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ज़िन्दगी मेरी बात तो मान…

ज़िन्दगी मेरी बात तो मान
बैठ जा, सुस्ता ले
कुछ आराम तो कर
घट रही जो घटना
उस पर गौर तो कर
छूट रहे जो अपने
उनसे मुलाक़ात तो कर
क्या करेंगे इतनी तेज़ दौड़कर
ये शाम कैसे काटे अकेले रहकर
कुछ देर रुक जा खुद से बात तो कर
झांक कर अपने अंदर खुद को पहचान
ज़िन्दगी मेरी बात तो मान।

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मकाँ

इसी मकाँ में कभी
तुमने अपने पहले क़दम रखे थे
लाल रंग में रंगे हुए
छोड़ी थी अपने पैरों की एक छाप
लगा दी थी मुहर
बना लिया था इस घर को अपना
कल तक तो मेरी चलती थी
पर अब क़ब्ज़ा तुम्हारा था
मिल्कियत तुम्हारी थी
ऐसा लग रहा था जैसे
इस घर को तुम्हारा ही इंतज़ार था
तू बेवजह अब तक दूर था
अब लगा इतना सन्नाटा क्यूँ था?
क्यूँकि तेरा ही इंतज़ार था
इस मकाँ को कभी !

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आदत सी हो गयी है…

आदत सी हो गई है
बेवजह बड़बड़ाने की
बात-२ पर चिल्लाने की
उँगलियों पर कुछ गिनते रहने की
कुछ भूल रहा हूँ जैसे और करता हूँ
कोशिश न जाने क्या याद करने की
उधेड़बुन में रहता हूँ
न जाने क्या खोजता हूँ
मेरी अब ख़ुद से ही शिकायत
बेशुमार हो गयी है
ऐसे जीने की अब मुझे
आदत सी हो गयी है