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कब लिखते हो?

वो पूछते है कि कब लिखते हो?
जब तुम जीवन की परेशानियों में बस परेशान होते हो,
तब मैं लिखता हूँ।

वो पूछते है कि कब लिखते हो?
जब बाहर का शोर मेरे भीतर के शोर के स्तर पर पहुँचता है,
तब मैं लिखता हूँ।

वो पूछते है कि कब लिखते हो?
जब माहौल का तनाव मेरे हृदय को छू कर चला जाता है,
तब मैं लिखता हूँ।

वो पूछते है कि कब लिखते हो?
जब कोई क्षुब्ध हृदय व्यथा चाहकर भी नहीं कह पाता है,
तब मैं लिखता हूँ।

वो पूछते है कि कब लिखते हो?
जब मैं बेहद खुश होता हूँ तो मैं उस पल को बस जीता हूँ,
तब मैं नहीं लिखता।

सुख से ज्यादा मुझे दुःख पसंद हैं!
संघर्ष के उन पलों में मैं अपना सर्वोत्तम संस्करण होता हूँ,
तब मैं लिखता हूँ।

©️®️लिखना/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/११.०९.२०२१

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जीवन गुरु !

कुछ मैंने सीखा भी और कुछ नहीं भी
कहीं मिला सम्मान तो कहीं हमारा कटा भी
जीवन के इस सफ़र में हे गुरु आपको
हमने याद किये अच्छे में और बुरे में भी।

हे गुरु इस जग में तेरा कोई निश्चित रूप नहीं,
तू कभी मेरा अध्यापक भी तो कभी चपरासी भी,
पहली गुरु माँ थी तो हमने सीखा देना लार-दुलार और
दुनियादारी सीखने में काम आयी पापा की चप्पल भी।

अपने हक़ के लिए लड़ना सीखा भाई-बहनों से
अनज़ानो पर प्यार लुटाने को मिले कई मित्र भी
जवाँ हुए तो हमको लगी थी एक मुस्कान बड़ी प्यारी
जीवन के रंग देखे हमने प्यार में खाकर धोखा भी।

गणित विज्ञान कला हिंदी उर्दू के जाने ढेरों शब्द भी
डेटा ट्रांसफ़र को काफ़ी होते देखो सिर्फ़ इशारे भी
पढ़ा लिखा खूब सारा इस दुनिया को समझाने को
हुए जब समझदार तो हमने सीखा चुप रहना भी।

इस दुनिया की रीति अजब है अच्छी बातें अच्छी लगती सिर्फ़ किताबों में
पढ़ लिख कर जब इस खेल में आये तो हुआ संदेह कि मैंने कुछ सीखा भी?
साधी चुप्पी और शान्त खड़ा होकर मैंने ग़ौर बहुत फ़रमाया
इस दुनिया में जीने को देखो, आना चाहिए रंग बदलना भी।

तीन दशक मैंने जिए, जी ली लगभग आधी ज़िन्दगी
गुरु दिवस पर बधाई देने को आज, मैं हूँ बहुत आतुर भी
इस जीवन में मिले हम सबको कई गुरु और उन सबसे
हमने सीखा चलना गिरना रोना और सम्भालना भी।

किसे मानूँ अपना गुरु और किसे नहीं, किसे रखूँ किसके पहले
बहुत विचार के बाद पाया की गुरुओं की कतार में ये जीवन भी।
हे जीवन गुरु तुम सदा अपनी कृपा हम पर बनायें रखना
ठोकर तो देना ही मगर हमें प्यार से रहते सहलाना भी।

©️®️गुरु/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/०५.०९.२०२१

Posted in CHAUPAAL (DIL SE DIL TAK)

साथ

जीवन की उलझनों में भी कुछ इस तरह
मैं खुद से दूर अपनों का साथ निभा लेता हूँ,
रोज़ ईश्वर के समक्ष हाथ जोड़कर हृदय से
उनके खुश रहने की दुआ माँग लेता हूँ।

मैंने अपने आप और पूरे परिवार का
कुछ इस तरह भी इंश्योरेंस करा रखा है,
अपने से जुड़े व्यक्ति के आगे बढ़ने में
बढ़-चढ़ कर अपना हाथ लगा रखा है।

एक छोटी उम्र है और जिम्मेदारियाँ कई
इस सबमें रोज़ जीनी है ज़िंदगी भी नई
इतना कुछ अकेले कहाँ सम्भव आनन्द
लेकर अनुनाद मैं जुड़ा हूँ दिलों से कई।

©️®️साथ/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/२९.०८.२०२१

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निज़ात

काश कि मेरा सब कुछ छिन जाए
इस तरह भी तो दुख से निज़ात पाया जाए!

हद से ज्यादा हो गईं अब तो शिकायतें
सभी चिट्ठियों को बिन पढ़े जला दिया जाए!

दिल में घाव अब बहुत सारे हो गए हैं
मेरे हक़ीम से अब तो खंजर छीन लिया जाए!

साथ तेरा किसी बोझ से कम नहीं
क्यों न अब ये बोझ दिल से उतार दिया जाए?

साथ चल नहीं सकते साथ रुक तो सकते हैं
मगर पीछे चलने की आदत अब तो छोड़ दी जाए!

दूर थे तो तब बात कुछ और थी आनन्द
पास रहकर भी बोलो अब दूर कैसे रहा जाए!

मैं बेचैन करवटें बदलता रहा रात भर
इस चाहत में कि अब तो मेरा हाल पूँछ लिया जाए!

बहुत कुछ खो दूँगा इस तरह मैं, तो क्या
चलो फिर से एक मुकम्मल शुरुआत की जाए!

काश कि मेरा सब कुछ छिन जाए
इस तरह भी तो दुख से निज़ात पाया जाए!

©️®️निज़ात/अनुनाद/आनन्द कनौजिया/२६.०७.२०२१

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सवाल….?

तुम बिना बोले बहुत कुछ बोल सकते थे
मेरे सवालों पर मुस्कुरा तो सकते थे….

चलो माना कि उस पल ख़ामोश रहना मजबूरी थी
लेकिन बहाना बाद में कोई बना तो सकते थे….

मंज़िले अलग थी हमारी, दूर होना भी ज़रूरी था
मगर दुबारा लौटकर आ तो सकते थे….

कहते हैं दुनिया बहुत छोटी और तुम बनारस में हो
चाहते अगर तो लखनऊ आ तो सकते थे….

चाहत थी छूने की, अपने बाहों में भर लेने की
तुम लौटकर बस गले मिल तो सकते थे….

एक पल को माना कि ज़िद मेरी जायज़ न थी
तुम एक हाँ से जायज़ बना तो सकते थे….

तुम बिना बोले बहुत कुछ बोल सकते थे
मेरे सवालों पर मुस्कुरा तो सकते थे….