
Full moon


ये जो तुम आधा सा मुस्कुराते हो,
कोई बात होठों से दबाकर रखना चाहते हो!
दिल की बात करूँ, कुछ पूँछूँ, तो मौन रहते हो,
मगर सामने खामोश खड़े रहकर तुम सब कह देते हो!
खामोशियाँ भी हमेशा काम नहीं आती देखो,
तुम अपनों से ऐसा भी क्या राज रखना चाहते हो!
एक उम्र मिली है तुमको हमको जीने को,
क्यूँ नहीं इसके कुछ पल खुलकर साथ मेरे बिताते हो!
एक झलक ही मिली थी कि तुम चल दिये,
आ जाओ कि आँखों की प्यास और क्यूँ बढ़ाते हो?
©️अनुनाद/आनन्द कनौजिया/१३.०१.२०२१

बाबा महादेव की नगरी हो, बी एच यू का प्राँगढ़ हो,
नाम तेरा होंठो पर हो और दिल में तेरी दी बेचैनी हो।
आई टी का मन में घमंड हो, चले तो सीना चौड़ा हो,
हॉस्टल की शाम सुहानी हो, खून में भरपूर रवानी हो।
उमा जैसा लव गुरु हो, बिरजू का बेवजह का रोना हो,
राधे माँ का तांडव हो औऱ मालिक की लचकती कमर हो।
दबंग का ज्योतिष दर्शन हो, बज्जर का टट्टी सा मुंह हो,
प्रेम की मासूम मुस्कान हो, भानु पापा की छत्र-छाया हो।
मरतोलिया की कम होती लम्बाई हो, राजा जी की तोंद हो,
अल्बर्ट का नींबू पानी हो और पिछली रात का हैंग ओवर हो।
अमित सर की बाइक हो, उस पर मेरा ग़ायब होना हो,
सरपट बनारस में दौड़ती हो, नज़रें केवल तुझको ढूँढती हो।
चारों तरफ अपने यार हों, महफिलें होती खूब गुलजार हों,
करने को मौज बहुत हो फिर भी बिन तेरे मन न लगता हो।
धनराजगिरी का कमरा हो, लिम्बड़ी कार्नर की गर्म-२ चाय हो,
सी वी रमन के संग मोर्वी की चौपाल में अब लगता मन न हो।
वी टी की कोल्ड कॉफ़ी हो, संकट मोचन के बेसन लड्डू हों,
गोदौलिया की भांग की ठंडई हो पर उसमें अब कोई नशा न हो।
आई टी कैफेटेरिया की कॉफी हो, दोस्तों की हँसी ठिठोली हो,
सेंट्रल लाइब्रेरी की डेस्क हो, बिन तेरे लगती बिल्कुल सूनी हो।
रामनगर से सारनाथ तक और लखनिया दरी से चूड़ा दरी हो,
चुनार किले का सन्नाटा हो और विंध्याचल में तेरी खोज हो।
रविदास पार्क हो, अस्सी घाट की शाम हो,
कदम आवारा से हों और बस तेरी तलाश हो।
दिल में उथल-पुथल हो , २०-२१ की उम्र हसीं हो,
कुछ जुड़ता हमसे रोज हो और उसको लेकर प्रश्न बहुत हो।
संकट मोचन का द्वार हो, दुर्गा कुंड की घण्टियाँ हो,
काशी कोतवाल के दरबार में ढूंढते सारे प्रश्नों के उत्तर हो।
बुनते ढेरों सपने हो, दिल चाहे बढ़िया नौकरी हो,
पर जॉब के लगने पर दिल ये मेरा क्यों गुमसुम हो।
महामना की बगिया से दूर जाने का मेरा मन न हो,
ज्यूँ-ज्यूँ समय गुजरता जाए धड़कन की गति बढ़ती हो।
आखिरी समय चलने का हो, बैठने को माँ गंगा का आँचल हो,
कुछ न आये समझ में, ये कदम रोज काशी विश्वनाथ की ओर हों।
कितना कुछ यहाँ मिला हुआ हो, रखने को यादों का एक गट्ठर हो,
कैसे जाऊँगा कि दिल भारी हो, आँखों से मेरी छलकता समंदर हो।
जा रहा हूँ खुद को छोड़कर यहाँ, मेरे पास बस तेरे यादों की निशानी है,
आता रहूँगा कुछ खोजने को यहाँ कि रह गयी अधूरी एक कहानी है।
हर हर महादेव…..
जय भोलेनाथ…..
हर हर गंगे…..
©अनुनाद/आनन्द कनौजिया/०७.०१.२०२१





बढ़ती उम्र का देखो क्या अजब फलसफा है,
साथ छोड़कर निकल रहे हैं साथ चलने वाले।
वादा था कि हम मिलते रहेंगें हज़ार कोशिशें करके,
और अब देखो कि सारी कोशिश बहाने खोजने की हो रही।
तुम्हारे लिए तो ये कुछ पल, दिन, महीने ही गुजरें है,
और यहाँ तुम्हारे बिन हमारी तो सदियाँ गुज़र गयीं।
एक मासूम सूरत थी बिल्कुल भोली सी, हाँ तेरी ही तो थी,
तेरे बिछड़ने फिर न मिलने से देखो आज भी बिल्कुल वैसी ही है।
बढ़ती उम्र का भी नही हुवा कोई असर आज तक देखो,
मेरे ख़्यालों में तेरा चेहरा आज भी पहले जैसा है।
एक ख्वाहिश थी साथ जीने-मरने की और अब कमाल तो देखो,
न हो मुलाकात उनसे अब हम इसकी दुवा दिन-रात करते हैं।
उम्र ही तो काटनी है, कट रही है, कट ही जाएगी,
साथ तेरा हो या तेरी यादों का, नशा एक बराबर है।
अनुनाद/यादों का आनन्द/२३.१२.२०२०

ये सूरज सुर्ख लाल है बिल्कुल मेरी तरह लगता है,
इस ढलती शाम से बेहद नाराज लगता है।
©अनुनाद/आनन्द कनौजिया/०९.११.२०२०
