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दौर…

मेरी ख़ामोशी का वो ग़लत मतलब निकाल बैठे, 
हमारी शराफ़त और तरीक़ों को कमज़ोरी समझ बैठे।

माना कि वो दौर उनका था और वो माहिर हैं इस खेल के,
मगर समझा लें वो ख़ुद को कि हम खिलाड़ी हैं इस दौर के।

पर्दा तो अभी उठा ही है यारों और मंच सज़ा है अभी, 
उनसे कह दो सब्र रखें खेल तो बस शुरू हुआ है अभी।

पृथ्वी, चाँद, और मंगल से भी आगे हम पहुचें हैं अब, 
तुम्हारे पुराने तरीक़ों को कह चुके हैं हम अलविदा अब।

कह कर हमें नौसिखिया तुम अपनी खिसियाहट छुपाते हो, 
कौन पूछता है अब तुम्हें, छोड़ दो, तुम किसे उल्लू बनाते हो।

बैठो दर्शक दीर्घा में अब तुम केवल कुर्सी की शोभा बढ़ाओ,
ग्रहण करो अभिवादन हमारा और इज़्ज़त से अपने घर जाओ।

ये दौर यूँ ही नही बदलते, बहुत कुछ भूलना होता है इन्हें भी!
पल-२ की ख़बर कैसे रखते ये, जीना होता है सदियाँ इन्हें भी।