Posted in CHAUPAAL (DIL SE DIL TAK), CURRENT AFFAIRS, SHORT STORY

चुल्ल :)

चुल्ल सबको होती है, किसी न किसी कार्य/चीज़ की! इन क्रियाओं/चीजों में विविधता होती है! ये चुल्ल सनक का लाइट वाला संस्करण है। चुल्ल और सनक को एक नज़र से देखने की भूल कदापि न करें। उदाहरण स्वरुप यदि आपको अपडेट रहने की चुल्ल हो और आपको पता चले कि आपके आधार में गलत नंबर अपडेट हो गया है तो आपकी नींद तब तक उड़ जाएगी जब तक सही नंबर अपडेट न हो जाए। कुछ लोगों को फास्टैग लेने की चुल्ल होती है। समय से बिल मिल जाए और जमा भी हो जाए, वैसे तो ये अच्छी आदत है किन्तु बिल अगर एक दिन देर से मिले से मिले और व्यक्ति परेशान हो जाए तो ये परेशान होने की आदत भी उस व्यक्ति की चुल्ल ही कहलाएगी। उम्र बूढी हो जाएगी लेकिन चुल्ल नहीं जाएगी। जवानी तक तो ठीक है किन्तु बुढ़ापे में ये चुल्ल आपको नई जनरेशन से अच्छी खासी-गाली खिलवा सकती है। इसलिए सावधान रहें और अपनी चुल्ल अपने तक ही रखें। 


मुझे भी है चुल्ल, ऑनलाइन कुछ भी करने की! कुछ  भी….. चाहे नौकरी का फॉर्म भरना हो या एडमिशन का, ऑनलाइन शॉपिंग, बैंकिंग, या कुछ और! बस कोई इतना कह दे की इस काम के लिए वहाँ जाने की क्या जरुरत, ये तो ऑनलाइन भी हो जायेगा। बस साइट खोलिये और आवेदन कर दीजिए। मेरी बाँछें खिल जाती है। सामने वाला दुनिया का सबसे ज्ञानी आदमी प्रतीत होने लगता है और उसी पल से मैं उसका सुपर फैन। इसी चुल्ल की वजह से मैं ऑनलाइन का इतना अभ्यस्त हो गया कि मुझे ऑनलाइन की लत हो गई और कुछ भी याद आता है, मैं उस चीज की खोज ऑनलाइन करने लगता हूँ। धीरे-२ ये आदत मेरे जीवन का बहुत अधिक समय बर्बाद करने लगी। ऑनलाइन फॉर्म भरने की चुल्ल तो इतनी है कि मैं कोई भी फॉर्म भर देता हूँ और फीस भी भर देता हूँ। फॉर्म भरने को बाद एक उपलब्धि वाली फीलिंग आती है और अपार ख़ुशी का अनुभव होता है किन्तु थोड़ी देर बाद मैं सोचता हूँ कि ये मैनें क्यों भरा? इसकी जरुरत क्या थी? फ़ालतू का समय और पैसा दोनों बर्बाद हो गया। हालत इतनी बिगड़ गई कि मैं बेवजह व्यस्त रहने लगा और आर्थिक नुक्सान की वजह से परेशान रहने लगा। फिर बहुत विचार करने के बाद इस आदत को नियंत्रण में लाने के लिए मैं पुनः डायरी पर आ गया हूँ। दिन भर जो भी याद आए उसे एक जगह नोट कर लेता हूँ और शाम को एक तय समय लेकर एक बड़े सीमित समय में सब निपटा देता हूँ। लिखने से ये होता है कि शाम तक गैर जरुरी चीजें छंट जाती है और इस वजह से समय नहीं बर्बाद होता।


२०१४ के बाद से देश डिजिटल होने लगा। अभिलेखों को ऑनलाइन अपडेट करने की बाढ़ आ गई। स्मार्ट फ़ोन का दौर भी पीक पर था। दुनिया भर के मोबाइल एप्लीकेशन की बाढ़ आ गई। जवान व्यक्ति एप्लीकेशन डाउनलोड करने में लग गए और अधेड़/बूढ़े होने को अशिक्षित और असहाय समझने लगे। जो जितना बढ़िया मोबाइल चलाना जानता वो उतना बड़ा विद्वान प्रतीत होने लगा और विद्वान व्यक्ति मूर्ख लगने लगे। २०-२१ साल घिस-घिस कर कठोर अनुशासन का पालन कर पढ़ने वालों को तो चक्कर ही आ गया।  खैर…. डिजिटल इनफार्मेशन क्राउडिंग इतनी बढ़ी कि पुनः सभी को चक्कर आने लगा। सही-गलत में अंतर करना मुश्किल हो गया। ऐसे में पुनः वास्तविक विद्वानों की जरुरत पड़ने लगी और ऐसे विद्वानों ने राहत की सांस ली। अब वो पुनः अपनी विद्वता झाड़ने की चुल्ल मिटा सकते हैं। 

ये पोस्ट मैंने १६ से ३० वर्ष के नौजवानों को डिजिटल इनफार्मेशन क्राउडिंग से बचाने के लिए लिखी है क्यूंकि मैनें अभी-२ ३१ वर्ष पूरे किये हैं। अपने से बड़ी उम्र वालों को समझाने की गलती मैं कर नहीं सकता और खुद से छोटे व्यक्तियों को सँभालने की मेरी नैतिक जिम्मेदारी बनती है, अब चाहे वो समझें या हवा में जाने दें। जोर मैं उन पर भी नहीं डाल सकता। लेकिन आज के दौर में डिजिटल  क्रांति में संयम बरतने की बहुत जरुरत है।मैं तो आज की जनरेशन को सलाम करता हूँ कि वे पढ़-लिख कर अपनी पढ़ाई पूरी कर ले रहे हैं वरना मैं तो इस सूचना क्रांति और व्हाट्सप्प वाले ज़माने में पास भी न हो पाता। दिमाग को केंद्रित करने के लिए जितने कम ताम-झाम हो उतना अच्छा। 


वैसे अधेड़ उम्र के आदमियों को भी सलाह देना चाहूंगा कि वो कितना भी व्यस्त हो और बगल से कोई लड़की/महिला गुज़र जाये तो  धीरे से नज़रें उठा कर ताकना और दूसरे आदमी की तरफ देखकर मुस्कुराने की उनकी इस आदत को भी चुल्ल ही कहा जायेगा। बुरा तो कुछ नहीं मगर उम्र का लिहाज़ रखने की सलाह जरूर देना चाहूंगा 🙂 बाकी चुहल का मजा तो अलग है ही……. इसके बिना जीवन नीरस हो जायेगा।


आपको कौन सी चुल्ल है 😉 

बताइयेगा जरूर 🙂 

ईमानदारी से 😉


~अनुनाद/आनन्द कनौजिया/१७.०७.२०२०

Posted in CHAUPAAL (DIL SE DIL TAK), SHORT STORY

चौराहा…

केवल चार तरफ़ से आ रही सड़कों का मिलन ही नही होता है चौराहा। कई प्रकार की जिंदगियों का जंक्शन भी होता है। अपने आप में विविधताएँ लिए हुए दिन भर कई बदलावों के चक्र से होकर गुजरता है ये। सुबह 9 से 11 और शाम में 4.30 से 7 तक बेहद व्यस्त रहने वाला चौराहा पूरे दिन लगभग एक जैसा रहता है और रातों में इसके हिस्से आता है केवल अकेलापन। दिन भर की थकान को मिटाती, सुस्ताती हुईं चारों ओर की सड़के एक दूसरे से बैठ दिन भर की घटनाओं पर बतकही करती।

कई तरह के भावों से गुजरता हूँ मैं चौराहे पर। अक्सर लाल बत्ती पर रुकना होता है और फिर शुरू होता है ऐसे मौके का फायदा उठाने को तैयार बच्चों या फिर न जाने किसका बच्चा लिए माँ रूपी आवरण ओढ़े हुए औरतों का भीख मांगने का सिलसिला। इन सब चीजों पर इतना पढ़ और देख चुका हूँ कि दया कम आती और इनके रैकेट से डर ज्यादा लगता है। लाख खिड़की पर कोई खड़ा माँगता रहे, मुड़कर नही देखना और चेहरे पर मनहूसियत का ओढ़ लेना मेरा रोज का सिलसिला हो गया है। लेकिन अगर मांगने वाला थोड़ा अधिक जोर और समय दे दे तो मैं ज्यादा देर ठहर नही पाऊँगा और कुछ न कुछ दे ही दूँगा। हाँ बूढ़ी औरतों की मदद करने से खुद को रोक नही पाता। खैर…..!

उधर चौराहे के कोने पर भीड़। 4 पुलिस वाले और कुछ बाइक वाले लाइन लगाए हुए। इन 4 पुलिस वालों में 2 पुलिस वाले बाइक पर बैठ कर चालान का पर्चा भरते हुए और दो दौड़-2 कर, लाठी दिखाकर दूसरे बाइक वालों को रोकते हुए। कुछ शातिर बाइक वाले पुलिस को गच्चा देकर निकल जाते हैं तो कुछ बाइक वाले रोके जाने पर सबसे पहले फ़ोन निकाल कर सीधे राष्ट्रपति कार्यालय को फ़ोन लगाने की मुद्रा में और बाकी बेचारगी से चालान कटाते हुए……! बेचारे लोग! मैं कार में बैठे-2 एक दयनीय दृष्टि से बाइक वालों को देखते हुए चौराहा पार करता हूँ। इस दौरान दिल में एक अलग ही गर्व का अनुभव और अपने अन्दर के पुलिसिया डर को छुपाने के भाव से दो-चार होता हूँ मैं। चौराहा पार कर लेने पर होने वाले विजय के एहसास की मानों कोई कीमत ही नहीं।

फिर भी एक अदद ऐसे चौराहे की दरकार है ज़िन्दगी में जिसकी लाल बत्ती पर, मैं कार की पिछली सीट पर बैठा रहूँ और तभी तुम अपनी स्कूटी से आकर मेरे बगल में रुको। ऊपर से नीचे तक पूरी ढकी तुम और हेलमेट के भीतर से इधर उधर देखती तुम्हारी आँखें……….और फिर अचानक से हमारी नज़रें टकरा जाएँ! संकोच से दोनों अपनी नज़रें छुपाते हुए…….. लेकिन………..तिरछी निगाहों से एक-दूसरे पर पूरा गौर फरमाते हुए फिर हमारी नज़रें टकरा जाएँ और मुस्कान का आदान-प्रदान हो जाए! काश……….………. !

ऐसी लाल बत्ती कभी हरी न हो फिर!

~अनुनाद/आनन्द कनौजिया/१०.०७.२०२०

Posted in CHAUPAAL (DIL SE DIL TAK), SHORT STORY

लालच!

कोई ये कहे कि उसके अन्दर लालच नही है तो गलत कहता है। कभी-२ ये लालच बड़ा होता है और कभी छोटी-२ चीजों का लालच। बचपन से शुरू ये आदत जीवन भर साथ देती है, बस रूप बदलता रहता है। मेरी माने तो अगर लालच न रहे तो जीवन का कोई पर्याय नही है। साधु-सन्त, सन्यासी वगैरह भी ईश्वर को पाने के लालच में ही दुनिया की मोह-माया का त्याग करते हैं।

मेरे छोटे बेटे। डेढ़ साल के । खाने की कोई चीज लेकर बैठो तो खाएँगे बाद में, पहले बड़े वाले बेटे को धक्का मार-२ कर दूर करेंगें। पता नहीं ये प्रोग्राम कैसे डेवलप हो गया। इसकी कोडिंग कब हो गई हमसे। हम तो इतने होनहार न थे। खैर….. अभी तो इस हरकत पर प्यार आता है। इससे साबित होता है कि लालच सीखा नहीं जा सकता, ये इनबिल्ट होता है। बड़े बेटे में नही है इस तरह के लालच की अतिरेकता और न वो छोटे को देखकर सीख पाया।

मेरे जीवन में लालच का रूप अलग है। नई किताब का लालच, उसे सूँघने का लालच। एक अच्छे पेन का लालच। एक अच्छी और खूबसूरत संगत का लालच। वीडियो गेम का लालच। नए गैजेट का लालच। टेक्नोलॉजी का लालच। एकान्त में बैठने का लालच। कई और हैं…….. सब नही बता सकता! अब इन सभी लालच में कुछ खरीदे जा सकते हैं और कुछ आपकी किस्मत से पूरे होते हैं। मेरे पूरे भी हुए। लेकिन मजा तो तब हो जब आपका ये लालच आप खुद न पूरा करें , कोई और गिफ्ट कर दे। आहा…….! आपका लालच अगर आपको मुफ्त में मिल जाये तो इससे बड़ा सौभाग्य कोई नही, इस खुशी का कोई मोल नहीं और इस लालच को पूरा करने वाला ईश्वर से कम नहीं। मगर अफसोस …. इस जीवन में कुछ भी मुफ्त नही मिलता। आज या कल कीमत अदा करनी पड़ती है। करनी पड़े … हमें क्या… फिलहाल मौके पर जो खुशी मिलती है उसे क्यूँ छोड़ा जाए।

आज-कल एक नया लालच जुड़ गया है- मास्क और हैंड सैनिटाइजर का लालच। न जाने कितने रूप में उपलब्ध हैं ये। भाँति-२ के मास्क और तरह-२ के छोटे, कॉम्पैक्ट, पॉकेट साइज सैनिटाइजर की बोतलें गज़ब का आकर्षण पैदा करती हैं। अब आप किसी से मिलें। आपका मास्क सामने वाले से बेहतर हो तो गर्व होता है। आत्म विश्वास बढ़ जाता है। सामने वाले को बेचारे की नज़र से देखने का जो आनन्द मिलता है कि बस पूछिये मत। इस पर आप जेब से एक खूबसूरत डिज़ाइन की बोतल से सैनिटाइजर निकालकर लगा लें और अपने ही बढ़ते घमण्ड को कम करने के लिए एक जोक भी छोड़ दें तो सोने पे सुहागा। बन गया भोकाल। सामने वाला चारों खाने चित्त और आप विजयी😁। कुछ ही पल में एक मानसिक लड़ाई के विजेता और आपकी ताजपोशी। हा हा ……! गज़ब होता है इन्सान।

फिलहाल…..! ये मास्क और सैनिटाइजर हैं बेहद जरूरी पर खरीदने को दिल नहीं करता। एक दो बार ही खरीदें होंगें, वो भी दिल पर पत्थर रखकर। ये चीजें कोई गिफ्ट कर दे तो मजा ही आ जाए। इस समय ये वस्तुएँ लालच की पराकाष्ठा पर हैं। यदि मेरे अगल-बगल का कोई व्यक्ति ईश्वर बनने की ख्वाहिश रखता हो तो उसका स्वागत है। हम उसे ईश्वर का दर्जा देने को तैयार हैं……….😜।

~अनुनाद/आनन्द कनौजिया/२७.०६.२०२०

Posted in CHAUPAAL (DIL SE DIL TAK)

जिंदगी- सपने और सच

बहुत दिनों बाद….. आज अपने लैप टॉप के साथ समय व्यतीत करने का मौका मिला ! ऐसे ही कुछ भी इधर- उधर करते-करते एक ट्रेवलिंग वेबसाइट पर पहुंच गया | यूँ ही नज़र एक एडवेंचर ट्रिप पर पड़ी – मनाली से लद्दाख रोड ट्रिप और वो भी बाइक से | सुन तो बहुत रखा था इसके बारे में मेरे अपने कई दोस्तों से, जो अपने अाप को एडवेंचर के शौकीन मानते थे | कई बार प्लानिंग भी की लेकिन वही टांय-टांय फिस्स, जो हमारे कई प्लान्स के साथ अक्सर होता रहता है |

कौतुहूल वश मैने भी अपनी उंगलियों की गति बढ़ा दी | संडे की सुबह थी और कुछ खास करने को भी नही था इसलिए गूगल का सहारा लेकर इस रोमांचक ट्रिप से जुड़ी कई कहानियों को, जो किसी न किसी के व्यक्तिगत अनुभव ही थे, पढ़ डाली और उनके द्वारा साझा की गयी तस्वीरें भी देख डालीं | वाह. . . . . . . . . . . . . . . मजा ही अा गया, बेहद सुखद अहसास | मै तो कुछ देर के लिए वहीं पहुच गया | मनों बाइक पर सवार चला जा रहा हूँ | एक लम्बा रास्ता, सर्पाकार, पहाड़ियों के बीच से निकलता हुअा . . . . . . . . . जहां तक नज़र पहुचती केवल पहाड़ ही पहाड़, जिन पर सफेद बर्फ की चादर पड़ी हुई है और उनके बीच से गुजरते हुए रास्ते यूँ प्रतीत होते हैं कि किसी ने सफेद कागज पर एक लाइन खींच दी हो |

इन चित्रों के बीच से गुजरते हुए ये ख्याल अाया कि क्या ऐसी भी कई जगह हो सकती है ! सामान्य ज़िंदगी और भीड़ से इतनी दूर, न कोई शोर- शराबा, न कोई भाग-दौड़, सब कुछ ठहरा सा, सुलझा-सुलझा सा | केवल प्रकृति की गोद, चारों ओर पहाड़ , झील, बर्फ , सभी उलझनों से दूर एकान्त और शान्ति | यहीं लैप टॉप पर बैठे -बैठे लिखने से ही इतना सुकून मिल रहा है तो वहाँ पहुचने के बाद क्या होगा ! काश इसी अनुभव को मोक्ष कहते हैं, सभी इच्छाओं की समाप्ति ! इसी सन्नाटे मे विलीन हो जाने को, खो जाने को, अात्म, अात्मा और परमात्मा की खोज में ही ऋषि मुनि पहाड़ों की राह पकड़ते होगे और वर्षों की शांति की साधना के उपरांत खुद को एवं जीवन के उद्देश्य की प्राप्ति करके सिद्ध पुरुष बनते होंगे |

खाना खा लो.. . . . . . . . . .सुबह से लैप टॉप मे ही घुसे हो – पत्नी और माता जी दोनो की अवाज एक साथ कानों मे अायी। सिद्धियों की प्राप्ति से बस कुछ कदम ही दूर था कि इन दो मातृशक्तियो द्वारा सत्यता के धरातल पर खींच लिया गया। सपना टूट चुका था। पेट भरने का समय हो गया था सो तौलिया उठा कर बाथरूम की तरफ चल दिए नहाने को, मन मसोसते हुए, जैसे कोई मोती-माणिक हाथ से छूट गया हो। नहाते- नहाते सपनों के सभी कच्चे रंग पानी के साथ बह गए और हम भी फटाफट पेट पूजन करने चल दिए।

दिल मे एक स्पंदन हुअा,
इच्छाओं ने पर फैलाये,
घर पर बैठे-२,
हम जाने कहां हो अाए।

तंद्रा टूटी अांख खुली ,
सपनों की सारी पोल खुली,
सच्चाई की तेज अांच में ,
ख्वाहिशों की होलिका जली।