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नामकरण… (नवीन)

एक बार फिर मौका मिला नामकरण का……… यह कार्य पहली बार तो कठिन था ही किन्तु दूसरी बार तो यह नामुनकिन प्रतीत हो रहा था । इस बार तुम्हारे भाईसाहब भी थे जो हमेशा हमारी हर सोच पर प्रभाव डाल रहे थे। जैसे वो बड़े तुम छोटे, वो पहले तुम बाद में। बस इसी चीज से तुम्हे बचाना था। कोई बड़ा- छोटा या पहला-दूसरा नही था। तुम भी अपने भाईसाहब जैसे ही अद्वितीय हो। अपने आप में एक स्वतंत्र सत्ता और एक लाजवाब चरित्र। हाँ…..! एक चीज तो है कि तुम हम सभी में सबसे उन्नत हो। तुम्हारे भाईसाहब के सामने तुम्हारी माँ और मैं थे किंतु तुम्हारे सामने तुम्हारे भाईसाहब भी हैं जो एक अतिरिक्त घटक का कार्य करेंगे। तुम्हारी माँ इस बार तुम्हारे नाम का जिम्मा मुझ पर छोड़ कर अपनी दुनिया में मस्त है। कहती है कि मैं तुम दोनों का ख्याल रखूं या नाम ढूंढू। मैं बेचारा पूरी तरह फंस चुका था। घबराहट थी कि कहीं तुम्हारे साथ अन्याय न कर बैठूं इसलिए अपनी सफाई में इतना कुछ लिख रहा हूँ। अगली कुछ पंक्तियों में तुम्हारे नाम के पीछे की सोच को स्पष्ट करने की कोशिश करूंगा। बड़े होकर जब तुम इसे पढोगे तो शायद संतुष्ट हो जाओ! इसी आकांक्षा के साथ तुम्हारे नामकरण की कोशिश…..

संस्करण द्वितीय किन्तु संस्मरण प्रथम हो,
महत्वपूर्ण एक समान ये तुमको स्मरण हो।

तुलना किसी से नही तुम अतुलनीय हो,
बाद में आये हो किन्तु किरदार अद्वितीय हो।

बड़े, छोटे, पहले, दूसरे ये सब नही करेंगे ,
तुम्हारी हर इच्छा अनिच्छा का ख्याल हम करेंगे।

नामकरण मुश्किल था तुम्हारा हमेशा से हमारे लिए ,
जतन खूब किए किसी का प्रभाव न पड़ने के लिए।

बड़े भैया पहले से तैयार थे अपनी लिगेसी लिए,
मशक्कत करनी पड़ी उनके प्रभाव को कम करने के लिए।

आशीर्वाद तुमको मिलता रहे नीलिमा और आनन्द का,
साथ सदैव रहे तुम्हारे साथ निलिन्द के यथार्थ का।

उन्नत हो उन्नति करो, चरित्र ऐसा कि सब तुमको नमन करें।
झुकना कभी मत ये याद रहे, ईश्वर तुम्हारा उन्नयन करें।

*नवांश-उन्नयन निलिन्द*