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कशमकश

आज सुबह उठा तो फिर एक अफ़सोस के साथ,
कुछ याद नही, न जाने किस नशे में गुज़र गयी कल की शाम भी !

एक हम है जो दिल के ज़रा मासूम हैं ,
चालाकी तो सीखी लेकिन, दुनियादारी में कल हम फिर पीछे रह गए !

मिलना जुलना तो एक आम बात होती थी पहले,
उनका यूँ मुस्कुराना आम तो नही, कल की मुलाक़ात के मायने हज़ार होंगे !

रोज़ कुछ नया सीखने की ख़्वाहिश रखता हूँ,
मैं हार जाता हूँ फिर भी, खेल पुराना ये और इसमें पैंतरे अधिक है ।

मदद को लोग साथ हज़ार हैं मेरे,
हाथ जुड़ते नही मेरे, और लोग मुझसे ख़्वाहिशें ख़ूब रखते हैं !

कई बार गिरा हूँ मैं इस दौड़ में,
मैं डूबता हूँ क्यूँकि ज़िंदा हूँ, लाश होता तो ये नौबत ही न आती।

बस ये कहकर मैं ख़ुद को थाम लेता हूँ,
तू पीछे ही सही पर कोई ग़म नही, तेरे तो ख़ुद के नाम में आनन्द बहुत है ।