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चुल्ल :)

चुल्ल सबको होती है, किसी न किसी कार्य/चीज़ की! इन क्रियाओं/चीजों में विविधता होती है! ये चुल्ल सनक का लाइट वाला संस्करण है। चुल्ल और सनक को एक नज़र से देखने की भूल कदापि न करें। उदाहरण स्वरुप यदि आपको अपडेट रहने की चुल्ल हो और आपको पता चले कि आपके आधार में गलत नंबर अपडेट हो गया है तो आपकी नींद तब तक उड़ जाएगी जब तक सही नंबर अपडेट न हो जाए। कुछ लोगों को फास्टैग लेने की चुल्ल होती है। समय से बिल मिल जाए और जमा भी हो जाए, वैसे तो ये अच्छी आदत है किन्तु बिल अगर एक दिन देर से मिले से मिले और व्यक्ति परेशान हो जाए तो ये परेशान होने की आदत भी उस व्यक्ति की चुल्ल ही कहलाएगी। उम्र बूढी हो जाएगी लेकिन चुल्ल नहीं जाएगी। जवानी तक तो ठीक है किन्तु बुढ़ापे में ये चुल्ल आपको नई जनरेशन से अच्छी खासी-गाली खिलवा सकती है। इसलिए सावधान रहें और अपनी चुल्ल अपने तक ही रखें। 


मुझे भी है चुल्ल, ऑनलाइन कुछ भी करने की! कुछ  भी….. चाहे नौकरी का फॉर्म भरना हो या एडमिशन का, ऑनलाइन शॉपिंग, बैंकिंग, या कुछ और! बस कोई इतना कह दे की इस काम के लिए वहाँ जाने की क्या जरुरत, ये तो ऑनलाइन भी हो जायेगा। बस साइट खोलिये और आवेदन कर दीजिए। मेरी बाँछें खिल जाती है। सामने वाला दुनिया का सबसे ज्ञानी आदमी प्रतीत होने लगता है और उसी पल से मैं उसका सुपर फैन। इसी चुल्ल की वजह से मैं ऑनलाइन का इतना अभ्यस्त हो गया कि मुझे ऑनलाइन की लत हो गई और कुछ भी याद आता है, मैं उस चीज की खोज ऑनलाइन करने लगता हूँ। धीरे-२ ये आदत मेरे जीवन का बहुत अधिक समय बर्बाद करने लगी। ऑनलाइन फॉर्म भरने की चुल्ल तो इतनी है कि मैं कोई भी फॉर्म भर देता हूँ और फीस भी भर देता हूँ। फॉर्म भरने को बाद एक उपलब्धि वाली फीलिंग आती है और अपार ख़ुशी का अनुभव होता है किन्तु थोड़ी देर बाद मैं सोचता हूँ कि ये मैनें क्यों भरा? इसकी जरुरत क्या थी? फ़ालतू का समय और पैसा दोनों बर्बाद हो गया। हालत इतनी बिगड़ गई कि मैं बेवजह व्यस्त रहने लगा और आर्थिक नुक्सान की वजह से परेशान रहने लगा। फिर बहुत विचार करने के बाद इस आदत को नियंत्रण में लाने के लिए मैं पुनः डायरी पर आ गया हूँ। दिन भर जो भी याद आए उसे एक जगह नोट कर लेता हूँ और शाम को एक तय समय लेकर एक बड़े सीमित समय में सब निपटा देता हूँ। लिखने से ये होता है कि शाम तक गैर जरुरी चीजें छंट जाती है और इस वजह से समय नहीं बर्बाद होता।


२०१४ के बाद से देश डिजिटल होने लगा। अभिलेखों को ऑनलाइन अपडेट करने की बाढ़ आ गई। स्मार्ट फ़ोन का दौर भी पीक पर था। दुनिया भर के मोबाइल एप्लीकेशन की बाढ़ आ गई। जवान व्यक्ति एप्लीकेशन डाउनलोड करने में लग गए और अधेड़/बूढ़े होने को अशिक्षित और असहाय समझने लगे। जो जितना बढ़िया मोबाइल चलाना जानता वो उतना बड़ा विद्वान प्रतीत होने लगा और विद्वान व्यक्ति मूर्ख लगने लगे। २०-२१ साल घिस-घिस कर कठोर अनुशासन का पालन कर पढ़ने वालों को तो चक्कर ही आ गया।  खैर…. डिजिटल इनफार्मेशन क्राउडिंग इतनी बढ़ी कि पुनः सभी को चक्कर आने लगा। सही-गलत में अंतर करना मुश्किल हो गया। ऐसे में पुनः वास्तविक विद्वानों की जरुरत पड़ने लगी और ऐसे विद्वानों ने राहत की सांस ली। अब वो पुनः अपनी विद्वता झाड़ने की चुल्ल मिटा सकते हैं। 

ये पोस्ट मैंने १६ से ३० वर्ष के नौजवानों को डिजिटल इनफार्मेशन क्राउडिंग से बचाने के लिए लिखी है क्यूंकि मैनें अभी-२ ३१ वर्ष पूरे किये हैं। अपने से बड़ी उम्र वालों को समझाने की गलती मैं कर नहीं सकता और खुद से छोटे व्यक्तियों को सँभालने की मेरी नैतिक जिम्मेदारी बनती है, अब चाहे वो समझें या हवा में जाने दें। जोर मैं उन पर भी नहीं डाल सकता। लेकिन आज के दौर में डिजिटल  क्रांति में संयम बरतने की बहुत जरुरत है।मैं तो आज की जनरेशन को सलाम करता हूँ कि वे पढ़-लिख कर अपनी पढ़ाई पूरी कर ले रहे हैं वरना मैं तो इस सूचना क्रांति और व्हाट्सप्प वाले ज़माने में पास भी न हो पाता। दिमाग को केंद्रित करने के लिए जितने कम ताम-झाम हो उतना अच्छा। 


वैसे अधेड़ उम्र के आदमियों को भी सलाह देना चाहूंगा कि वो कितना भी व्यस्त हो और बगल से कोई लड़की/महिला गुज़र जाये तो  धीरे से नज़रें उठा कर ताकना और दूसरे आदमी की तरफ देखकर मुस्कुराने की उनकी इस आदत को भी चुल्ल ही कहा जायेगा। बुरा तो कुछ नहीं मगर उम्र का लिहाज़ रखने की सलाह जरूर देना चाहूंगा 🙂 बाकी चुहल का मजा तो अलग है ही……. इसके बिना जीवन नीरस हो जायेगा।


आपको कौन सी चुल्ल है 😉 

बताइयेगा जरूर 🙂 

ईमानदारी से 😉


~अनुनाद/आनन्द कनौजिया/१७.०७.२०२०

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जरुरत……!

हमारे जीवन चरित्र के कई आयामों का निर्धारण हमारे जीवन में पड़ने वाली जरूरतों के पूरा या अधूरा रह जाने से उत्पन्न परिणामों से होता है। ये पहले वाली लाइन कुछ ज्यादा ही पेंचीदा हो गई, लिख तो दिया, लेकिन जब खुद दोबारा पढ़ा तो मैं खुद चक्कर खा गया। इसको साधारण भाषा में समझने की कोशिश करते हैं। हमारे जीवन में कुछ बेसिक जरूरतें होती हैं जिनके बिना हम जीवित ही नहीं रह सकते, जैसे- जल, भोजन, वायु इत्यादि। इसके बाद कुछ जरूरतें जीवन को आसान बनाने के लिए होती हैं, जैसे खाना पकाने के लिए लकड़ी का चूल्हा, गैस-सिलिंडर, माइक्रोवेव या फिर इंडक्शन। इसके बाद आता है सोशल स्टेटस बनाने वाली जरूरतें! ये जरूरतें जरूरत न होकर दिखावा ज्यादा होती हैं जिन्हें एक व्यक्ति सामने वाले के प्रभाव में आकर या फिर सामने वाले पर प्रभाव डालने के लिए करता है जैसे कार ही ले लो- इसमें ब्रांड ज्यादा मैटर करता है और कितना मंहगा ब्रांड है ये भी। अब आखिरी में आती है जरुरत जो आपके खुद के लालच के वजह से पैदा होती है जैसे एक नहीं चार घर, चार कारें कई किलो जेवरात इत्यादि। ये लालच कभी-२ अति सुरक्षा के भाव के वजह से भी आती है। मानव मन, क्या-२ न जमा कर ले! अपने लिए, अपनों के लिए।  


कोरोना काल में इन जरूरतों में अंतर समझ में आ गया। ये कोरोना कहाँ-२ पहुँच जाता है। मेरी लेखनी में इसका जिक्र आ ही जाता है, न चाहते हुए भी। आये भी क्यों न? जिस तरह महात्मा बुद्ध को बरगद के पेड़ के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई थी, उसी तरह मुझे कोरोना के काल और संरक्षण में ज्ञान की प्राप्ति हुई। इसे भी अब गुरु का दर्जा प्राप्त है मेरी ज़िन्दगी में। सिर्फ मेरी ही नहीं, और लोगों की जिंदगी में भी कोरोना का रोल गुरु से कम नहीं है। अब सफाई को ही ले लीजिए। सफाई अभियान को लेकर मोदी जी ने न जाने कितनी झाड़ू लगाई, लगवाई और कितने करोड़ का बजट भी खर्च कर दिया लेकिन लोगों को सफाई न सिखा पाए। कोरोना ने एक झटके में भारत जैसे देश को सफाई सिखा दी। सिर्फ एक ही सन्देश- सफाई रखिये वरना साफ़ हो जाएंगे। लेकिन इस कोरोना ने जरूरतों की फेहरिस्त में कुछ चीजें और बढ़ा दी- सैनीटाइजर और मास्क। अब महीने की तनख्वाह मिलने के बाद राशन के साथ-२ ये चीजें भी भराई जाएँगी। दुकान वाले भैया २-४ लीटर सैनीटाइजर और दर्ज़न भर मास्क भी डाल देना। और हाँ पिछली बार के सैनीटाइजर की क्वालिटी ठीक नहीं थी। बीवी से सुनने को मिल गया, दो-चार आशीर्वचन। इस बार ध्यान रखना। अगर आपको दुकान पर ऐसा कुछ देखने को मिल जाये तो ताज्जुब न करियेगा। आपके साथ भी हो सकता है। तैयार रहिएगा। 


कुछ भी हो पर दिल में शांति बहुत है। थोड़ी-बहुत समस्याएँ हैं पर वो पहले भी थीं। हमेशा रहेंगी। चुपचाप कार्यालय जाओ, काम निपटाओ और कभी कार्य स्थल पर कोई मुश्किल आ जाये तो कोरोना तो है ही न, वो बचा लेता है। उसके बाद सीधे घर आओ, पानी पियो और आराम करो। न किसी फंक्शन में जाने का टेंशन और न ही किसी का बुलावा। न ही पहले की तरह किसी के अचानक घर आ टपकने की टेंशन। पूरी शाम और रात अपनी। इतवार भी पूरा अपना। उठो। मंजन। नाश्ता। शेविंग। फेशियल किट से फेशियल। स्नान। फिर दोपहर के १२ बजे तक लंच। और फिर मसनद गले लगाकर फुफुवा के सोना। बिना किसी चिंता के। बच्चे होने के बाद से गले लगाने को मसनद ही मिलता है। शाम में मस्त लिखा गया। दुनिया भर की साइट पर पोस्ट किया गया। इसी बीच बीवी से दो-चार आशीर्वचन भी लिए गए और जल्दी से दिए गए निर्देशों का पालन कर पुनः सोशल साइट पर डाले गए पोस्ट पर आने वाले लाइक और कमेंट का इंतजार करने लगे। मतलब कि आप बस इतना समझिए कि कोरोना ने जीना सीखा दिया। सारी फिजूल की जरूरतों, रवायतों को ख़त्म कर दिया। खुद पर ध्यान देने को समय ही समय। 


कुल मिलाकर सुकून से जीने के लिए जितना हो सके, जरूरतें कम रखिए और साथ में बयाने भी।जान है तो जहान है। दूर से ही अपनों के हाल-चाल लेते रहिए। पैसे डिजिटली भेजे जा सकते हैं। होम डिलीवरी का जमाना है। अब तो सराकरें भी घर तक आकर डिलीवरी कर रही हैं। पैसा भी सीधे खाते में भेज रहीं हैं, बिना किसी कमीशन के! बाकी साथ रहने की इतनी चुल्ल है तो पढ़-लिख कर गाँव-घर से दूर जाने की क्या जरुरत थी? पड़े रहिए ….. शांति से! जहाँ भी हैं। अगल-बगल वालों को ही परिवार समझिए। घर से निकलने की जरुरत नहीं। मिलने-मिलाने की भी नहीं। मिलने से याद आया कि बहुत दिन हो गए भैया की साली से मिले हुए। मिस कर रहीं होंगी ! चले ही जाते हैं मिलने…….! अपनी गाड़ी से……. 🙂


और हाँ. . . .  प्ले स्टेशन-4 भी लेना है 😉 . . . !


~अनुनाद/आनन्द कनौजिया/११.०७.२०२०

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चौराहा…

केवल चार तरफ़ से आ रही सड़कों का मिलन ही नही होता है चौराहा। कई प्रकार की जिंदगियों का जंक्शन भी होता है। अपने आप में विविधताएँ लिए हुए दिन भर कई बदलावों के चक्र से होकर गुजरता है ये। सुबह 9 से 11 और शाम में 4.30 से 7 तक बेहद व्यस्त रहने वाला चौराहा पूरे दिन लगभग एक जैसा रहता है और रातों में इसके हिस्से आता है केवल अकेलापन। दिन भर की थकान को मिटाती, सुस्ताती हुईं चारों ओर की सड़के एक दूसरे से बैठ दिन भर की घटनाओं पर बतकही करती।

कई तरह के भावों से गुजरता हूँ मैं चौराहे पर। अक्सर लाल बत्ती पर रुकना होता है और फिर शुरू होता है ऐसे मौके का फायदा उठाने को तैयार बच्चों या फिर न जाने किसका बच्चा लिए माँ रूपी आवरण ओढ़े हुए औरतों का भीख मांगने का सिलसिला। इन सब चीजों पर इतना पढ़ और देख चुका हूँ कि दया कम आती और इनके रैकेट से डर ज्यादा लगता है। लाख खिड़की पर कोई खड़ा माँगता रहे, मुड़कर नही देखना और चेहरे पर मनहूसियत का ओढ़ लेना मेरा रोज का सिलसिला हो गया है। लेकिन अगर मांगने वाला थोड़ा अधिक जोर और समय दे दे तो मैं ज्यादा देर ठहर नही पाऊँगा और कुछ न कुछ दे ही दूँगा। हाँ बूढ़ी औरतों की मदद करने से खुद को रोक नही पाता। खैर…..!

उधर चौराहे के कोने पर भीड़। 4 पुलिस वाले और कुछ बाइक वाले लाइन लगाए हुए। इन 4 पुलिस वालों में 2 पुलिस वाले बाइक पर बैठ कर चालान का पर्चा भरते हुए और दो दौड़-2 कर, लाठी दिखाकर दूसरे बाइक वालों को रोकते हुए। कुछ शातिर बाइक वाले पुलिस को गच्चा देकर निकल जाते हैं तो कुछ बाइक वाले रोके जाने पर सबसे पहले फ़ोन निकाल कर सीधे राष्ट्रपति कार्यालय को फ़ोन लगाने की मुद्रा में और बाकी बेचारगी से चालान कटाते हुए……! बेचारे लोग! मैं कार में बैठे-2 एक दयनीय दृष्टि से बाइक वालों को देखते हुए चौराहा पार करता हूँ। इस दौरान दिल में एक अलग ही गर्व का अनुभव और अपने अन्दर के पुलिसिया डर को छुपाने के भाव से दो-चार होता हूँ मैं। चौराहा पार कर लेने पर होने वाले विजय के एहसास की मानों कोई कीमत ही नहीं।

फिर भी एक अदद ऐसे चौराहे की दरकार है ज़िन्दगी में जिसकी लाल बत्ती पर, मैं कार की पिछली सीट पर बैठा रहूँ और तभी तुम अपनी स्कूटी से आकर मेरे बगल में रुको। ऊपर से नीचे तक पूरी ढकी तुम और हेलमेट के भीतर से इधर उधर देखती तुम्हारी आँखें……….और फिर अचानक से हमारी नज़रें टकरा जाएँ! संकोच से दोनों अपनी नज़रें छुपाते हुए…….. लेकिन………..तिरछी निगाहों से एक-दूसरे पर पूरा गौर फरमाते हुए फिर हमारी नज़रें टकरा जाएँ और मुस्कान का आदान-प्रदान हो जाए! काश……….………. !

ऐसी लाल बत्ती कभी हरी न हो फिर!

~अनुनाद/आनन्द कनौजिया/१०.०७.२०२०

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शॉपिंग… 😁

यह कला बेहद पुरानी है और इस कला में पारंगत होना आपको औरों से अलग रखता है। नहीं तो लाख खर्च कर के कुछ भी ले आइये, कोई काम का नहीं। खासकर कपड़ों के मामले में। यदि आपको समझ नही है तो आपका तो कटना तय है। रुपया पैसा आदि की खोज से पहले इस कला का प्रारम्भ हो चुका था। प्राचीन काल में इस कला के तौर तरीकों पर मैं नहीं जाऊँगा। जैसे भी करते रहें हो उनकी बला से। लेकिन एक बात तो तय है कि जिस तरह से अन्य कलाओं को सीखने के लिए अभ्यास और समय की जरूरत होती है, उसी तरह शॉपिंग जैसी कला को सीखने के लिए भी आपको अधिक नहीं बहुत अधिक समय देना पड़ेगा। एक बार आपके पास पैसे न हो तो भी चलेगा। वो कहते हैं न कि खरीदना नहीं तो देख ही लेना। हा हा …😂।

मुझे शॉपिंग करना नहीं आता। नौकरी से पहले तो मैं मुश्किल से ही दुकानों पर जाता था। गया भी तो घर से लिस्ट बना ली, दुकान पर जाकर थमा दी और बाद में दुकानदार के लिखने के अनुसार हिसाब लगा लिया। दिक्कत तो तब आती थी जब कपड़े लेने हों। अगर दुकानदार कामचोर निकला तो दो-चार टाइप ही दिखाता था जिसमें पसन्द न आने पर बड़ी मुश्किल से ही कह पाता था कि कुछ और दिखाओ। ये कुछ और दिखाओ मेरा आखिरी प्रयास होता था (चूंकि एक ही काम को कोई मुझे बार-२ बोले तो मैं झल्ला जाता हूँ इसलिए दुकानदार के मनोभावों को समझ लेता था कि अब ये झल्लाहट की सीमा पर पहुंच चुका है या फिर पहुँच न जाये इसकी फिक्र मुझे ज्यादा रहती थी)। यदि कुछ अच्छा लगा तो ठीक वरना जो भी सामने पड़ा हो उसे ही ले लेता था। फैशन सेंस तो मुझमें था नहीं और दुकानदार को बार-२ परेशान करने की हिम्मत मुझमें थी नहीं। कहीं मना कर दिया दिखाने से….. ! तो….! इसलिए बेइज्जती न हो, इस डर से मैं कुछ भी ले लेता था। अब चाहे वो कपड़ा मुझ पर ठीक लगे या न लगे, मैं अपने आपको उसमें अच्छा दिखने की कल्पना कर लेता था। इस तरह जब तक वो कपड़ा चलता मेरी शंका का एडजस्टमेंट चलता रहता। इसी वजह से मुझे छोटी दुकानों से नफरत हो गयी। न तो उनके अंदर उपभोक्तावाद के चलते उपभोक्ता के प्रति सम्मान और न ही अपनी चीजों को दिखाने का सलीका होता है। इसीलिए मैं जाता भी नहीं।

नौकरी लगी। अब पैसे का संकोच नहीं। लेकिन दिल में दुकानदार के मना कर देने का डर आज भी जिंदा है। इसलिए ऐसी दुकानें जहाँ सामान निकाल कर दिखातें हैं, मतलब सामान सामने नही होता है, मैं वहाँ जाता ही नहीं। मॉल कल्चर मेरे लिए वरदान साबित हुआ और कपड़ों के अलावा छोटी-२ घरेलू चीजों के लिए तो ऑनलाइन मार्किट तो मानो सीधे प्रभु की कृपा। मेरे जैसा आदमी आज तक सारी शॉपिंग ऑनलाइन। अब तो सब्जी भी ऑनलाइन आता है। लखनऊ में हूँ लेकिन मजाल हो कि यहाँ की प्रसिद्ध अमीनाबाद बाजार गया! बीवी के साथ भी नहीं। इतनी भीड़। मतलब की दुकान ढूढने में ही पसीना आ जाए। कभी सामने से रिक्वेस्ट आ जाए तो सीधे मना…. भले ही गृह युद्ध हो जाए। खा लेंगें एक दो थप्पड़।

फैशन सेंस की कमी को छुपाने के लिए सीधे ब्रांडेड स्टोर । और कसम गरीबी वाले संकोच की कि कभी टैग देखने की कोशिश की हो। स्टोर वाला क्या सोचेगा? इज्जत नही गिरानी अपनी। पूरे कॉन्फिडेंस से अटेंडेंट को आवाज दी और अपनी जरूरत बात दी। जहाँ सामान उपलब्ध वहां वाले सेक्शन पर ले जाया गया। दो-चार पीस देखा, थोड़ा सा निराश होने जैसा मुंह बनाया और दो-तीन सेट निकलवा लिए। पहन कर देखा गया। जम तो नहीं रह था लेकिन लेडी अटेंडेंट बोल दी सर अच्छा लग रहा है, आप पर जँच रहा है। फिर क्या जितने सेट निकले थे सब पैक करा लिए। जोश में बिलिंग भी हो गयी। क्रेडिट कार्ड से भुगतान भी हो गया। फिर उस लेडी अटेंडेंट ने मुस्कुरा कर थैंक्यू बोला और हम भी मुस्कुराते हुए बाहर की ओर। लेकिन स्टोर से पार्किंग में खड़ी गाड़ी तक पहुँचते-२ सोचे कि यार लेना तो एक ही शर्ट था और ले लिए क्या-२। बिल भी पन्द्रह हज़ार का। घर पहुँचे लेकिन बीवी को दाम नही बताए। बोल दिए सेल चल रहा था ४० % ऑफ का। हफ्ते भर अफसोस रहा। बस खुशी इतनी थी कि कपड़ा ब्रांडेड था और दो-चार लोग तारीफ भी कर दिए थे। पता नहीं क्यूँ? कहीं पद की वजह से तो नहीं। छोड़ो हटाओ।

बीवी के साथ शॉपिंग मेरे लिए बेहद कठिन। ये नहीं कि समय बहुत लगता है। वो तो यूनिवर्सल समस्या है और उसके लिए मैं तैयार रहता हूँ। अब धीरे-२ बच्चे हो गए हैं तो उनकी समय लगाने वाली आदत बदल रही है। मुझसे ज्यादा जल्दी में तो वो रहती हैं। खैर…..! मुद्दे पर आते हैं। मैं परेशान हूँ उनकी मुँह पर सीधे मना कर देने वाली आदत से। घण्टों देखने के बाद सीधे मना और दुकानदार को सुना अलग से देना कि घटिया दुकान है और कुछ ढंग का है ही नहीं इनके पास। चाहे वह दुकान गाढ़ा भंडार जैसी बड़ी दुकान क्यूँ न हो। मेरे जैसा संकोची आदमी अंदर ही अंदर दो गज जमीन के नीचे। गायब होने का मंत्र आता तो मैं अब तक पढ़ चुका होता।

एक बार की बात है। किसी दोस्त की शादी में जाना था और बीवी को अर्जेंट शॉपिंग करनी थी। रात के नौ बजे थे । आलमबाग बाजार घर से 5 मिनट की दूरी पर, गाड़ी से। गाड़ी उठायी और आलमबाग। इस उम्मीद के साथ शायद कोई दुकान मिल जाए। मॉल में जाते तो गाड़ी खड़ी करने से दुकान तक पहुँचने में 10 बज जाते। इसलिए नही गए। गाड़ी धीरे-२ सभी दुकानों को निहारते हुये चली जा रही थी कि एक साड़ी भंडार खुला मिल गया। झट से गाड़ी से उतरे और दुकान पर। दुकानदार बोला कि अब बंद हो रही है कल आइए लेकिन फिर पीछे से किसी मालिक टाइप आदमी की आवाज आई कि आने दो और शटर थोड़ा डाउन कर दो। खैर…..उसने दिखाना चालू किया। लगभग एक घंटे की मेहनत के बाद, बीवी के सेलेक्टिव नेचर के बावजूद मेरी भारी कोशिशों के उपरान्त तीन पीस सेलेक्ट हुए। इस बीच लग रहे समय और दुकानदार के चेहरे के भावों को पढ़कर मैं बहुत ही अधिक प्रेशर में था। कि दुकान बन्द होने जा रही थी और भाईसाहब ने हम पर कृपा करके एक घण्टे दे दिए।

बिलिंग काउंटर पर पहुँचे ही थे कि बीवी के मन में क्या आया और वो बोल पड़ी- नहीं चाहिए……..! रहने दो……! कुछ खास नही लग रहे कपड़े…… ! भाईसाहब ……….! मैं तो बिल्कुल जड़ हो गया। सर से लेकर पाँव तक भाव शून्य। क्या बोलूँ? बड़ी मुश्किल से मैंने दुकानदार की तरफ देखा। उसके चेहरे की भाव भंगिमा पढ़ने के बाद मैं तपाक से बोल पड़ा कि क्यूँ नही चाहिए। बढ़िया तो है! बीवी- नहीं…… नहीं चाहिए। मैंने स्थित और दिल दोनों को संभालते हुए थोड़ा जोर लगाकर कहा कि नहीं मुझे ये दो पसंद हैं और में ये ले रहा हूँ। तीसरी वाली, ये वाली निकाल देते हैं। इस तरह मैंने बीवी की बात को कुछ हद तक रखते हुए जबरदस्ती दो पीस ले लिए और बिलिंग कराकर बिजली की गति से दुकान से बाहर। उस दिन मुझे समझ आया कि शॉपिंग के लिए जेब मजबूत हो न हो, दिल जरूर मजबूत होना चाहिए। कमजोर दिल वालों के बस की बात नहीं। उसके बाद से मैं कभी गलत समय पर बीवी को लेकर शॉपिंग को नहीं गया। आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि जबरदस्ती में लिए गए वो कपड़े आज तक नहीं पहने गए! खैर………….मौके पर जान बची और क्या चाहिए। भले ही इस जान बचाने की कीमत कुछ भी हो…….!

~अनुनाद/आनन्द कनौजिया/२८.०६.२०२०

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लालच!

कोई ये कहे कि उसके अन्दर लालच नही है तो गलत कहता है। कभी-२ ये लालच बड़ा होता है और कभी छोटी-२ चीजों का लालच। बचपन से शुरू ये आदत जीवन भर साथ देती है, बस रूप बदलता रहता है। मेरी माने तो अगर लालच न रहे तो जीवन का कोई पर्याय नही है। साधु-सन्त, सन्यासी वगैरह भी ईश्वर को पाने के लालच में ही दुनिया की मोह-माया का त्याग करते हैं।

मेरे छोटे बेटे। डेढ़ साल के । खाने की कोई चीज लेकर बैठो तो खाएँगे बाद में, पहले बड़े वाले बेटे को धक्का मार-२ कर दूर करेंगें। पता नहीं ये प्रोग्राम कैसे डेवलप हो गया। इसकी कोडिंग कब हो गई हमसे। हम तो इतने होनहार न थे। खैर….. अभी तो इस हरकत पर प्यार आता है। इससे साबित होता है कि लालच सीखा नहीं जा सकता, ये इनबिल्ट होता है। बड़े बेटे में नही है इस तरह के लालच की अतिरेकता और न वो छोटे को देखकर सीख पाया।

मेरे जीवन में लालच का रूप अलग है। नई किताब का लालच, उसे सूँघने का लालच। एक अच्छे पेन का लालच। एक अच्छी और खूबसूरत संगत का लालच। वीडियो गेम का लालच। नए गैजेट का लालच। टेक्नोलॉजी का लालच। एकान्त में बैठने का लालच। कई और हैं…….. सब नही बता सकता! अब इन सभी लालच में कुछ खरीदे जा सकते हैं और कुछ आपकी किस्मत से पूरे होते हैं। मेरे पूरे भी हुए। लेकिन मजा तो तब हो जब आपका ये लालच आप खुद न पूरा करें , कोई और गिफ्ट कर दे। आहा…….! आपका लालच अगर आपको मुफ्त में मिल जाये तो इससे बड़ा सौभाग्य कोई नही, इस खुशी का कोई मोल नहीं और इस लालच को पूरा करने वाला ईश्वर से कम नहीं। मगर अफसोस …. इस जीवन में कुछ भी मुफ्त नही मिलता। आज या कल कीमत अदा करनी पड़ती है। करनी पड़े … हमें क्या… फिलहाल मौके पर जो खुशी मिलती है उसे क्यूँ छोड़ा जाए।

आज-कल एक नया लालच जुड़ गया है- मास्क और हैंड सैनिटाइजर का लालच। न जाने कितने रूप में उपलब्ध हैं ये। भाँति-२ के मास्क और तरह-२ के छोटे, कॉम्पैक्ट, पॉकेट साइज सैनिटाइजर की बोतलें गज़ब का आकर्षण पैदा करती हैं। अब आप किसी से मिलें। आपका मास्क सामने वाले से बेहतर हो तो गर्व होता है। आत्म विश्वास बढ़ जाता है। सामने वाले को बेचारे की नज़र से देखने का जो आनन्द मिलता है कि बस पूछिये मत। इस पर आप जेब से एक खूबसूरत डिज़ाइन की बोतल से सैनिटाइजर निकालकर लगा लें और अपने ही बढ़ते घमण्ड को कम करने के लिए एक जोक भी छोड़ दें तो सोने पे सुहागा। बन गया भोकाल। सामने वाला चारों खाने चित्त और आप विजयी😁। कुछ ही पल में एक मानसिक लड़ाई के विजेता और आपकी ताजपोशी। हा हा ……! गज़ब होता है इन्सान।

फिलहाल…..! ये मास्क और सैनिटाइजर हैं बेहद जरूरी पर खरीदने को दिल नहीं करता। एक दो बार ही खरीदें होंगें, वो भी दिल पर पत्थर रखकर। ये चीजें कोई गिफ्ट कर दे तो मजा ही आ जाए। इस समय ये वस्तुएँ लालच की पराकाष्ठा पर हैं। यदि मेरे अगल-बगल का कोई व्यक्ति ईश्वर बनने की ख्वाहिश रखता हो तो उसका स्वागत है। हम उसे ईश्वर का दर्जा देने को तैयार हैं……….😜।

~अनुनाद/आनन्द कनौजिया/२७.०६.२०२०