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साथ…(खुद का)

अकेले आये थे
अकेले जाना है
ये जीवन भी हमें
अकेले ही बिताना है।

इर्द-गिर्द की भीड़ छलावा
अपना न कोई नाता है
अकेलेपन का गीत
इसीलिए तो भाता है।

खुद का साथ
खुदा का साथ
जीवन सुख में
अपना ही हाथ।

ज्ञान का अभिमान
दिखाता अज्ञान
झुककर देखा
तभी मिला सम्मान।

बन्द मत करो
चार दीवारों में
खुलकर मिलो सबसे
खुशियाँ नज़ारों में।

करते रहो बातें
जीते रहो बेमिसाल
वरना उम्र का क्या
कट जाएगा ही साल।

अकेले आये थे
अकेले ही जाना है
ये जीवन भी हमें
अकेले ही बिताना है।

©️®️अनुनाद/आनन्द कनौजिया/२०.०३.२०२१

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बी एच यू (मेरी नज़र से)

बाबा महादेव की नगरी हो, बी एच यू का प्राँगढ़ हो,
नाम तेरा होंठो पर हो और दिल में तेरी दी बेचैनी हो।

आई टी का मन में घमंड हो, चले तो सीना चौड़ा हो,
हॉस्टल की शाम सुहानी हो, खून में भरपूर रवानी हो।

उमा जैसा लव गुरु हो, बिरजू का बेवजह का रोना हो,
राधे माँ का तांडव हो औऱ मालिक की लचकती कमर हो।

दबंग का ज्योतिष दर्शन हो, बज्जर का टट्टी सा मुंह हो,
प्रेम की मासूम मुस्कान हो, भानु पापा की छत्र-छाया हो।

मरतोलिया की कम होती लम्बाई हो, राजा जी की तोंद हो,
अल्बर्ट का नींबू पानी हो और पिछली रात का हैंग ओवर हो।

अमित सर की बाइक हो, उस पर मेरा ग़ायब होना हो,
सरपट बनारस में दौड़ती हो, नज़रें केवल तुझको ढूँढती हो।

चारों तरफ अपने यार हों, महफिलें होती खूब गुलजार हों,
करने को मौज बहुत हो फिर भी बिन तेरे मन न लगता हो।

धनराजगिरी का कमरा हो, लिम्बड़ी कार्नर की गर्म-२ चाय हो,
सी वी रमन के संग मोर्वी की चौपाल में अब लगता मन न हो।

वी टी की कोल्ड कॉफ़ी हो, संकट मोचन के बेसन लड्डू हों,
गोदौलिया की भांग की ठंडई हो पर उसमें अब कोई नशा न हो।

आई टी कैफेटेरिया की कॉफी हो, दोस्तों की हँसी ठिठोली हो,
सेंट्रल लाइब्रेरी की डेस्क हो, बिन तेरे लगती बिल्कुल सूनी हो।

रामनगर से सारनाथ तक और लखनिया दरी से चूड़ा दरी हो,
चुनार किले का सन्नाटा हो और विंध्याचल में तेरी खोज हो।

रविदास पार्क हो, अस्सी घाट की शाम हो,
कदम आवारा से हों और बस तेरी तलाश हो।

दिल में उथल-पुथल हो , २०-२१ की उम्र हसीं हो,
कुछ जुड़ता हमसे रोज हो और उसको लेकर प्रश्न बहुत हो।

संकट मोचन का द्वार हो, दुर्गा कुंड की घण्टियाँ हो,
काशी कोतवाल के दरबार में ढूंढते सारे प्रश्नों के उत्तर हो।

बुनते ढेरों सपने हो, दिल चाहे बढ़िया नौकरी हो,
पर जॉब के लगने पर दिल ये मेरा क्यों गुमसुम हो।

महामना की बगिया से दूर जाने का मेरा मन न हो,
ज्यूँ-ज्यूँ समय गुजरता जाए धड़कन की गति बढ़ती हो।

आखिरी समय चलने का हो, बैठने को माँ गंगा का आँचल हो,
कुछ न आये समझ में, ये कदम रोज काशी विश्वनाथ की ओर हों।

कितना कुछ यहाँ मिला हुआ हो, रखने को यादों का एक गट्ठर हो,
कैसे जाऊँगा कि दिल भारी हो, आँखों से मेरी छलकता समंदर हो।

जा रहा हूँ खुद को छोड़कर यहाँ, मेरे पास बस तेरे यादों की निशानी है,
आता रहूँगा कुछ खोजने को यहाँ कि रह गयी अधूरी एक कहानी है।

हर हर महादेव…..
जय भोलेनाथ…..
हर हर गंगे…..

©अनुनाद/आनन्द कनौजिया/०७.०१.२०२१

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साथ …

बढ़ती उम्र का देखो क्या अजब फलसफा है,
साथ छोड़कर निकल रहे हैं साथ चलने वाले।

वादा था कि हम मिलते रहेंगें हज़ार कोशिशें करके,
और अब देखो कि सारी कोशिश बहाने खोजने की हो रही।

तुम्हारे लिए तो ये कुछ पल, दिन, महीने ही गुजरें है,
और यहाँ तुम्हारे बिन हमारी तो सदियाँ गुज़र गयीं।

एक मासूम सूरत थी बिल्कुल भोली सी, हाँ तेरी ही तो थी,
तेरे बिछड़ने फिर न मिलने से देखो आज भी बिल्कुल वैसी ही है।

बढ़ती उम्र का भी नही हुवा कोई असर आज तक देखो,
मेरे ख़्यालों में तेरा चेहरा आज भी पहले जैसा है।

एक ख्वाहिश थी साथ जीने-मरने की और अब कमाल तो देखो,
न हो मुलाकात उनसे अब हम इसकी दुवा दिन-रात करते हैं।

उम्र ही तो काटनी है, कट रही है, कट ही जाएगी,
साथ तेरा हो या तेरी यादों का, नशा एक बराबर है।

अनुनाद/यादों का आनन्द/२३.१२.२०२०

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कोरोना की दवा- शादी!

पर्यायवाची और विलोम ये दो शब्द हर हिंदी के छात्र ने पढ़ा और सुना होगा। अगर कोई मुझसे पूछे कि कोरोना का विलोम क्या है तो मैं बोलूंगा कि ‘कोरोना’ का विलोम है ‘शादी’। हा हा…. आप भी सोच रहे होंगे कि क्या बात कर रहा है ये लौंडा! मतलब कि कुछ भी! नहीं भैया कुछ भी नहीं फेंक रहे हैं। बिल्कुल सही बात कर रहें हैं।

जिस तरह कोरोना ने हमारे जीवन को वीरान कर दिया था। सबसे दूर कर दिया था। नाते-रिश्ते सब खत्म कर दिए थे ! हम एक नीरस और बिना मतलब का जी रहे थे। मोह-माया त्याग कर बिल्कुल सन्यास की तरफ बढ़ चले थे और स्थिति ये आ गई थी कि हर कोई मोक्ष के मुँहाने पर ही लाइन लगाए खड़ा था कि ….. तभी चालू हो गया शादियों का सीजन! और बस यहीं कोरोना का असर खत्म! सारा डर काफ़ूर! कैसा कोरोना! काहे का कोरोना! कौन कोरोना! कहाँ का कोरोना! कोरोना मतलब? कुछ सुना-सुना सा लगता है कोरोना! अच्छा वो फलाँ चाचा वाली चाची की बहन की बेटी कोरोना! अरे नहीं वो तो करुणा है! तुम भी न! बकलोले हो बिल्कुल!

भाईसाहब ! शादियों का सीजन क्या शुरू हुआ कि बाजार गुलजार हो गए! निमंत्रण बँटने लगे! जीजा-फूफा लोगों की बाँछे खिल गयी। अब फिर रूठने का मौका मिलेगा! सालियों के मन में लड्डू फूटने लगे, अब तो जूते चुराएँगे और पैसे बनाएँगे! दूल्हा-दुल्हन तो अलग ही लेवल पर हैं, वो तो जमीन पर उतर ही नहीं रहे। बुवा, मौसी, चाची सारे रिश्ते ज़िंदा हो गए। मोह-माया जो बस प्राण छोड़ने ही वाली थी, पुनः जीवित हो उठी। और मोक्ष को प्राप्त होने वाले लोग पुनः इस मृत्युलोक के मजे लेने लगे। हा हा… बचा लिया शादी ने इस संसार को!

हे शादी! तुम भगवान विष्णु का कोई अवतार लगते हो! जो इस दुनिया को बचाने चले आए! कोई न ! देर आए दुरुस्त आए…! माहौल में गर्मी यूँ ही बनाए रखना!

और हाँ इस बार शादी का ये सीजन खत्म न हो। सबकी शादी हो जाए! अखण्ड कुँवारों की भी ! आपकी भी! क्या? आपकी हो गयी है? कोई न! घर पर पूँछकर दूसरी कर लीजिए। आखिरकार कोरोना को हराना जो है। “सबका साथ कोरोना का नाश!”

दुनिया फालतू में वैक्सीन बनाने में लगी हैं! हम आज ही एक शादी निपटाएँ हैं और कल दूसरी में जाने की तैयारी है। चलता हूँ गरम पानी में नमक डालकर….न-न गरारे नहीं करने! पीना है! पेट जो साफ करना है। आज पूड़ी खाने में कसर रह गई! कल दो पूड़ी ज्यादा खानी पड़ेगी!

अनुनाद/शादी-शुदा आनन्द/३०.११.२०२०

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टोल नाका

तुम मेरी जिंदगी के सफर में हाइवे का टोल नाका हो, जहाँ मैं पल भर को रुकता हूँ और टोल की फॉर्मेलिटी जैसे ही निपटती है, मैं फुल एक्सेलरेटर में वहाँ से निकलता हूँ और पीछे मुड़कर नहीं देखता, कभी भी! लेकिन जब तक जिंदगी का ये सफर है, ये हाइवे है, ये टोल भी रहेगा! उसी तरह तुम भी मिलते रहोगे! कभी साक्षात तो कभी ख़्यालों में, यादों की तरह ! इससे मैं बच नहीं सकता। लेकिन अगली बार एक्सेलरेटर और तेज लिया जाएगा………..!


©अनुनाद/आनन्द कनौजिया/०२.११.२०२०


फ़ोटो साभार इन्टरनेट।