Posted in CHAUPAAL (DIL SE DIL TAK)

कोरोना और देश की हालत !

मेरे लिए कोरोना आज तक एक शब्द ही था ! कुछ खबर, कुछ आँकड़े, कुछ मौतें, कुछ सिस्टम की नाकामी और कुछ कोरोना को लेकर सरकार के असफल निर्णयों को सफल घोषित करते और उनकी झूठी प्रशंसा करते पत्रकार…. मैंने लाकडाउन भी देखा और अपने कर्तव्यों के निर्वाहन हेतु लाकडाउन में अपने क्षेत्र में भी निकला। पूरी की पूरी पुलिस, आर्मी सब लगी थी लाकडाउन में! घर से ऑफिस जाने में कई बार चालान कटने तक की नौबत भी आयी….

कई बार मन में ये भी आया कि काश कोरोना पॉजिटिव की रिपोर्ट मिल जाये तो ऑफिस में २०-२१ दिन की छुट्टी भी ले लूँ ! दोस्तों से फ़ोन पर, ऑफिस में हर जगह बस गप्प ही गप्प! चाय की दुकान पर चाय भी पी रहे हैं, लैया-चना भी खा रहे हैं! रोज ऑनलाइन स्विग्गी और जोमैटो भी हो रहा है ! भाई वाह ! क्या कहने ! हम तो कोरोना काल को फुल एन्जॉय कर रहे थे ! डर था और कोरोना भी था ही! लेकिन बस बात भर को और हमारे दिमाग में बात करते क्षण भर को।

लेकिन कल रात को आँखें खुल गयी। जब एक मित्र के बड़े भाई को, ऑक्सीजन लेवल कम होने पर रात भर लखनऊ जैसे शहर में गाड़ी लेकर घूमते रहे और दर्जनों हॉस्पिटल्स ने सिरे से एडमिट करने से मना कर दिया। सरकारी हॉस्पिटल भी फुल चल रहे थे। कोविड हेल्प लाइन नंबर को खुद हेल्प की जरुरत थी! एक ही जवाब कि आई०सी०यू० की व्यवस्था नहीं है, बेड खाली नहीं है। मरीज के परिवार के आँखों में उदासी, अपने को खोने का डर, कुछ न कर पाने की लाचारी और मैं भी असहाय….! ये सब बेहद करीब से अनुभव किया मैंने।

ये सब देखने के बाद तो दिल में डर सा बस गया। लेकिन आज ये डर कोरोना से नहीं था। खराब सिस्टम और चिकित्सा व्यवस्था से था। अव्यवस्थित, अपंग और मूढ़ शासन-प्रशासन से था। माना कि ये महामारी का दौर है और कुछ चीजे नियंत्रण से बहार है लेकिन कोरोना को आये एक साल से ज्यादा हो गया। हमने वैक्सीन तो बना ली लेकिन सिस्टम अभी तक नहीं बना पाए। हॉस्पिटल्स नहीं बना पाए या क्षमता नहीं बढ़ा पाए। या फिर सच ये है की ये सब हमारे एजेंडे में ही नहीं है।

सारा विकास और लक्ष्यों की प्राप्ति केवल सरकार के सरकारी विज्ञापनों में हैं। साकार अपनी योजनाओं को विज्ञापन के माध्यम से लागू करती है, विज्ञापनों में पूरा भी कर लेती है और विज्ञापनों के माध्यम से खुद की पीठ भी थप-थपा लेती है। मजा आता है ये सब देखकर और अफ़सोस होता है अपने पढ़े-लिखे और समझदार होने पर ! ताज्जुब होता है कि ये सरकार हमने ही चुनी है न ? या किसी कंप्यूटर ने ?

अगर आप गरीब है तो आपके पास अपनी किस्मत और ईश्वर को कोसने के अलावा कुछ और नहीं है। यदि आप मध्यम वर्गीय है तो अपने पारिवारिक पृष्ठभूमि के साथ नौकरी और व्यवसाय को कोसने के अलावा कुछ और नहीं। सरकार और ईश्वर को कोस नहीं सकते आप। और यदि उच्चवर्गीय है तो आप भगवान और सरकार जैसी व्यवस्थाओं में समय नहीं बर्बाद करेंगे और अच्छी व्यवस्था तलाशेंगे भले ही वो किसी और देश में मिले। सरकारें तो खुद आपके सामने झोली फैलाएँ खड़ी मिलेंगी।

अंत में इतना कहूँगा की सिर्फ पढ़े-लिखे होना/दिखना जरुरी नहीं है। पढ़-लिखे जैसा बर्ताव भी जरुरी है। वरना कोई मूर्ख अपनी सरकार बना लेगा और अगले पांच साल तक वो विज्ञापनों के माध्यम से खुद को समझदार और आपको चूतिया साबित करता रहेगा।

देश आपका।

जान आपकी।

इस पर नियंत्रण आपका।

जीवन के लिए उचित सभी सुविधाएँ आसानी से उपलब्ध होनी चाहिए। इसकी माँग करिए। समझदारी से करिए। खुलकर करिए। जीवित रहिएगा तो ईश्वर की आराधना कर ही लीजियेगा।

आप सभी को प्रणाम 🙏

आशीर्वाद दीजिये कि स्वस्थ रहूँ और कुदृष्टि से बचा रहूँ 😆

किसकी कुदृष्टि ? ये मत पूछिए। जाने दीजिये।

धन्यवाद्।

©️®️कोरोना और देश/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/१५.०४.२०२१

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चेहरा तेरा!

चम-चम चाँदनी रात की,
कहानियाँ भी खूब बनी हैं,
चमकते चाँद की हमने
तारीफ भी खूब सुनी हैं।

देख कर चेहरा ये चमकीला
अब दुविधा बड़ी खड़ी है,
ये कुदरत लाजवाब है कि
उसकी रचना उससे बड़ी है।

चमकते चेहरे की शोखियाँ
आंखों को भाती बड़ी है,
लगती है चौंध आंखों को
जैसे किरणों की लड़ी है।

नूरानी चेहरे के कैनवास पर
रेखाएँ मुस्कान की खींच रखी है,
जुल्फों पर रोशनी की चमकीली
तितलियाँ ढ़ेरों बिठा रखी हैं।

एक चमक सूरज की जिससे
तेज धूप है, लगती लू बड़ी है,
और एक चमक तेरे चेहरे की
जिसकी छाँव में ठंडक बड़ी है।

साधारण से इस चित्र में तेरे देखो
चेहरे की आभा असाधारण बड़ी है,
करने को अभिव्यक्ति इस नूर की
कलम मेरी यात्रा को निकल पड़ी है।

©️®️चेहरा/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/०६.०४.२०२१

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मोहब्बत!

एक तुझसे मोहब्बत की आदत क्या लगी हमें देखो…
अब तो चल-अचल हर प्राणी से मोहब्बत किये जा रहे हैं!

निहार लेते हैं रूप तेरा अब हम तो सबमें, तेरे बाद से…
बस इस तरह तुझसे अपनी मोहब्बत निभाये जा रहे हैं!

©️®️मोहब्बत/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/०६.०४.२०२१

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साहित्य और महिला लेखक

इग्नू की सहायता से हिन्दी में एम० ए० कर रहा हूँ। कल पहले वर्ष के सत्रांत का तीसरा पर्चा है। साल भर तो पढ़े नहीं लेकिन महीने भर से थोड़ा बहुत पढ़ लिए हैं। मतलब कि पाठ्यक्रम के हिसाब से थोड़ा और पास होने के हिसाब से अधिक। लेखन में पुरुष लेखकों के साथ महिला लेखकों को भागीदारी भी पढ़ी। अच्छा लगा कि महिलाएँ भी कंधे से कंधा मिला कर चल रही हैं। मैं तो चाहता ही हूँ कि कोई महिला मुझसे कन्धे से कन्धा मिलाकर चले😉

खैर…….! निष्कर्ष एक ही निकला। महिलाएँ पुरुषों से कहीं आगे हैं। पुरुषों का जीवन बिना औरत के अधूरा है। जबकि औरतों को पुरुषों की कोई जरूरत नहीं। लड़ने के लिए दो महिलाएँ ही काफी हैं जबकि पुरुषों को महिलाओं की जरूरत पड़ती है ………😁😋।

हाहा……🤣😅।

कोई भी उपन्यास, कहानी, काव्य और कुछ भी उठा लीजिए, मेरे द्वारा ऊपर जो निष्कर्ष निकाला गया है उससे आप शत प्रतिशत ताल्लुक रखते हुए मिलेंगे। महिला लेखकों को पढ़ने के बाद तो इस विचार को मान्यता सी मिल गयी। स्त्रियाँ आजादी की बात तो करती हैं किंतु यह आज़ादी वह अपने लिए नहीं मांगती अपितु इस पुरुष प्रधान समाज को दिखाने के लिए। बात गम्भीर है। स्त्रियों की इस इच्छा के लिए भी सदियों से चले आ रहे पितृसत्तात्मक समाज ही मुख्य कारण है।

बात गम्भीर है इसलिए व्यंग्य का पुट लेना पड़ा। सोचिएगा …..!

©️®️अनुनाद/आनन्द कनौजिया/१७.०२.२०२१