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रेडियो जॉकी

आज सुबह ऑफिस जाते वक्त एफ० एम० पर महिला आर०जे० को बोलते हुए सुना। ऐसा नही है कि पहली बार सुन रहा था पर ध्यान पहली बार दिया। कितना अच्छा प्रस्तुतीकरण होता है, एक दिलकश आवाज़ और मिनट भर में कई तरह के भावों को शामिल करते हुए कितना स्पष्ट बोलती हैं ये महिला आर०जे०। दिल खुश हो जाता है। अचानक फिर मेरे मन में दो ख्याल आए-

१. क्या ये महिला आर० जे० शादीशुदा होंगी? वैसे मुझे नही लगता कि शादीशुदा महिलाएँ ऐसे बातें कर सकती हैं। उन्हें मुँह फुलाने, झगड़ा करने और लाख पूँछने पर रूठने का कारण न बताने के अलावा कुछ और नहीं आता। पत्नी का मुस्कुराता चेहरा तो एक पति के लिए बस ईद का चाँद है।

२. पहले बिन्दु का उत्तर अगर हाँ है तो फिर तो उनके घर में झगड़े होने की सम्भावना न के बराबर है और इस तरह अगले जन्म में किसी महिला आर० जे० से शादी पर विचार करना ही उचित होगा।

अनुरोध- नीलिमा जी इस पोस्ट को गंभीरता से न लें। ये केवल एक पल का विचार है जो रेडियो सुनते वक़्त आ गया था जिसे मनोरंजन स्वरूप इस पेज पर पोस्ट किया गया है। ये लेख एक लेखक की कल्पना है और व्यक्तिगत रूप से मेरा इस विचार से कोई सम्बन्ध नहीं है।

©अनुनाद/आनन्द कनौजिया/२२.१०.२०२०

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प्रकृति सौंदर्य

अद्भुत है प्रकृति की सत्ता,
रची है खूबसूरत कविता।
शब्द कहाँ इतने ख़ूबसूरत ,
फूल-पत्तियों की ये कविता।

श्रृंगार कौन करता
रूप ये कैसे मिलता
बहारों का मौसम ये
तिनका-२ रिसता।

रूप ये करता मोहित
साँसों को सुगंधित
रोम-रोम हुआ हर्षित
और हृदय प्रफुल्लित।

होकर इनसे प्रेरित
मानव करता निर्मित
श्रृंगार के तरीके सौ
करने को उनको मोहित।

रूप दुल्हन सा होता है
बाँधने को दो दिलों को
फूलों सी मुस्कान जरूरी
तन से रूह तक उतरने को।

देखो ये फूल भी अब तो,
बनके श्रृंगार सामने हैं नजरों के,
सँवरने की क्या जरूरत, तुम बस
चले आओ दिल की ठंडक को।

©️अनुनाद/आनन्द कनौजिया/१२.१०.२०२०

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चकाचौंध

कहते हैं तेरे शहर में चकाचौंध बहुत है,
मान लिया इन बातों में सच्चाई बहुत है।

होती नहीं यहाँ रात कि रोशनी बहुत है,
लेकिन मुझे फिर भी अफसोस बहुत है।

मन मेरा पागल तुझे यहाँ ढूंढता बहुत है,
कोशिशों के बावजूद नही राहत बहुत है।

तेरा चेहरा सामने न हो तो क्या बताएँ,
मेरी इन आँखों में रहता अँधेरा बहुत है।

©️अनुनाद/आनन्द कनौजिया/०५.१०.२०२०

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आधी रात और चाँद

आज फिर आ गई तेरी याद……
और हमने निहार लिया चाँद….!

जिस तरह कैद है तेरी अदाएँ मेरी इन आँखों में,
हमने उसी तरह कैद कर लिया चाँद को कैमरे में।

कुछ पल तेरे साथ होने का एहसास पा लिया,
संग चाँद के हमने एक लम्हा अकेले गुजार लिया।

आधी रात है और मेरे साथ ऐसे तुम्हारी याद है,
डालियों की झुरमुट से जैसे निहारता ये चाँद है।

देखो ये चाँद इतनी दूर होकर भी लगता कितना पास है,
और तू दिल के इतनी करीब होकर भी रहती कितनी दूर है।

क्या ही करें और क्या ही कहें तुम्हारी इस बेवक़्त याद से,
चलो कर लेते हैं कुछ शिकायतें आधी रात को इस चाँद से।

©️अनुनाद/आनन्द कनौजिया/३०.०९.२०२०