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धार…

लोग कह रहे कि मेरी लेखनी की धार बढ़ती जा रही है,

हमें तो बस ये ग़म है कि हमारी उम्र बढ़ती जा रही है।

 

कच्ची उम्र के थे तो जवान ख़्वाहिशों की लड़ियाँ बड़ी थी,

और तो अब यूँ है कि बस जिम्मेदारियाँ बढ़ती जा रही हैं।

 

तजुर्बा कम था हमें, इश्क़ के तरीक़ों से अनजान बड़े थे,

जानकार हुए जबसे बस खुद पर ग़ुस्सा निकाले जा रहे हैं।

 

ज़ख्मों को कुरेद दिया उन्होंने कहकर कि तुम सीधे बहुत थे,

कितने शानदार मौक़े गँवाने का अफ़सोस किए जा रहे हैं ।

 

भूल जाने की आदत बुरी है शक्लें याद नहीं रहती हमको,

रोज़ नयी शक्ल गढ़कर तुझसे रोज़ नया इश्क़ किए जा रहे हैं।

 

अपना लिखा भी याद नहीं और वो सुनाने की फ़रमाइशें करते हैं,

रोज़ नयी इबारत लिख कर हम उनकी इबादत किए जा रहे हैं ।

 

दिल को शांत रखने को एक अदद मुलाक़ात ज़रूरी बड़ी थी,

वरना बेचैन दिल से हम मासूम शब्दों को परेशान किए जा रहे हैं।

 

लोग कह रहे कि मेरी लेखनी की धार बढ़ती जा रही है,

हमें तो बस ये ग़म है कि हमारी उम्र बढ़ती जा रही है।

©️®️लेखनी/अनुनाद/आनन्द/२७.०५.२०२२

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चले जाना!

तुम जाना !
तो बस,
चले जाना…..
बिना बताए
अचानक
खामोशी से
ऐसा कि
भनक भी न मिले।

दुःख तो होगा
तुम्हारे जाने का
मगर
वो जाने के बाद होगा
और कम होगा
उस दुःख से
जब मुझे
तुम्हारे जाने का
पहले से
पता होगा!

क्यूँकि
पहले से
पता होने पर
दुःख ज़रा पहले
से शुरू होगा
और
इस तरह
दुःख की अवधि
कुछ बढ़ जाएगी।

©️®️चले जाना/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/२२.०१.२०२२

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उनींदी आँखें

नींद यूँ ही नहीं टूटती अक्सर रातों में,
किसी को खो देने से डरती ज़रूर होगी ।

आँखे यूँ ही बेवजह नहीं खुलती रात में
किसी को देखने की तड़प ज़रूर होगी।

बेचैनियों से भरा समुन्दर है इस दिल में,
सन्नाटे में लहरों की आवाज़ गूँजती होगी।

थकान बहुत है नींद में जाने को काफ़ी है,
दुनिया का ख़ौफ़ नहीं तन्हाई काटती होगी।

ग़ज़ब की लड़ाई है दिल और दिमाग़ में,
सोचना तो ठीक कर गुजरना बुराई होगी।

ये ग़ुस्सा तुम पर ही क्यूँ बहुत आता है, नासमझ!
ये एक बात तुमको कितने दफे समझाई होगी।

ये जो आज मिज़ाज बदले-बदले हैं जनाब के,
ज़रूर अब से सुधार जाने की क़सम खाई होगी।

नींद यूँ ही नहीं टूटती अक्सर रातों में,
ज़रूर कुछ रातें तेरे संग प्यार में बिताई होगी।

आँखे यूँ ही बेवजह नहीं खुलती रात में
फिर से देखने को तुझे तेरी याद आई होगी।

नींद यूँ ही नहीं टूटती अक्सर रातों में…….
आँखे यूँ ही बेवजह नहीं खुलती रात में…..
नींद और आँखो की है आपस में लड़ाई,
ये लड़ाई भी ज़रूर तूने कराई होगी…….!

©️®️उनींदी आँखे/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/२८.१२.२०२१

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आतुर

तेरे स्वागत को
आज होकर तैयार
खड़े हैं
सब इंतज़ार में,
ये मौसम…
ये बारिश…
ये चाय…
और हम भी…
बोलो…
मिलने को तुमसे
गुज़ारिश
और कैसे करते?
इससे ज़्यादा
आतुरता
और कैसे दिखाते?
स्वागत को तुम्हारे
और किस-२ को
बुलाते?
©️®️आतुर/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/१६.०९.२०२१

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साथ

जीवन की उलझनों में भी कुछ इस तरह
मैं खुद से दूर अपनों का साथ निभा लेता हूँ,
रोज़ ईश्वर के समक्ष हाथ जोड़कर हृदय से
उनके खुश रहने की दुआ माँग लेता हूँ।

मैंने अपने आप और पूरे परिवार का
कुछ इस तरह भी इंश्योरेंस करा रखा है,
अपने से जुड़े व्यक्ति के आगे बढ़ने में
बढ़-चढ़ कर अपना हाथ लगा रखा है।

एक छोटी उम्र है और जिम्मेदारियाँ कई
इस सबमें रोज़ जीनी है ज़िंदगी भी नई
इतना कुछ अकेले कहाँ सम्भव आनन्द
लेकर अनुनाद मैं जुड़ा हूँ दिलों से कई।

©️®️साथ/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/२९.०८.२०२१