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परिचय!

सोचता हूँ तुम्हारे सवालों का क्या जवाब दूं ?
बेबुनियाद बातों को मैं क्यों बुनियाद दूं।

तहज़ीब के शहर से हूँ मैं
तहज़ीब ख़ूब रखता हूँ,
और अगर ज़्यादा दुष्टयी आयी तुमको,
तो मैं कान के नीचे भी ख़ूब रखता हूँ ।

मैं दुनिया से नही डरता बिलकुल,
केवल अपने ग़ुस्से से डरता हूँ ।
अपनों के सिलों से घायल हुवा हूँ,
न छेड़ मुझे, मैं बड़ी ज़ोर से काटता हूँ ।

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ख़ुद की ख़ोज….

ख़ुद में ख़ुद की खोज को ख़ुद से ख़ुद ही दूर जा रहा हूँ मैं,
अब तो ख़ुद खुदा की खुदायी भी मुझे ख़ुद से मिला नही सकती ।

ख़ुद में ख़ुद को खोजता हूँ, तो बस तुमको ही पाता हूँ,
मैं ख़ुद में ख़ुद को कैसे पाऊँ, मैं तो बस तुझमें खोया हूँ ।

मेरा ख़ुद का कोई रंग नही पानी सी सीरत मैं रखता हूँ ,
चढ़ गया रंग तेरा और मैं मूर्ख इसमें ख़ुद को ढूँढता हूँ।