Posted in CHAUPAAL (DIL SE DIL TAK), SHORT STORY

टेम्पर्ड…

अनुभवों से मुझे पता चला है कि व्यक्ति गरीब नही होता है, उसकी सोच गरीब होती है। भारतीय माध्यम वर्गीय व्यक्ति पर यह लाइन शत प्रतिशत लागू होती है। हो भी क्यूँ न ? एक नई साईकल भी ले लें तो सालों उस पर लगी पॉलीथिन नही उतरती। वो व्यक्ति रोज उस साईकल के साथ-२ पॉलीथिन को भी चमकाता है। अब साईकल से मोटर-साईकल, मोटर- साईकल से कार और फिर प्लेन, वह आदमी कितना बड़ा हो जाए उसकी सोच नही बदलेगी। दिमाग से वो गरीब ही रहेगा। वो कार और प्लेन की सीट की पन्नी नही उखड़ने देगा।

खैर….. मेरा नया वाला लैपटॉप दो बार पटका जा चुका है। मेरे घर में दो हरफनमौला किरदार (रात के समय हाइपर-एक्टिव) और बेहद ही मजबूत दिल से कन्फीगर्ड, मेरे दो बच्चों का नया खिलौना बन चुका है मेरा लैपटॉप। मेरे जैसे गरीब सोच वाले व्यक्ति की औलादें इतने मँहगे शौक न जाने कहाँ से पा गए। जरूर माँ ने ही इंस्टाल किये हैं। खैर….! दो बार लैपटॉप के पटके जाने से हार्ट अटैक तो नही आया मगर दिल पर दो चार खरोंच जरूर आ गई। हद तो तब हो गई जब बड़े वाले बाकायदा अपनी जीत दर्ज करने के लिए लैपटॉप जमीन पर पटकने के बाद उस पर चढ़कर खड़े भी हो गए और पोज़ देने लगे। जैसे कोई सैनिक दुश्मन चौकी पर कब्जा करने के बाद तिरंगा लहराता है।

पूरी रात बिस्तर पर करवटें बदलता रहा कि क्या किया जाए और कैसे बचाया जाए। छुपा कर और लॉक लगाकर तो बचाना मुश्किल हैं। क्यों न इस पर कोई हार्ड कवर लगा लिया जाए। ऑनलाइन सर्च किये मगर समझ नहीं आया। अगले दिन आफिस निकल तो ये सोच कर निकला कि आज लैपटॉप को सुरक्षित रखने की व्यवस्था किये बिना घर नही लौटूँगा। दिल में कुछ पाने की ठान लो तो फिर मिल ही जाता है। ऑफिस खत्म होने के बाद नाज़ा मार्किट पहुँचा। दो-चार दुकानों से मना कर दिए जाने के बाद निराश होने ही वाला था कि एक दयालु सज्जन ने मुझ पर दया दिखाते हुए जनपथ मार्किट में एक दुकान बता दी। आँखों में चमक लौट आयी। मैं जनपथ पहुँचा। बताई हुई दुकान भी मिल गई। उसने मेरा लैपटॉप देखा और बोला मिल जाएगा। हम भी चहकते हुए बोले, लगा दो। करीब 15 मिनट दुकान में खोजने के बाद वो बोला ये लैपटॉप तो नया है मगर मॉडल पुराना है इसलिए कवर मिल नहीं रहा। हमने भी बोल दिया – यार तुम्हारे पास सामान नही है तो ठीक है लेकिन पुराना बोलकर दिल पर घाव तो मत ही दो। खैर…….! जनपथ आये ही थे तो सोचा एक दो दुकान और देख लें।

फिर मिली एक दुकान ……. मैंडी मोबाइल । और यहाँ जाकर, मोबाइल को सजा-सँवार कर रखने वालों की शौक को परवान मिलता है। भाई साहब….. क्या दुकान! क्या भीड़! क्या दुकान पर काम कर रहे लड़कों की फुर्ती। इतनी भीड़ देखकर एक बार मैं फिर सोच में पड़ गया कि मैं तो लैपटॉप लेकर आया हूँ , निकालूँ कि नहीं। मिलेगा कि नहीं। मैने दबी जुबाँ में पूछा तो उत्तर मिला – हाँ मिल जाएगा। छोटू जल्दी से लैपटॉप का कवर निकाल। अब जाकर दिल को ठंडक मिली। इतना सुकून की दुकान पर लगने वाले एक घंटे भी बहुत अधिक नहीं लगे। इसी बीच मैंने अपना मोबाइल दिखाया कि इसका टेम्पर्ड मिल जाएगा? (बात दूँ कि इस मोबाइल के टेम्पर्ड की तलाश चार महीने से थी मगर नहीं मिल रहा था। श्री राम टावर भी हाथ खड़े कर चुका था। लेकिन वहीं है न कि जब अच्छा दौर चालू होता है तो सब अच्छा होने लगता है।) आज टेम्पर्ड भी मिल गया। वाह…… आज तो मजा ही आ गया। दुकानदार ने मस्त टेम्पर्ड लगाया। जब मोबाइल सामने आया तो विश्वास ही नही कि ये मेरा मोबाइल है। इतना खूबसूरत तो ये नए पर नही था। अब तो कोई लड़की दुल्हन के गेटअप में भी सामने आ जाये तो मैं अपना मोबाइल ही देखूँगा।

मैं आज बेहद खुश होकर घर लौटा। कोरोना काल की रस्मों को निपटाने के बाद जब सुकून से हाथ में मोबाइल लेकर सोफे पर बैठा तो बैठते ही बच्चों की उछल-कूद में मोबाइल हाथ से सरक कर धरती को जा लगा। इस बार तो हार्ट अटैक मानो आ ही गया। हाये मेरा टेम्पर्ड। मोबाइल की फिक्र न होकर आज टेम्पर्ड की चिंता हो रही थी। झट से मोबाइल उठाया और टेम्पर्ड को सहलाने लगा। बच गया था। मध्यमवर्गीय गरीब सोच भी राहत की साँस ले रही थी। डर इतना था कि मैंने लैपटॉप को बैग से निकाला ही नहीं। कौन रिस्क ले ………!

~अनुनाद/आनन्द कनौजिया/२६.०६.२०२०

Posted in CHAUPAAL (DIL SE DIL TAK), SHORT STORY

बारात !

अच्छा हुआ इस कोरोना ने शादियों में बारातियों की संख्या कम कर दी! हुँह…….😷। आज कल भी कोई बारात होती थी! एक रात की शादी, कुछ टाइम की बारात और कुछ घंटों के बाराती। केवल पेट भरने या फिर चेहरा दिखाने आते हैं लोग। निमंत्रण लिखाने वाले उससे भी कम ! कुछ अति जहरीले निकले तो नाच कूदकर एक कोने में जाकर अपना जहर उगले और निकले। लड़की को किराए की गाड़ी से घर लाना ही था तो इससे अच्छा लड़की खुद ऊबर बुक करके लड़के के यहां चली आती……. हुँह…! अच्छा हुआ कोरोना महाराज ने अपनी कृपा कर दी।

बारात तो हमने की है…… बचपन में और जवानी के उदय काल में भी। सुबह से तैयारी होती थी। कैसे नया वाला शर्ट जो साल भर पहले लिया था उसे निकालने की जल्दी होती थी। देर नही होनी चाहिए। सारी तैयारी कर जाकर खड़े हो गए….. शादी वाले घर पर नहीं! खड़ा वहां होता था जहाँ गाड़ियाँ खड़ी होती थी। सीट भी तो छेकानी थी। सूमो में बीच वाली सीट की खिड़की पकड़ कर बैठे। लेकिन बारात निकलने तक सारी एडजस्टमेंट होने के बाद बैठने को मिलता था तो ट्रेक्टर की ट्राली में । सारे समान की रखवाली का जिम्मा अलग । घंटों की मेहनत यूँ बर्बाद होती थी और मन में गुस्से का ज्वार सातवें आसमान पर अलग। तब तक गालियाँ नही सीखीं थी वरना दो चार बोलकर भड़ास निकाल लिया जाता। लेकिन ट्राली का मजा अलग। अक्सर ट्रॉली पर बैंड बाजे वाले बैठते थे । बस रास्ते भर मौज, गाना -बजाना और बगल से गुजरने वालों को दूर तक ताकना। कोई नया जोड़ा साईकल पर बैठकर निकलता हुआ दिख जाए तो बाँछें खिल जाती थी और नजरें उन्हें तब तक ताकती थी जब तक वो क्षितिज में विलीन न हो जाएं। इसी बीच नचनिया महोदय रास्ते में ट्रेक्टर रूकवाकर नाचने के लिए अपना ईंधन भी ले लिए और धीरे से फुल हो गए। हम भी तिरछे देखकर मुस्कुरा दिए।

बारात पहुंची । गाँव के बाहर रुकाया गया। कोई खेत या प्राथमिक विद्यालय में शामियाना लगा और एक कोने में खटिया और गद्दों का ढेर लगा हुआ। सब फटाफट अपना अपना कब्जा किये और बिस्तर छेंका लिए। दूल्हे की खटिया अलग और फूफा जी का मुआयना चालू। चद्दर तो गंदी है। ये भी कोई बात हुई। हमारा लड़का यहां बैठेगा। कतई नहीं। बवाल चालू। लड़की वाले शांत खड़े। तब तक गाँव के स्वघोषित कुछ सम्माननीय लोग पहुँच कर मामला शांत कराए। फिलहाल चद्दर बदल गई। लेकिन हमको का मतलब। हम तो पानी पिलाने वाले के बगल खड़े व्यवहार बनाने की कोशिश में….. ई भी कोई बात हुई ! एक चद्दर के लिए बवाल। बड़का फूफा बने हैं। पानी वाला भी हाँ में सिर हिलाया। बस क्या ….. धीरे से पटा कर मिठाई का दू डिब्बा अंदर। अब कोई भी काम हो तो पानी वाले को ढूंढ लिए और फिर पूरा वी आई पी वाला ट्रीटमेंट लिए। अगल बगल वालों को जलाने का जो मजा वो और कहाँ।

बारात द्वार-चार को बढ़ी। नाचने वालों में लोटने की होड़ और बाजे वाले से तरीके तरीके के गाने की माँग, लेकिन उस पर कोई असर नहीं। उसने जो एक लय पकड़ी तो आखिरी तक उसी पर डटा रहा। कई जीजा फूफा ताव दिखाए और चले गए मगर बाजे वाला टस से मस नही हुआ। हम नाचने वालो से सुरक्षित दूरी बनाकर बारात के सबसे आगे। द्वार पर सबसे पहले पहुँचे और व्यवस्था का पूरा ब्यौरा लिया गया। इसी बीच दुल्हन की सहेलियों, भाभियों और न जाने किनसे किनसे मुस्कान का आदान प्रदान हो गया। कुछ ही देर में हम बाराती कम घराती ज्यादा। दुल्हन पक्ष को कुछ भी संदेश दूल्हा पक्ष को भेजना हो तो हमे ही ढूंढा जाए। फिर क्या घर भीतर तक इंट्री हो गई।

द्वार-चार हुआ। खाने पीने की तैयारी। दुल्हन पक्ष की गाँव की औरतें गारी गाने को तैयार। दूल्हा के मामा, फूफा, चाचा, बाबा का नाम चाहिए। कौन बताएगा। अब यहाँ पर भी हम आगे। इतनी देर से मेहनत जो कर रहे थे। फिर क्या हम सब नाम बता दिए…..लेकिन दूल्हा के रिश्तेदार का नहीं, दुल्हन के रिश्तेदारों का 😂😋। खैर गारी शुरू हुआ और फिर जोर की हँसवाई हुई। दुल्हन पक्ष से कौनो मरद दौड़ता हुआ आया…. ई का अपने ही घर वालों को गरियाये दे रही हो। औरतें संन्न ….! ये का हो गया। नज़रें हमको ढूढने लगी । हम भी मौका देखकर दाएँ बाएँ हो गए। नाश्ता तो हम औकात से ज्यादा पेल चुके थे सो खाने की भूख थी नहीं। इधर शादी की शुरुवात होने लगी और उधर हम परदहिया सिनेमा खातिर सबसे आगे वाली लाइन में डटे मिले। सुबह चार बजे के आस पास भूख लगी। क्या किया जाए। पता चला कि अभी शादी चल रही है। तो उधर चल दिये और शादी के बाद वाली पंगत में बैठकर भूख मिटाई और निकल लिए सोने।

सुबह हुआ। नित्य कर्म से निपटकर पूरे गांव का एक चक्कर और फिर लड़की वालों के घर पहुंचकर पंचायत चालू। घर का सारा भेद लिया गया। कौन साली है, कौन मौसी और कौन मामी,,,, सब पता किया गया। मजाक वाले रिश्तों को टॉप पर रख गया। जूता कौन चुराएगा पता किया गया। आखिर में चलते चलते दूल्हे का खास जो बनना है। भाई…. सुबह का नाश्ता हुआ और फिर अँचर धराई का कार्यक्रम चालू। हम भी बिल्कुल तैयार, जूता के पास। कसम से हाथ तो पकड़ ही लेंगें। जूता जाए तो जाए। इसी बीच दूल्हा और दुल्हन की भाभी के बीच हंसी मजाक चालू हो गया। दूल्हा जी अंचरा कस के पकड़े थे और भाभी जी उनकी नाक। सब तफरी लेने में लगे थे और हम भी। बस यहीं हमारा कट गया। सब हंसी मजाक निपटने के बाद पलटकर देखे तो जूता गायब। अब काटो तो खून नहीं। सारे इरादों पर पानी जो फिर चुका था। फिर हमने नज़रें उठा कर इधर-उधर नहीं देखा। सारी खिसियाहट समेटकर धीरे से ट्राली की ओर। अब बारात में हमारे लिए कुछ नही बचा था 😑।

किस्मत अच्छी थी। खाने पीने का सारा सामान ट्राली पर रखाया। हम भी खुश। रास्ते के नाश्ते के इंतजाम हो गया। अब ट्राली पर बैठने का मलाल न रहा 😂। बहुत दिन से ऐसी बारात मिस करता था। आधुनिक बारातों में जाने की इच्छा तो नही होती थी मगर समाज की खातिर जाना पड़ता था। भला हो कोरोना का जो इसने बाराती की संख्या 50 तक सीमित कर दी। बुलाएगा तो हमें वैसे भी कोई नहीं लेकिन अगर गलती से पूँछ लिया तो कोरोना का बहाना तो है ही। नहीं जाएँगे। हा हा हा ……!

~अनुनाद/आनन्द कनौजिया/२५.०६.२०२०

Posted in CHAUPAAL (DIL SE DIL TAK), SHORT STORY

बचत!

कोरोना काल में जीने को क्या जरूरी है और कितना जरूरी है, ये जानने को मौका मिला। प्रवासी मजदूरों की हालत देखकर पैसे और संसाधनों की कीमत समझ आई। अपने को कहीं अधिक बेहतर स्थिति में पाया। अब ये सोच लिया कि जरूरतें कम करनी हैं और समाज के लिए अधिक जीना है। जीवन के लिए जरूरी चीजों के अलावा कोई और खरीददारी नहीं।

घर में दो जोड़ी चप्पल टूटी पड़ी थीं। बहुत दिन से कष्ट हो रहा था। जब जरूरत हो तो टूटी चप्पल सामने। ये चप्पलें घर के भीतर पहनने वालीं थी तो इतने दिन काम चल गया। लेकिन जरूरत तो पड़ती ही थी। क्या करें? नई ले ली जाए? लेकिन क्यों? एक जोड़ी कम से कम 250 रुपये की तो पड़ेगी ही। दो जोड़ी के 500। न, क्यों पैसे बर्बाद किये जायें! फिर काम कैसे चले 🤔। मन में मोची के पास जाने का ख्याल आया। लेकिन अजीब लग रहा था कि इतनी मॅहगी चप्पल तो है नही जिसे मरम्मत कराकर सही कराई जाए😑।

फिलहाल मन को साधा गया और चप्पलों को समेटकर एक थैले में। सुबह ऑफिस निकलते वक्त गाड़ी में रख लिए। और फिर क्या, यदि आप किसी अच्छे काम के लिए निकलो तो मुराद पूरी हो जाती है। वो ऐसा है कि ढूढने से भगवान भी मिलता है। तो मुझे भी मिल गया-मोची। बिल्कुल भगवान स्वरूप। झट से चप्पल बढ़ाई और पट से काम हो गया। 70 रुपये में काम चौकस। सीन चौड़ा हो गया। 430 रुपये बच गए। मानो किला जीत लिया हो। गर्व की अनुभूति के साथ गाड़ी में बैठे और घर। सीढियाँ दौड़ कर चढ़ीं और डोर बेल बजायी। दरवाजा खुला और हम मारे खुशी के चौड़े होकर बोले- काम हो गया, बच गए पैसे। बीवी ने एक तिरछी निगाह से हेय दृष्टि से देखा और मुँह बनाकर छोटे वाले बच्चे को लेकर बाथरूम की ओर चल दी। कुछ पूछा भी नही कि क्या हुआ। सारी हवा मिनटों में निकल गयी और खुशी छू मंतर।

एक आदमी अच्छा काम केवल दिखावे के लिए करता है और उसके बदले तारीफ की उम्मीद करता है। उसके लिए अच्छा काम करके मिलने वाली खुशी से ज्यादा उस काम की तारीफ से मिलने वाली खुशी ज्यादा मायने रखती है😉। और वो मुझे यहां मिलने से रही😑। मैंने भी चप्पल वाला थैला एक किनारे रख दिया और खुशी को गुस्से में बदलकर कोरोना काल के नित्य कर्म में लग गया। चप्पल फिर टूटेगी, फिर बनेगी लेकिन जान है तो जहान हैं। नीचे फोटू वाले भैया को सादर प्रणाम, हमाये पैसे जो बचाये इन्होंने😎।

~अनुनाद/आनन्द कनौजिया/२४.०६.२०२०

Posted in CHAUPAAL (DIL SE DIL TAK), SHORT STORY

अमराई……।

कोरोना का समय चल रहा है। सरकारी नौकर होने के कारण कभी घर बैठने का मौका नही मिला। एक आदमी चाहता भी कब है। कोई न कोई बहाना कर निकल ही जाता है बाहर। थोड़ा इधर-उधर करने। लाइन को मत पकड़ियेगा और गहराई में तो बिल्कुल भी न उतरियेगा।

गाँव से शहर तक का सफर तय किया है। एक व्यक्ति की औसत आयु का लगभग आधा जी चुका हूँ। अनुभव भी थोड़ा बहुत आ चुका है तो कुछ बातों को जोर देकर भी कह सकता हूँ। इसलिए तुलना करते हुए लिखता हूँ कि खाली बैठने का जो आनन्द गाँव-देहात में आता था वो शहरों के बंद कमरों में उपलब्ध सुविधाओं में कहाँ। मन एक जगह टिकता ही नहीं। खुरपेंच करने को बहुत सी चीजें आसानी से जो उपलब्ध हैं।

जेठ की दुपहरी हो, बिल्कुल तपती गर्मी, लू वाली। घर से नेनुआ भात भर गटई दबाय के खोपड़ी पर गमछा डार के सीधे टिबिल वाले बाग की ओर। न हाथ में मोबाइल और न जेब में पर्स। ले दे के साथ सत्तर रुपया, दस दस के नोट। आज खेत में पानी दिया जा रहा है, टिबिल चल रहा है। खेत के किनारे कच्ची नाली से पानी बहता हुआ जा रहा है। स्वच्छ, पारदर्शी और नदी सा कल-कल करता हुआ। कभी कभी तो सरजू मैया की याद दिलाता हुआ। एक पेड़ की छांव देखकर घस्स से बैठ गए पेड़ की टेक लगाकर, नाली में पैर डालकर। निहार रहे है पैर को। पानी की शीतलता पूरे शरीर को तृप्त करती हुई। नाली में उगी हुई घास लगातार पानी के बहाव से संघर्ष करती हुई। इसी बीच एक चींटी पानी के बहाव में दिखती है। किंतु उसने हार न मानते हुए मौका देखकर एक दूब को पकड़ ही लिया और अपनी जान बचाई। डूबते को तिनके का सहारा वाली कहानी चरितार्थ होते हुए सामने ही देखा।

काफी देर तक यूँ ही बैठे-2 जब आलस आने लगा, आये भी क्यूँ न, गटई तक नेनुआ भात जो पेले हैं, तो आम के पेड़ के नीचे पड़ी खटिया पर पसर गए। पीठ के बल। टिबिल के चलने का शोर लगातार कानों में पड़ रहा है। दूर-२ तक केवल खेत ही दिखते हैं। बिल्कुल सपाट और इस भीषण गर्मी में जलते हुए। बहती हुई लू साफ दिखती है। ले दे के दो चार किसान ही दिखाई पड़ रहे हैं। ऐसे में बाग में आम के पेड़ के नीचे की शीतलता एक अलग ही ठंडक पैदा कर रही है। इस बार आम अच्छे आए हैं। आम की फसल को निहारते, उनके पत्तों को निहारते, चींटियों द्वारा दो पत्तों को किसी सफेद पदार्थ से जोड़कर बनाये झोंझ को देखते , आम की खुशबू को सूँघते, कहीं दूर से आती कोयल की आवाज को सुनते हुए एक अलग ही रस पैदा हो रहा था। अगल बगल कोई न हो और दिमाग को कोई व्यवधान न हो तो व्यक्ति अपने पसंद के ख्यालों में आसानी से खो जाता है। ऐसे में भैया की साली की याद आ गई और तन बदन में एक अलग ही गुदगुदी कर गई। ज्यादा नही लिखूँगा इस पर , आप स्वयं ही आगे की कहानी समझियेगा। इसी बीच कौनो रसिक मिजाज आदमी साइकिल से रेडियो बजाता हुआ निकला- घूँघट की आड़ से दिलवर का ………… तन-बदन में एक लहर गुजर गई।

इसे कहते हैं एकांत। सारी सिद्धियाँ इसी में प्राप्त होती हैं। पूरी दुपहरी अपनी। चारों ओर प्रकृति। अलसाया सा तन। कभी गर्म तो कभी ठंडी हवा की छुवन । खुद को जानने समझने का पूरा मौका। इसे कहते हैं आत्म सुख। दो घंटा खूब ऐंठ कर सोने के बाद जब नींद खुली तो पूरी बनियान भीगी हुई। मगर शरीर में फुर्ती भरी हुई। उठ कर बैठ गए। थोड़ी देर बाद जब होश में आये तो उठकर सिंचाई वाली नाली के पास गए। मुँह धोये और गमछा से पोंछ कर चल दिये बाजार की ओर, पैदल ही। चाट खाएंगे हरा मिर्चा और खूब टमाटर और मूली का सलाद डालकर। चलते-२ भैया की ससुराल जाने का भी प्लान बना लिए। इस बार तो हाथ पकड़ना ही हैं उनका। ऐसे थोड़े ही। आखिर कब तक………!!

~अनुनाद/आनन्द कनौजिया/२१.०६.२०२०

Posted in POETRY, SHORT STORY

एक लखनवी की लव स्टोरी…

वो इमामबाड़ा ही तो था जहां तुझसे नैन मिलें थे,
भूल भुलैया की दीवारों में हम दुनिया भूल गए थे।

सूरत तेरी आंखों में लेकर फिर तुझे ढूढ़ने निकले थे ,
चौक चौराहे से लेकर चूड़ी वाली गली तक खूब भटके थे।

लखनऊ यूनिवर्सिटी से लेकर शिया कॉलेज तक हर सड़क छानी थी,
इस चक्कर में दोस्तों को शर्मा की न जाने कितनी चाय पिलाई थी।

मुलाकात की उम्मीद में हमने नज़राना खरीद लिया था,
इस चक्कर में अमीनाबाद की तंग गलियों को हमने नाप लिया था।

बालाघाट से लेकर यहिया गंज तक हर गली को हमने नापा था,
छतर मंजिल, रेजीडेंसी और ग्लोब पार्क,उन दिनों अपना यही ठिकाना था।

केसरबाग़ चौराहे से निकले हर रास्ते को देख चुके थे ,
इरादे बहुत मजबूत थे पर अब हम उम्मीद खो चुके थे।

थक हार कर, यारों को लेकर उस शाम हम कुड़िया घाट पर थे,
कुछ मोहतरमाओं की टोली के संग तुम भी वहां मौजूद थे।

दिल की धड़कन बढ़ गयी थी न जाने कैसा जादू था,
थाम लिया था हाथ तेरा, मेरा खुद पर न कोई काबू था।

एक तरफ़ा प्यार की तुमको न कोई खबर थी ,
और हम भी बौड़म थे जो ये गुस्ताखी करी थी।

घबराकर तुमने शोर मचाया और फिर पुलिस चली आई थी,
और फिर  हमने पूरी रात ठाकुरगंज थाने में बिताई थी।

थाने आने का हमको कोई नही गिला था,
मार तो पड़ी किंतु तेरे घर का पता वहीं चला था।

फिर तो मिलने मिलाने का सिलसिला जो शुरू हुआ था,
साहू सिनेमा से लेकर हज़रत दरबार तक प्यार हमारा जवाँ हुआ था।

हाथों में हाथ लिए नीम्बू पार्क से लेकर चिड़िया घर तक घूमे थे,
यामाहा पर मेरी बैठ कर इक दूजे को हम महसूस किए थे।

दिलों की बेक़रारी को करार पहुचाने हम कुकरैल पार्क पहुँचे थे,
प्यार को परवान चढ़ाने हम इंदिरा डैम पहुचे थे।

आगे के अंजाम को लेकर तुम बेहद घबराए थे ,
इस कहानी के परिणाम को लेकर बेहद सकुचाए थे।

न घबराओ तुम कि हमारे मिलन का ये लखनऊ गवाह है ,
ये प्यार तब तक जवान रहेगा जब तक गोमती में प्रवाह है।