“ख़ूबसूरत लोग अगर अनजान हों तो अधिक ख़ूबसूरत और आकर्षक हो जाते हैं!” 😇 😍 😎
कुल मिलाकर ख़ूबसूरती एक वैचारिक fantacy के सिवा कुछ भी नहीं! यह fantacy एक व्यक्ति विशेष के जीवन भर की कल्पनाओं का समूह भर है जिसे वो किसी अनजान और ख़ूबसूरत व्यक्ति को देखकर एक पल विशेष में अनुभव कर लेता है। इन कल्पनाओं और उस देखे गए ख़ूबसूरत व्यक्ति में कोई रिश्ता नहीं होता। ये देखने वाले व्यक्ति के अंदर चल रही काल्पनिक कहानी मात्र होती है। ऐसी स्थिति में देखने वाले व्यक्ति को देखे गए व्यक्ति को लेकर कोई भी निर्णय लेने से बचना चाहिए।
ख़ूबसूरती एक मृग तृष्णा है। वास्तविकता में इसका कोई स्वरूप नहीं। सब कुछ आपके दिमाग़ के भीतर है। वहीं से आप इसे महसूस कर सकते हैं। तो अगली बार आपको ख़ूबसूरती का एहसास लेना हो तो इसे दूसरों में न ढूँढे। बस अपने दिमाग़ को इस हिसाब से अभ्यस्त करिए कि वो जब चाहे स्वयं इस ख़ूबसूरती का रसास्वादन कर ले। इस तरह आपको दूसरों से मिलने वाली निराशा से भी दो-चार नहीं होना पड़ेगा।
ऊपर वाले पैराग्राफ़ को देखकर कुछ ख़ुराफ़ाती लोग कई स्तर तक के मतलब निकाल सकते हैं🤣😆 और हास-परिहास कर सकते हैं! बस इन्हीं लोगों की वजह से मेरे लिखने की सार्थकता बढ़ जाती है 😉
यह सब लिखते वक्त मैंने बहुत सारा दिमाग़ लगाया है! ये पढ़ने में अच्छा लग सकता है मगर असल में ऐसा हो ही नहीं सकता क्यूँकि दुनिया दिल से चलती है! बिना चूतियापे के कोई कहानी बन ही नहीं सकती😋 और बिना कहानी के तो क्या ही मज़ा है जीने में 😁
इसलिए इस संसार की गति बनाए रखने के लिए मूर्खों की ज़रूरत ज़्यादा है……
मैंने भी खूब मूर्खता की है और सफ़र अभी जारी है….
खोज अभी जारी है……..
एक नयी मूर्खता करने की !
इसमें आपका साथ मिल जाएगा तो मज़ा दो गुने से चार गुने तक होने की सम्भावना है 🙃
जाड़े की पहली बारिश हो तस्वीर में दिख रही छत हो मैं शांत अकेले कुर्सी पर बैठा हूँ टीन शेड पर रिमझिम की धुन हो।
सुन्दर मुग्ध ख्यालों में मन खोया हो प्रकृति सौन्दर्य चहुँ ओर बरसता हो करने को रस-पान इस अद्भुत रस का कम पड़ता इन नयनों का बर्तन हो।
नाश्ते को तू रसोई से चीखती हो मैं बना रहूँ अंजान तुझे छेड़ने को सुनकर तेरे पायल की खन-खन मुझको तेरे छत पर आने का पूर्वाभास हो।
छत पर तेरे कोमल पैरों की मधुर थाप हो हाथों में चाय और चेहरे पर गुस्सा बेशुमार हो पकड़ लूँ हाथ, तू पैर से मेरे पैर का अंगूठा दबा दे इस खींच तान में उभरती तेरे चेहरे पर मुस्कान हो।
हार कर तू समर्पण कर दे और मुझे देखती हो आँखों में उठ रहे ख्यालो को मेरे जैसे तू पढ़ती हो रखने को मेरा मन तुमसे अच्छा और कौन समझेगा खींच ली बगल में दूसरी कुर्सी तू संग मेरे बैठती हो।
क्या ब्लूटूथ क्या वाई-फाई चाहे कोई और कनेक्शन हो दिल की बात कहने-समझने को बस आंखों में आँखे हो कोई बुद्धिजीवी इन मृदु भावों की गति क्या ही मापेगा जहाँ सिर्फ हाथों को छू भर लेने से सारा डाटा ट्रांसफर हो।
नींद यूँ ही नहीं टूटती अक्सर रातों में, किसी को खो देने से डरती ज़रूर होगी ।
आँखे यूँ ही बेवजह नहीं खुलती रात में किसी को देखने की तड़प ज़रूर होगी।
बेचैनियों से भरा समुन्दर है इस दिल में, सन्नाटे में लहरों की आवाज़ गूँजती होगी।
थकान बहुत है नींद में जाने को काफ़ी है, दुनिया का ख़ौफ़ नहीं तन्हाई काटती होगी।
ग़ज़ब की लड़ाई है दिल और दिमाग़ में, सोचना तो ठीक कर गुजरना बुराई होगी।
ये ग़ुस्सा तुम पर ही क्यूँ बहुत आता है, नासमझ! ये एक बात तुमको कितने दफे समझाई होगी।
ये जो आज मिज़ाज बदले-बदले हैं जनाब के, ज़रूर अब से सुधार जाने की क़सम खाई होगी।
नींद यूँ ही नहीं टूटती अक्सर रातों में, ज़रूर कुछ रातें तेरे संग प्यार में बिताई होगी।
आँखे यूँ ही बेवजह नहीं खुलती रात में फिर से देखने को तुझे तेरी याद आई होगी।
नींद यूँ ही नहीं टूटती अक्सर रातों में……. आँखे यूँ ही बेवजह नहीं खुलती रात में….. नींद और आँखो की है आपस में लड़ाई, ये लड़ाई भी ज़रूर तूने कराई होगी…….!