Posted in CHAUPAAL (DIL SE DIL TAK), POETRY

जाड़े की बारिश

जाड़े की पहली बारिश हो
तस्वीर में दिख रही छत हो
मैं शांत अकेले कुर्सी पर बैठा हूँ
टीन शेड पर रिमझिम की धुन हो।

सुन्दर मुग्ध ख्यालों में मन खोया हो
प्रकृति सौन्दर्य चहुँ ओर बरसता हो
करने को रस-पान इस अद्भुत रस का
कम पड़ता इन नयनों का बर्तन हो।

नाश्ते को तू रसोई से चीखती हो
मैं बना रहूँ अंजान तुझे छेड़ने को
सुनकर तेरे पायल की खन-खन मुझको
तेरे छत पर आने का पूर्वाभास हो।

छत पर तेरे कोमल पैरों की मधुर थाप हो
हाथों में चाय और चेहरे पर गुस्सा बेशुमार हो
पकड़ लूँ हाथ, तू पैर से मेरे पैर का अंगूठा दबा दे
इस खींच तान में उभरती तेरे चेहरे पर मुस्कान हो।

हार कर तू समर्पण कर दे और मुझे देखती हो
आँखों में उठ रहे ख्यालो को मेरे जैसे तू पढ़ती हो
रखने को मेरा मन तुमसे अच्छा और कौन समझेगा
खींच ली बगल में दूसरी कुर्सी तू संग मेरे बैठती हो।

क्या ब्लूटूथ क्या वाई-फाई चाहे कोई और कनेक्शन हो
दिल की बात कहने-समझने को बस आंखों में आँखे हो
कोई बुद्धिजीवी इन मृदु भावों की गति क्या ही मापेगा
जहाँ सिर्फ हाथों को छू भर लेने से सारा डाटा ट्रांसफर हो।

©️®️जाड़े की बारिश/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/२८.१२.२०२१