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जीवन गुरु !

कुछ मैंने सीखा भी और कुछ नहीं भी
कहीं मिला सम्मान तो कहीं हमारा कटा भी
जीवन के इस सफ़र में हे गुरु आपको
हमने याद किये अच्छे में और बुरे में भी।

हे गुरु इस जग में तेरा कोई निश्चित रूप नहीं,
तू कभी मेरा अध्यापक भी तो कभी चपरासी भी,
पहली गुरु माँ थी तो हमने सीखा देना लार-दुलार और
दुनियादारी सीखने में काम आयी पापा की चप्पल भी।

अपने हक़ के लिए लड़ना सीखा भाई-बहनों से
अनज़ानो पर प्यार लुटाने को मिले कई मित्र भी
जवाँ हुए तो हमको लगी थी एक मुस्कान बड़ी प्यारी
जीवन के रंग देखे हमने प्यार में खाकर धोखा भी।

गणित विज्ञान कला हिंदी उर्दू के जाने ढेरों शब्द भी
डेटा ट्रांसफ़र को काफ़ी होते देखो सिर्फ़ इशारे भी
पढ़ा लिखा खूब सारा इस दुनिया को समझाने को
हुए जब समझदार तो हमने सीखा चुप रहना भी।

इस दुनिया की रीति अजब है अच्छी बातें अच्छी लगती सिर्फ़ किताबों में
पढ़ लिख कर जब इस खेल में आये तो हुआ संदेह कि मैंने कुछ सीखा भी?
साधी चुप्पी और शान्त खड़ा होकर मैंने ग़ौर बहुत फ़रमाया
इस दुनिया में जीने को देखो, आना चाहिए रंग बदलना भी।

तीन दशक मैंने जिए, जी ली लगभग आधी ज़िन्दगी
गुरु दिवस पर बधाई देने को आज, मैं हूँ बहुत आतुर भी
इस जीवन में मिले हम सबको कई गुरु और उन सबसे
हमने सीखा चलना गिरना रोना और सम्भालना भी।

किसे मानूँ अपना गुरु और किसे नहीं, किसे रखूँ किसके पहले
बहुत विचार के बाद पाया की गुरुओं की कतार में ये जीवन भी।
हे जीवन गुरु तुम सदा अपनी कृपा हम पर बनायें रखना
ठोकर तो देना ही मगर हमें प्यार से रहते सहलाना भी।

©️®️गुरु/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/०५.०९.२०२१