प्यार हो तो देखो बिल्कुल तेरे जैसा हो भले मिलें न कभी पर साथ कुछ ऐसा हो मैं अगर कभी ख्वाबों में भी देख लूँ तुझको स्पन्दन मेरे शरीर में तुझको छूने जैसा हो।
दिल की ड्योढ़ी पर तूने जो रखे थे कदम उस दिन करूँ अभिनंदन उन पलों का उन्हें आँखों से चूमता हूँ, उस पहली मुलाकात को मैं समझ मील का पत्थर मानकर देव उस पत्थर को मैं तब से रोज़ पूजता हूँ।
जो न कह पाया तुझे वो पूरी दुनिया को सुनाता हूँ मैं जब बहकता हूँ तो बस तुझ पर गीत लिखता हूँ पीर दिल की है जो अब दिल में रखना मुश्किल है बाँटने को दुख मैं महफिलों में शेरों शायरी करता हूँ।
मिल कर भी तुमसे क्यूँ बिछड़ना सा प्रतीत हो दिल भारी जुबाँ खामोश दिन कैसे व्यतीत हो वाद्य यंत्र ये दिल और धड़कन मेरी संगीत हो मैं गुनगुनाता रहूँ जिसे हाँ तुम वो प्रेम गीत हो।
शाम का चाँद…… कितना अजीब लगता है न ! शायद न भी लगता हो ! लेकिन अगर सोच कर देखा जाये तो कुछ अजीब ही लगेगा। हमेशा से चाँद को रात में ही निकलना होता है या फिर हम उसके रात में ही निकलने की बात करते हैं। शायद हमने ही तय कर दिया है कि चाँद रात में निकलता है इसलिए जब कभी हम शाम में, रात से पहले चाँद को निकला हुआ देखते हैं तो अजीब लगता है। शायद रवायतें यूँ ही बनती हैं और जब कोई इन रवायतों से बाहर निकल कर कुछ अलग करता है तो उसकी ये हरकत अजीब अथवा पागलपन की श्रेणी में रखी जाती हैं।
आज शाम बालकनी में लगाए छोटी सी बागवानी में यूँ ही टहल रहा था तो चाँद पर नज़र पड़ी। अरे भाई … इन्हें इतनी जल्दी क्या थी जो अभी से चले आये ! कोई बात तो जरूर है ! हम ठहरे आशिक मिज़ाज आदमी ! सो हर किसी को इश्क़ में ही समझते हैं! तो हमें लगा कि हो न हो ये चाँद भी किसी के इश्क़ में जरूर है इसलिए जिसके इश्क़ में हैं उसके दर्शन को आतुर होकर समय का हिसाब रखना भूल गए। आतुरता तो बस देखते ही बन रही थी चाँद महाशय की। इतने कोहरे और इतने ठंड के बीच किसी को देखने की आस लगाए टिमटिमा रहे थे कि बस इनके महबूब की नज़र पड़ जाये इन पर और इनकी आज की हाज़िरी कुछ जल्दी लग जाये। दिल की बात तो कह नहीं सकते तो अपने हाव-भाव और आतुरता से सब जाहिर कर रहे थे। शायद इनके महबूब को इनकी इस अजीब हरकत से इनके इश्क़ का आभास हो जाये और इनका काम बन जाये।
प्यार में पड़ा व्यक्ति भी कुछ ऐसा ही होता है न ! हर वक़्त एक ही ख्याल ! सारी सुध-बुध खो बैठता है और होठों पर एक ही नाम – महबूब का! उसकी सुबह उसी के नाम से शुरू, शाम उसके इंतज़ार में और रात उसकी जुदाई में रोकर ख़त्म होती है। दुनिया की नज़र में ऐसा व्यक्ति पागल के सिवा कुछ और नहीं दिखता। ऐसा व्यक्ति रेडियो एक्टिव मैटेरियल जैसा होता है बिलकुल टूट कर बिखरने को तैयार ! बस कोई उसके सामने उसके महबूब का नाम रुपी न्यूट्रान उसकी ओर उछाल दे। हाहा……कितनी अजीब स्थिति होती है !शब्दों में बयाँ करना मुश्किल हैं इसलिए तो इंसान ने गीत संगीत धुन ग़ज़ल आदि रचे हैं और अपने दिल की बात करने को वाद्य यंत्रों का सहारा लेता है। वरना दिल के भावों को इतना सटीक संचारित कैसे किया जाता!
ईश्वर ने बहुत सोचकर ये शाम बनायी होगी। दिन और रात की सन्धि बेला। तुम्हारे बिना गुज़रते दिन को रोकने की कोशिश और तुम्हारे बिना आती रात से दूर भागने का प्रयास। ऐसे समय में तुम्हारा न होना ही ठीक है, बस एक मित्र हो जिससे तुम्हारीं बातें की जा सके ! ढेरों बातें ! बातें जो कभी ख़त्म न होंगी ! न जानें कितनी शामें और कितनी रातें कट सकती हैं तुम्हारी बातों में !
ये चाँद आज तुम्हारे लिए नहीं आया है…… ये किसी मित्र की खोज में आया है। जिसके साथ ये शाम गुज़ार सके, तुम्हारी बातें करते हुए। आज इसे मैं मिल गया! मैं भी बच कर निकलना चाह रहा था लेकिन बच न पाया और इसकी पूरी कहानी सुननी पड़ी। चाँद का यूँ भटकना, शाम और रात का ख्याल न रखना, नशेड़ियों की तरह कभी इधर तो कभी उधर, पागलों सी हरकत कोई अजीब और नयी चीज नहीं है। इश्क में पड़े व्यक्ति की ये बिलकुल सामान्य हरकत है !
दिल कुछ यूँ गुनगुनाता है कि :-
आज चाँद को शाम में ही निकला हुवा देखा,
तेरे इश्क़ में उसने समय का ख्याल ही नहीं रखा।
पाने को झलक तेरी वो दीवाना आतुर बड़ा था,
पागलपन में देखो वो रात से पहले आकर खड़ा था।
उसके इस क़दर बेवक़्त चले आने से बातें खूब बनेंगी,
मगर देखो बिन महबूब एक दीवाने की रात कैसे कटेगी।
अब चले ही आये हो तो बैठो कुछ पल को हमारे साथ,
बेचैन दिल को तुम्हारे अच्छा लगेगा इस दिल जले का साथ।
भटकना तुम्हारा और मेरी गली आ जाना कोई संयोग नहीं,
एक भटके हुए मुसाफ़िर का ठिकाना तुमको मिलेगा यहीं।
कुछ तुम अपनी सुनाना, कुछ हम अपनी आप बीती सुनाएंगे,
आज की पूरी रात हम दोनों बस उनकी बातों में ही बिताएंगे।
देखो चाँद एक नसीहत ले लो मेरी आगे काम आएगी,
यूँ बेवजह बेवक़्त न निकला करो वरना कहानी बन जाएगी।
जब भी निकलने का मन करे और दिल बेहद बेताब हो,
याद मुझको करना कि आ जाओ आज शाम कुछ बात हो।
ये दुनिया रवायतों की अजीब है, तुमको हमको न समझ पायेगी ,
इश्क़ करने वालों की बिरादरी ही तुम्हारी आतुरता समझ पायेगी।
देखो आगे से बेचैनी में बिना समय इधर-उधर न निकल जाना,
बहलाने को मन तुम दबे पैर चुपके से हमारी गली चले आना।