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लैम्प पोस्ट ….

रात गहरी अंधेरी
नज़र से दूर चाँद
इन बादलों में कहीं
व्यस्त चाँदनी के साथ
और ,
मैं
अकेला
खड़ा हूँ तनहा
लैम्प पोस्ट के
खम्भे के पास…….

याद करता तुझको
हर साँस के साथ
ख़्यालों में कौंधता
तेरा चेहरा
बिजली की हर
चमक के साथ !
मैं
अकेला
हो रहा बेचैन
लैम्प पोस्ट के
खम्भे के पास…….

बारिश भी आ गयी
रिमझिम फुहारों के साथ
कानों में फुसफुसाती
बारिश की आवाज़
सुनाती मुझको
अपनी कहानी!
मैं
अकेला
खड़ा सुनता रहा
लैम्प पोस्ट के
खम्भे के पास…….

मैं भी तो जलता हूँ
इस लैंप पोस्ट की तरह
खुद का अंधेरा समेटे
दूसरों को रोशनी दे रहा
तू बगल में खड़ी अब
मुस्कुराती क्यों नही?
मैं
अकेला
भीतर के अंधेर को मिटाता
लैम्प पोस्ट के
खम्भे के पास…….

काश! शायद ! और न जाने
कितने शब्दों में
मैं कुछ मांगता हूं
हमेशा की तरह
तुम आ क्यों नही जाते
कुछ ढूंढते हुए!
मैं
अकेला
राह निहारता
लैम्प पोस्ट के
खम्भे के पास…….