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ज़िन्दगी में कभी लॉकडाउन नहीं होता…

साँसे तो हमें रोज लेनी है
भूख भी रोज ही लगनी है
सच है कि साँस उखड़ने से पहले
ज़िन्दगी में कभी लॉकडाउन नहीं होता…

मेहनत रोज ही करनी है
रोटी भी रोज कमानी है
उन्हें चलाने हैं फावड़े, कन्नी और बँसुली
मजदूरों की ज़िन्दगी में लॉकडाउन नहीं होता…

नदिया रोज है बहती
हवा भी रोज है चलती
करने को दिन-रात सूरज-चाँद रोज निकलते
इस प्रकृति के चक्र का लॉकडाउन नहीं होता…

रसोई रोज लगती है
थालियाँ रोज सजती है
रखने को ख्याल वो दिन भर लगी रहती
माँ की ज़िन्दगी में लॉकडाउन नहीं होता…

जीवन का नाम हैं चलने का
नहीं रुकने का नहीं ठहरने का
दौर मुश्किल, जरूरत है समझने की
इन दूरियों से नजदीकियों का लॉकडाउन नहीं होता…

तुम एक पल को बैठ सकते हो
अपने घर में रुक भी सकते हो
जिन्हें जरूरी है निकलना उनको मौका दो
आवश्यक सेवाओं का कभी लॉकडाउन नहीं होता…

प्रगति ने एक एक दौड़ शुरू की है
न चाहते हुए हमने दौड़ जारी रखी है
मौका मिला है रुक कर साँस लेने को
मुड़कर देखने को समय में लॉकडाउन नहीं होता…

किस्मत हमारी कितनी न्यारी है
शब्दों और कलम से हमारी यारी है
लिखना-पढ़ना ही है जीविका हमारी
घर बैठ काम करने को सबको लॉकडाउन नहीं मिलता…

©️®️लॉकडाउन/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/०२.०५.२०२१

फोटू: साभार इंटरनेट

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गरीबी एक अभिशाप…

कैसे समाज का देखो मैं हिस्सा हूँ
किसको दिखलाता हूँ अपनी प्रगति
मैं सोऊँ मखमल, वो सोए सड़क
हृदय वेदना अश्रुपूर्ण, कैसी मेरी नियति।

भूखे-नंगे रोते-बिलखते बचपन से
फटे-चीथड़ों में लिपटे कोमल तन से
हाथ पसारे इन नन्हें कोमल हाथों से
देख आँख में इनके गड़ जाता हूँ शर्म से।

आँखों की ये खोई चमक
जेब में हाथों का खालीपन
दाल-रोटी की खोज में देखो
खो गया कीमती बचपन।

बचपन जो देख सकता था सपने
सपनों में बुन सकता था भविष्य
तंग हाथ से सुलझाने में है खोया
इस अनसुलझी भूख का रहस्य।

ऐसा कीमती बचपन सँवारने को
क्यों नहीं हम हाथ लगा सकते
इतनी अच्छी मिट्टी को गढ़ने को
क्यों नहीं कुम्हार हम बन सकते?

बनना है हमको विश्वगुरु
दिखलाना है जग को पथ
भूखा बचपन निराश मन
कैसे बढ़ेगा ये विशाल रथ?

आधार कार्ड का देश हमारा
पता है सबका पता ठिकाना
किसकी कितनी जरूरत है
नहीं कठिन है अब बतलाना।

पकड़-पकड़ कर सबको तुम
अब रोजी-रोटी दे सकते हो
खोने न पाए अब कोई बचपन
सुदृढ़ व्यवस्था कर सकते हो।

न दिखे कोई अब भीख माँगता
विश्वगुरु तुमसे इतना तो बनता
एक भी आदमी बिना काम के
ढूढने से भी अब न हो दिखता।

हर हाथ को काम हो
हर बचपन को हो शिक्षा
विश्वगुरु बनने की तब
पूरी होगी अभिलाषा।

मुक्तक

“वो कहते हैं देखो हो रहा चंहुओर विकास
हमने ही है दिखलाई सूखी आँखों को आस
मैं भी बोलूँ हँस कर इनसे, ऐ मेरे सावन के अन्धे
बन्द आँखे खुल चुकी, झूठ तुम रखो अपने पास।”

©️®️गरीबी एक अभिशाप/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/२१.०४.२०२१

फ़ोटो: साभार इंटरनेट

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चोला………(स्त्री के तन का)

एक पुरुष होकर ऐसे विषय पर लिखना, असंभव कार्य है। किंतु इस समाज का हिस्सा होकर और ऐसे पद पर रहते हुए जिसमे पब्लिक डीलिंग प्रमुख कार्य हो, मुझे विविध प्रकार के पुरुषों, स्त्रियों , बच्चों , युवा, प्रौढ़ और वृद्ध व्यक्तियों से मिलने , बात करने का मौका मिला। सामान्यतः मेरे पास सभी कुछ न कुछ समस्या लेकर ही आते हैं और यही मेरे लिए सबसे अच्छा अवसर होता है व्यक्ति विशेष को समझने का। ऐसे तो साधारण स्थिति में आप किसी को पहचान नही सकते किन्तु जब वह परेशान हो तो उस व्यक्ति का प्रकार, प्रकृति, चरित्र और चलन सब सामने आ जाता है। थोड़ा संयम रखकर उससे बात की जाए तो आप उस व्यक्ति का पूरा इतिहास खंगाल सकते हैं।
समस्या, उससे होने वाली परेशानी और उत्पन्न कठिनाई प्रायः दो तरह की होती है- एक स्त्री और दूसरा पुरुष के लिए। एक समान समस्या के लिए दो बिल्कुल ही अलग स्थिति, व्यवहार, क्रिया और उस पर सामाजिक प्रतिक्रिया । यहीं भेदभाव जन्म लेता है। ऐसा नही है कि ये भेदभाव केवल स्त्री को ही झेलना है बल्कि पुरुष भी इसका बराबर शिकार है। किंतु फर्क इतना है कि पुरुष प्रधान समाज मे स्त्री को बोलने का हक़ नही है और पुरुष अपना दुख बोल नही सकता। स्त्रियों से संबंधित गड़बड़ियों को तूल बनाकर उछाला जाता है कि इससे समाज की छवि बिगड़ेगी और न जाने क्या क्या……! जबकि पुरुष से संबंधित चीजों को दबा दिया जाता है यह कहकर कि अबे! तुम कैसे आदमी हो?
लिखने को तो दोनों पर ही बहुत है पर आज का विषय हैस्त्री! पढिये और अपने विचार व्यक्त करिये……
कहने को अबला हूँ
बेचारी हूँ लाचार हूं।
करते मेरा शिकार
मिटाने को अपनी हवस
कितनो को गिरते देखा है
खुद के सामने।
कमजोर हो तुम
या
अबला हूँ मैं…..?
कहने को कमजोर हूँ पर
लड़ी गयीं लड़ाइयाँ
मुझको लेकर
करने को मुझ पर नियंत्रण
दिखाने को मर्दानगी
भरने को हुंकार ।
खोखले हो तुम
या
कमजोर हूँ मैं…..?
रूप हूँ सौंदर्य हूँ
कोमलांगी हूँ
फूल भी शर्मा जाएँ कि
चढ़ते यौवन का श्रृंगार हूँ।
किन्तु कुचला गया मुझे
दिखाने को अपना सम्मान।
कुत्सित हो तुम
या
श्रृंगार हूँ मैं….?
हिल जाये धरा
भूचाल हूँ।
पिघला दूँ चट्टानों को
वो आग हूँ।
पर देती तुझे ममता
सँवारती तेरा भविष्य……
मासूम हो तुम
या
शक्ति का रूप हूँ मैं….?
चलूँ सड़क पर
देखो हम पर नज़रें हज़ार हैं
गन्दगी तुम्हारी आँखों में
देखो बेशर्म हम हैं।
कपडे तन ढकते हैं
या चरित्र तय करते हैं ?
गंदा मन तुम्हारा
या
सिर्फ जिस्म हूँ मैं….?
लिखते हो गीत
मेरे सुन्दर नयनों पर
पलकों पर
होंठों पर
बालों पर
लचकती कमर पर।
मन और भावों को भी समझते हो
या
अंगों का सिर्फ एक गट्ठर हूँ मैं….?
आगे बढ़ने को
नाम रोशन करने को
लड़ते नहीं सिर्फ खुद से
होता संघर्ष समाज से
पहुँच कर ऊंचाइयों पर
होते हम सदा अकेले।
साथ चलने की बर्दाश्त तुम में नहीं
या
असाधारण हूँ मैं ?
समानता की नहीं गुंजाइश
भेद को यहाँ देखो कई हैं तत्व
औरत की बराबरी को
पुरुषों में नहीं इतना पुरुषत्व।
समानता से होगी सिर्फ तुलना इक की दूजे से
अब बात हो सिर्फ सम्मान की।
बात रखने की इजाजत है हमें
या
मेरी हर बात गलत है….?
©️®️अनुनाद/आनन्द कनौजिया/२८.०२.२०२१
फोटो: साभार इण्टरनेट
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संयोग……..मिलने का !

अचानक मुलाकात हो जाये
ऐसे संयोग अब नहीं होते क्या?

भीड़ में तुझसे आँखे मिल जाये
ऐसे मधुर योग अब नहीं होते क्या?

सुनकर मेरा नाम कोई जो पुकारे
तेरा दिल अब नहीं धड़कता क्या?

हिचकियाँ नही आती आज कल
तुमको अब हमारी याद नहीं आती क्या?

दिन में भी रहते हैं ख्वाबों में,
उन्हें रात में अब नींद नहीं आती क्या?

दोस्तों में बस उनकी बातें हो,
ऐसी महफिलें अब नहीं लगती क्या?

हमारे साथ की तलब नहीं लगती
मन मचलने की अब उम्र नहीं रही क्या?

बहुत दिन गुज़र गए बिना हाल-चाल के
तुमको हमारी फिक्र अब नहीं रही क्या?

ख्यालों में बगल से रोज गुजरते हैं तेरे
मेरे होने की तुझे अब आहट नहीं मिलती क्या?

और एक उम्र मिली थी जो बहुत तेज बीत रही है,
अकेले बीतती इस उम्र से अब डर नहीं लगता क्या?

कभी तो हमसे मिल लिया करो
मिलने को अब बहाने नहीं मिलते क्या?

लगता है बहुत दूर चले गए,
हमारे शहर अब आना नहीं होता क्या?

काश! आज अचानक तुमसे मुलाकात हो जाये
ऐ खुदा तू ऐसे संयोग अब नहीं बनाता क्या?

©️®️अनुनाद/आनन्द कनौजिया/३०.०१.२०२१

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कोरोना की दवा- शादी!

पर्यायवाची और विलोम ये दो शब्द हर हिंदी के छात्र ने पढ़ा और सुना होगा। अगर कोई मुझसे पूछे कि कोरोना का विलोम क्या है तो मैं बोलूंगा कि ‘कोरोना’ का विलोम है ‘शादी’। हा हा…. आप भी सोच रहे होंगे कि क्या बात कर रहा है ये लौंडा! मतलब कि कुछ भी! नहीं भैया कुछ भी नहीं फेंक रहे हैं। बिल्कुल सही बात कर रहें हैं।

जिस तरह कोरोना ने हमारे जीवन को वीरान कर दिया था। सबसे दूर कर दिया था। नाते-रिश्ते सब खत्म कर दिए थे ! हम एक नीरस और बिना मतलब का जी रहे थे। मोह-माया त्याग कर बिल्कुल सन्यास की तरफ बढ़ चले थे और स्थिति ये आ गई थी कि हर कोई मोक्ष के मुँहाने पर ही लाइन लगाए खड़ा था कि ….. तभी चालू हो गया शादियों का सीजन! और बस यहीं कोरोना का असर खत्म! सारा डर काफ़ूर! कैसा कोरोना! काहे का कोरोना! कौन कोरोना! कहाँ का कोरोना! कोरोना मतलब? कुछ सुना-सुना सा लगता है कोरोना! अच्छा वो फलाँ चाचा वाली चाची की बहन की बेटी कोरोना! अरे नहीं वो तो करुणा है! तुम भी न! बकलोले हो बिल्कुल!

भाईसाहब ! शादियों का सीजन क्या शुरू हुआ कि बाजार गुलजार हो गए! निमंत्रण बँटने लगे! जीजा-फूफा लोगों की बाँछे खिल गयी। अब फिर रूठने का मौका मिलेगा! सालियों के मन में लड्डू फूटने लगे, अब तो जूते चुराएँगे और पैसे बनाएँगे! दूल्हा-दुल्हन तो अलग ही लेवल पर हैं, वो तो जमीन पर उतर ही नहीं रहे। बुवा, मौसी, चाची सारे रिश्ते ज़िंदा हो गए। मोह-माया जो बस प्राण छोड़ने ही वाली थी, पुनः जीवित हो उठी। और मोक्ष को प्राप्त होने वाले लोग पुनः इस मृत्युलोक के मजे लेने लगे। हा हा… बचा लिया शादी ने इस संसार को!

हे शादी! तुम भगवान विष्णु का कोई अवतार लगते हो! जो इस दुनिया को बचाने चले आए! कोई न ! देर आए दुरुस्त आए…! माहौल में गर्मी यूँ ही बनाए रखना!

और हाँ इस बार शादी का ये सीजन खत्म न हो। सबकी शादी हो जाए! अखण्ड कुँवारों की भी ! आपकी भी! क्या? आपकी हो गयी है? कोई न! घर पर पूँछकर दूसरी कर लीजिए। आखिरकार कोरोना को हराना जो है। “सबका साथ कोरोना का नाश!”

दुनिया फालतू में वैक्सीन बनाने में लगी हैं! हम आज ही एक शादी निपटाएँ हैं और कल दूसरी में जाने की तैयारी है। चलता हूँ गरम पानी में नमक डालकर….न-न गरारे नहीं करने! पीना है! पेट जो साफ करना है। आज पूड़ी खाने में कसर रह गई! कल दो पूड़ी ज्यादा खानी पड़ेगी!

अनुनाद/शादी-शुदा आनन्द/३०.११.२०२०