनके खुश रहने की दुआ माँग लेता हूँ।

मैंने अपने आप और पूरे परिवार का
कुछ इस तरह भी इंश्योरेंस करा रखा है,
अपने से जुड़े व्यक्ति के आगे बढ़ने में
बढ़-चढ़ कर अपना हाथ लगा रखा है।

एक छोटी उम्र है और जिम्मेदारियाँ कई
इस सबमें रोज़ जीनी है ज़िंदगी भी नई
इतना कुछ अकेले कहाँ सम्भव आनन्द
लेकर अनुनाद मैं जुड़ा हूँ दिलों से कई।

©️®️साथ/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/२९.०८.२०२१

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बी एच यू (मेरी नज़र से)

बाबा महादेव की नगरी हो, बी एच यू का प्राँगढ़ हो,
नाम तेरा होंठो पर हो और दिल में तेरी दी बेचैनी हो।

आई टी का मन में घमंड हो, चले तो सीना चौड़ा हो,
हॉस्टल की शाम सुहानी हो, खून में भरपूर रवानी हो।

उमा जैसा लव गुरु हो, बिरजू का बेवजह का रोना हो,
राधे माँ का तांडव हो औऱ मालिक की लचकती कमर हो।

दबंग का ज्योतिष दर्शन हो, बज्जर का टट्टी सा मुंह हो,
प्रेम की मासूम मुस्कान हो, भानु पापा की छत्र-छाया हो।

मरतोलिया की कम होती लम्बाई हो, राजा जी की तोंद हो,
अल्बर्ट का नींबू पानी हो और पिछली रात का हैंग ओवर हो।

अमित सर की बाइक हो, उस पर मेरा ग़ायब होना हो,
सरपट बनारस में दौड़ती हो, नज़रें केवल तुझको ढूँढती हो।

चारों तरफ अपने यार हों, महफिलें होती खूब गुलजार हों,
करने को मौज बहुत हो फिर भी बिन तेरे मन न लगता हो।

धनराजगिरी का कमरा हो, लिम्बड़ी कार्नर की गर्म-२ चाय हो,
सी वी रमन के संग मोर्वी की चौपाल में अब लगता मन न हो।

वी टी की कोल्ड कॉफ़ी हो, संकट मोचन के बेसन लड्डू हों,
गोदौलिया की भांग की ठंडई हो पर उसमें अब कोई नशा न हो।

आई टी कैफेटेरिया की कॉफी हो, दोस्तों की हँसी ठिठोली हो,
सेंट्रल लाइब्रेरी की डेस्क हो, बिन तेरे लगती बिल्कुल सूनी हो।

रामनगर से सारनाथ तक और लखनिया दरी से चूड़ा दरी हो,
चुनार किले का सन्नाटा हो और विंध्याचल में तेरी खोज हो।

रविदास पार्क हो, अस्सी घाट की शाम हो,
कदम आवारा से हों और बस तेरी तलाश हो।

दिल में उथल-पुथल हो , २०-२१ की उम्र हसीं हो,
कुछ जुड़ता हमसे रोज हो और उसको लेकर प्रश्न बहुत हो।

संकट मोचन का द्वार हो, दुर्गा कुंड की घण्टियाँ हो,
काशी कोतवाल के दरबार में ढूंढते सारे प्रश्नों के उत्तर हो।

बुनते ढेरों सपने हो, दिल चाहे बढ़िया नौकरी हो,
पर जॉब के लगने पर दिल ये मेरा क्यों गुमसुम हो।

महामना की बगिया से दूर जाने का मेरा मन न हो,
ज्यूँ-ज्यूँ समय गुजरता जाए धड़कन की गति बढ़ती हो।

आखिरी समय चलने का हो, बैठने को माँ गंगा का आँचल हो,
कुछ न आये समझ में, ये कदम रोज काशी विश्वनाथ की ओर हों।

कितना कुछ यहाँ मिला हुआ हो, रखने को यादों का एक गट्ठर हो,
कैसे जाऊँगा कि दिल भारी हो, आँखों से मेरी छलकता समंदर हो।

जा रहा हूँ खुद को छोड़कर यहाँ, मेरे पास बस तेरे यादों की निशानी है,
आता रहूँगा कुछ खोजने को यहाँ कि रह गयी अधूरी एक कहानी है।

हर हर महादेव…..
जय भोलेनाथ…..
हर हर गंगे…..

©अनुनाद/आनन्द कनौजिया/०७.०१.२०२१

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बनारस तेरी याद आती है…

बहुत दिन हुए बनारस जाने को नही मिला,
लिखने को गीत-ग़ज़ल मोहब्बत का डोज़ नहीं मिला।

छाया है अंधेरा घनघोर दिल की तंग गलियों में ,
बनारस की गलियों में तेरे संग चलने को नहीं मिला।

ये दूरियाँ दरमियाँ तेरे-मेरे अब तो समझ के बाहर हैं,
मेरे कंधे पर तेरा सर और घाट पर बैठने को न मिला।

सर पर पल्लू, आँखें बन्द और चौखट पर मत्था तेरा टेकना,
आँखे सूनी हैं कि बाबा के दरबार में चेहरा तेरा देखने को नहीं मिला।

ज़रा सा हिलने-डुलने पर भी डर लगता है ज़िंदगी के भँवर में,
गँगा में नाव के हिलने पर कब से तेरा हाथ पकड़ने को नहीं मिला।

तेरे गर्म एहसासों में पिघल कर चाहूँ मैं पूरा का पूरा तुझ में घुल जाना,
गंगा के ठंडे पानी में पैरों को डाल तेरे संग शरारत को मौका नहीं मिला।

शाम ढलती है धीरे-२ और दिल में डर बढ़ने लगता है,
जमाने हो गए तेरे संग लिंबड़ी पर चाय पीने को नहीं मिला।

दिल में लगी आग को देखो अब तो ठंड नहीं मिलती,
वी० टी० पर तेरे संग कोल्ड कॉफ़ी पीने को नहीं मिलती।

फ़साने कई हैं तेरे मेरे काग़ज़ पर लिखने को लेकिन,
इन पर चढ़ी धूल को बहुत दिनों से उतारने को नहीं मिला।

क्या बताएँ बहुत ढूँढने से भी अब रस नहीं मिला,
बहुत दिन हुए बनारस जाने को नहीं मिला ।

©️अनुनाद/आनन्द कनौजिया/२२.०९.२०२०

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लापरवाह…!

हर कोई नहीं हो सकता लापरवाह……… ईश्वर प्रदत्त अनेकों मौलिक गुणों में से एक है ये! हज़ार नेमतों में से एक। किसी काम को जिम्मेदारी के साथ न करने वाले व्यक्ति को लापरवाह नहीं कहते। ऐसे व्यक्ति को आलसी कहते हैं। ऐसा व्यक्ति देर-सवेर काम कर ही लेता है। लापरवाह तो वो है जो अपना ही या दूसरे के द्वारा दिया कोई कार्य न करे और उसे कोई अफ़सोस भी न हो। चाहे इसके लिए उसे कितना ही नुकसान उठाना या गाली खाना पड़ जाये। ऐसे व्यक्ति की खाल मोटी होती है और सांसारिक लाज-शर्म आदि से ये व्यक्ति ऊपर उठ चुका होता है। जीवन उद्देश्य रहित तथा रस-हीन होता है। इनकी कोई इज्जत नहीं होती इसलिए बेइज्जती का भी कोई डर नहीं। ये किसी काम को न करने का कोई बहाना भी नहीं ढूढ़ते या यूँ कह लीजिये की कोई इन्हें काम देने की कोशिश भी नहीं करता तो बहाना बनाना भी क्यूँ! गाली भी एक समय के बाद मिलना बंद हो ही जाती है। लापरवाह व्यक्ति को गाली देने में कोई समय भी क्यों बर्बाद करे? जब होना-जाना कुछ नहीं! लापरवाह का शीर्षक आसानी से नहीं मिलता और इसे कमाने में समय और सतत लगन की जरुरत होती है। इसे सीखा नहीं जा सकता, ये इनबिल्ट होता है और ईशर का प्रसाद होता है जो किसी-२ व्यक्ति को ही प्राप्त होता है। बस थोड़ी सी देर लगती है कि दुनिया वाले आपकी लापरवाही की कला को कितनी देर में पहचानते हैं ! एक बार पहचान गए फिर उस लापरवाह व्यक्ति की ऐश……!

मैंने भी लापरवाह बनने की बहुत कोशिश की ! शुरुवात पढ़ाई से की लेकिन हो नहीं पाया। एक स्टेज तक आते-२ शर्म आ ही गयी और इज्जत बचाने के लिए पढ़ाई पूरी कर ली गई। फिर इसी इज्जत को बचाते-२ ग्रेजुएट, पोस्ट-ग्रेजुएट और फिर नौकरी में आ गए। यहाँ पर भी इज्जत बचाने के क्रम में काफी कुछ सीख गए और अब तो दुनिया को नचा दें……! लेकिन दिल में एक अफ़सोस हमेशा रह गया कि लापरवाह नहीं हो पाए😑 और एक निश्चिंत जीवन से वंचित हो गए। और अब तो लापरवाह बनने की कोशिशों से हार मान ली। लापरवाह व्यक्ति निश्चिंत रहता है और उसका दिल शांत रहता है। इसी वजह से कोई रोग-दोष भी नहीं लगता। हम जैसे लोग तो भविष्य की चिंता में ही खोये रहते हैं और आप तो जानते ही हैं कि चिंता चिता के समान होती है। धीरे-२ दुनिया भर के रोग घर कर जाते हैं।  

वैसे तो नहीं चाहता कि कोई मेरे पैर छुए और अक्सर लोगों को मना भी कर देता हूँ। किन्तु ३१ का हो गया हूँ और अब पीढ़ी बदलने के अगले पायदान पर हूँ। १५ -२० वर्ष के बच्चे अंकल भी बुला लेते हैं और प्रणाम भी कर लेते हैं। अच्छा तो नहीं लगता लेकिन कब तक! एक न एक दिन तो बढ़ती उम्र को स्वीकार तो करना ही पड़ेगा। कर भी रहा हूँ। अब कोई अभिवादन करे तो आशीर्वाद भी देना जरुरी है ! बहुत दिन से कुछ बढ़िया आशीर्वाद ढूंढ़ रहा था, सबसे अलग। आज से मस्त आशीर्वाद दूंगा- लापरवाह बनों! ईश्वर तुम्हें लापरवाह बनाएँ! शुरुवात में थोड़ा अजीब तो लगेगा, आशीर्वाद देने वाले और लेने वाले को भी, किन्तु जो समझदार होगा वो समझ जायेगा कि सामने वाले कितनी बड़ी दुआ दे गए। 

अब जिसको बुरा लगेगा वो जबरदस्ती सम्मान देने के चक्कर में न तो अंकल बोलेगा और न ही झुक कर पैर ही छुएगा (माता-पिता लोग पहले ही मना करके रखेंगे कि फलाँ अंकल आएँगे तो अभिवादन मत करना या फिर दूर से नमस्ते कर लेना या सामने ही मत आना।)! ये भी बढ़िया ही होगा। भीड़ में अंकल कहलाने से भी बच जायेंगे और उम्र भी जाहिर नहीं होगी😎। ख़्वामखाह भीड़ में किसी खूबसूरत मोहतरमा के सामने उम्र को लेकर भद्द पिट जाती है😏। मरद जात – इस लालच से कभी ऊपर नहीं उठ पायेगा😍! अब छुपाना क्या ? आप सब भी भाई लोग हैं और जो मोहतरमा ये पढ़ रहीं हो चाहे किसी भी उम्र वर्ग की हों, वो मुस्कुरा दें, बस इतना ही काफी! लिखना सफल! खैर…….. !

थोड़ा गौर से सोचियेगा…….! लापरवाह होने के कितने फायदे हैं ? जिम्मेदार व्यक्ति होने से जीवन भर दर्द मिलता है, ये जिम्मेदार लोग समझ सकते हैं। लापरवाह होने से कुछ समय तक परेशानी……. उसके बाद सब चंगा! बस एक बार लापरवाह का टैग मिल जाये। ये भी जिम्मेदार व्यक्ति समझ सकता है। अपने अगल बगल लापरवाह लोगों को ऐश करते देख आखिर में सबसे ज्यादा जिम्मेदार लोगों की ही सुलगती है। लापरवाह तो बेचारा कभी जान भी नहीं पाता की उसके पास एक ऐसी नेमत है जिसके लिए लोग तरस रहे हैं……! 😂

~अनुनाद/आनन्द कनौजिया/२९.०८.२०२० 

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