Posted in CHAUPAAL (DIL SE DIL TAK)

बालकनी

लगभग आठ साल से रह रहा हूँ इस सरकारी घर में ! दो बालकनी हैं इस घर में। एक आगे और एक पीछे। ये पीछे वाली बालकनी है। किन्तु ये बालकनी इतनी सुंदर और सुकून की जगह हो सकती है अब जाकर पता लगा! कुछ ज़्यादा अन्तर नही है बस अब मुख्यालय से सम्बद्ध हूँ और इस बालकनी में जाने का समय मिल जाता है। वरना जब तक फ़ील्ड में था तब तक मुश्किल से आठ साल में आठ बार गया हूँगा इस बालकनी में। अब तो सुबह और शाम दोनों इसी बालकनी में बीतती हैं।

एक़ चीज़ तो साफ़ है कि ख़ुद को समय देना बेहद ज़रूरी है वरना लाख ख़ूबसूरत चीजें होंगी आपके पास किन्तु उनके साथ समय बिताने का मौक़ा न हो तो सब व्यर्थ! व्यस्त दिमाग़ कभी भी सृजनात्मक नहीं सोच सकता और न ही आनन्द ले सकता है।

मुख्यालय की तैनाती ने जीवन को फिर से खँगालने का समय दिया है। एक बार फिर से नयी शुरुआत! हर एक पल को भरपूर जीने का मौक़ा! नज़रिया बदलने का मौक़ा!

वैसे ये बालकनी तुम्हारे साथ अकेले बैठने को तैयार है 😉 बस चले आओ ! कुछ समय निकाल कर ! बहुत बातें हैं करने को ! तुमसे……तुम्हारे विषय में! शिकायतें भी हैं ! दूर तो नहीं हों पाएँगी मगर कह देंगे! दिल हल्का कर लेंगे! लड़ भी लेंगे! बस चले आओ ……

©️अनुनाद/ सम्बद्ध आनन्द/ १९.११.२०२०

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रात आती क्यों है?

एक शाम की उम्मीद है अब मिलती नहीं क्यों है?
ये रात कमबख़्त तेरे बिना चली आती क्यों है?

बीतती शाम और आती रात से होती अब घबराहट क्यों है?
ये चाँद, सितारों और ठंडी हवा से होती शिकायत क्यों है?

अब तो छुट्टियों से डर लगता है न जाने ये मसला क्यों है?
बाहर का शोर तो ठीक लेकिन खामोशी से डर लगता क्यों है?

ये खाली सड़क, ये रोड लाइट ये सब खामोश क्यों हैं?
अकेले खड़ा मैं इधर, अगल-बगल में तू नही क्यों है?

बैठा हूँ बालकनी में शान्त मगर मन मेरा बेचैन क्यों है?
सब कुछ तो है पाया मैंने पर लगे कुछ खोया क्यों है?

खूबसूरत इन गमलों में फूल लगते इतने साधारण क्यों हैं?
खुशबुओं में इनकी मन मेरा तलाशता तेरा चेहरा क्यों है?

समय काटने को व्हिस्की है मगर इसमें न नशा क्यों है?
खत्म बोतल है पर अब न कोई हो रहा असर क्यों है?

दोस्त हों, दौर चले और बातें खूब हों मन ऐसा चाहता क्यों है?
उन बातों के दौर में जिक्र तेरा हो केवल, दिल चाहता क्यों है?

©️अनुनाद/आनन्द कनौजिया/१०.१०.२०२०

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चकाचौंध

कहते हैं तेरे शहर में चकाचौंध बहुत है,
मान लिया इन बातों में सच्चाई बहुत है।

होती नहीं यहाँ रात कि रोशनी बहुत है,
लेकिन मुझे फिर भी अफसोस बहुत है।

मन मेरा पागल तुझे यहाँ ढूंढता बहुत है,
कोशिशों के बावजूद नही राहत बहुत है।

तेरा चेहरा सामने न हो तो क्या बताएँ,
मेरी इन आँखों में रहता अँधेरा बहुत है।

©️अनुनाद/आनन्द कनौजिया/०५.१०.२०२०

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कहाँ गए वो दिन !

एक व्यस्त दिन हो ! इतना व्यस्त कि ख़ुद की ही खबर न हो ! सर भन्नाया हुवा हो ! क्या कर रहे हैं और वाक़ई में क्या करना है, कुछ समझ न आ रहा हो ! जैसे-तैसे काम निपटाया गया ! शाम हो गयी ! फिर कुछ सोचें कि इससे पहले आपके घनिष्ठ मित्र का फ़ोन आ जाए !

अबे चलो कहीं बैठते हैं !

कहाँ?

अबे अपने अड्डे पर !

अच्छा वहीं ….!

हाँ!

ठीक है। मिलो वहीं पर । निकल रहा हूँ ।

बस सारा तनाव अपनी पसंदीदा पेय के अन्दर जाते ही छू मंतर 😆! पता नही कहाँ गए वो दिन ? इस मनहूस काल में उन दिनों की चर्चा करना ही कितना सुखद है और साथ में वो चीज़ अब न जाने कब करने को मिलेगी इसका दुःख भी ☹️🧐

आप भी ऐसे सुखद पल और अपना वर्तमान दुःख यहाँ साझा कर सकते हैं । खली बैठे हैं हम तो चर्चा कर ली जाएगी 🤣

~अनुनाद/आनन्द कनौजिया/०८.०८.२०२०

फ़ोटो ०५.०७.२०१७ की है ।